गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

राष्ट्रपति के सामने बस्तर की परंपरा से फर्जीवाड़ा?

 

    • "राष्ट्रपति के सामने बस्तर की परंपरा से फर्जीवाड़ा?"
    • "काछन देवी विवाद: अफसरों की लापरवाही या परंपरा का अनादर?"

क्या देश की सर्वोच्च संवैधानिक कुर्सी पर बैठी देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति के सामने ही... बस्तर की 600 साल पुरानी लोक-आस्था और परंपरा का फर्जीवाड़ा कर दिया गया?

क्या वीआईपी प्रोटोकॉल, अपनी पीठ थपथपाने की होड़ और प्रशासनिक खानापूर्ति के चक्कर में अफसरों ने उस मासूम बच्ची का हक मार दिया, जिसने कांटों की सेज पर बैठकर बस्तर के सबसे बड़े त्योहार—बस्तर दशहरा की अनुमति दी थी?

जी हां! बस्तर दशहरा के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि जिस 'काछन देवी' (मासूम बच्ची पीहू) ने कांटों के झूले पर बैठकर धार्मिक रस्म निभाई, उसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से नहीं मिलवाया गया... बल्कि उनकी जगह किसी दूसरी बच्ची को 'काछन देवी' बनाकर राष्ट्रपति के सामने खड़ा कर दिया गया!

इस एक लापरवाही ने बस्तर के पनका समाज को आक्रोश से भर दिया है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब वीआईपी चमक-धमक के आगे हमारी सैकड़ों साल पुरानी परंपराएं छोटी पड़ गई हैं? आज बात इसी विवाद की, प्रशासनिक नाकामी की और उस सवाल की... जो पूरे बस्तर की अस्मिता से जुड़ा है!"

क्या है 'काछन गादी' की परंपरा? 

विवाद की गहराई को समझने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि 'काछन गादी' बस्तर के लिए सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा है।

बस्तर का विश्वप्रसिद्ध 75 दिनों तक चलने वाला दशहरा... राजा-महाराजाओं के ज़माने से लेकर आज तक तब तक शुरू नहीं होता, जब तक 'काछन देवी' की अनुमति न मिले। और यह अनुमति कौन देती है? पनका समाज की एक छोटी सी मासूम बालिका, जिसके शरीर पर काछन देवी की सवारी आती है।

वह बच्ची नुकीले कांटों से बने झूले पर बैठती है, जिसे 'कांटों की सेज' कहा जाता है। वहां देवी की अनुमति स्वरूप फूल चढ़ाया जाता है और उसके बाद ही बस्तर दशहरा का आगाज़ होता है। इस साल भी यह पवित्र रस्म पूरी निष्ठा के साथ निभाई गई। पनका समाज की बेटी पीहू ने कांटों की सेज पर बैठकर यह रस्म पूरी की।

पूरा बस्तर इस रस्म के आगे शीश झुकाता है। लेकिन 23 अक्टूबर को जब देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बस्तर दशहरा की प्रदर्शनी देखने जगदलपुर पहुंचीं... तो वहां एक ऐसा खेल खेला गया, जिसने आस्था पर करारी चोट की।"

23 और 24 अक्टूबर का पूरा घटनाक्रम 

"अब ध्यान से सुनिए कि आखिर जगदलपुर के लालबाग मैदान में हुआ क्या!

राष्ट्रपति का दौरा बस्तर के लिए ऐतिहासिक क्षण था। प्रशासन ने बस्तर की संस्कृति को दर्शाने के लिए प्रदर्शनी लगाई। यहां तक तो सब ठीक था। लेकिन जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 'काछन देवी' की झांकी/प्रदर्शनी के पास पहुंचीं, तो वहां क्या हुआ?

जिस बच्ची (पीहू) ने कांटों के झूले पर बैठकर वास्तविक धार्मिक विधान पूरा किया था, उसे वहां लाया ही नहीं गया! उसकी जगह किसी और बच्ची को 'काछन देवी' का प्रतीकात्मक रूप देकर राष्ट्रपति से मिलवा दिया गया और अफसरों ने तालियां बजवा दीं!

सोचिए... जिस परिवार और जिस समाज ने पीहू को देवी स्वरूपा मानकर हफ्तों का कड़ा नियम-संयम निभाया, जिस समाज की पहचान इस परंपरा से है, जब उन्हें पता चला कि राष्ट्रपति से किसी और बच्ची को मिलवा दिया गया है, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

काछन गुड़ी के मुख्य पुजारी गणेश दास और पनका समाज के प्रतिनिधियों ने जब यह देखा, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा। समाज ने इसे 'धोखेबाजी' और 'परंपरा का सीधा अपमान' करार दिया।

नाराजगी इतनी बढ़ी कि 24 अक्टूबर को होने वाली 'कांटे के झूले का विसर्जन' की रस्म को पनका समाज ने रोक दिया! समाज ने साफ कह दिया—'जिस बच्ची को राष्ट्रपति से मिलवाया है, अब विसर्जन भी उसी से करवा लो!' बस्तर के इतिहास में रस्म का इस तरह रुकना प्रशासनिक अधिकारियों के मुंह पर एक बहुत बड़ा तमाचा है!"

"इस पूरे मामले में अब लिपापोती की कोशिशें शुरू हो गई हैं। नेता आ रहे हैं, बयान दे रहे हैं कि 'हम दिल्ली ले जाकर राष्ट्रपति से मिलवा देंगे।' लेकिन सवाल यह है कि गलती बस्तर में हुई, तो सफाई दिल्ली के लॉलीपॉप से क्यों दी जा रही है?

आज इस रिपोर्ट के ज़रिए हम सरकार, स्थानीय प्रशासन और बस्तर दशहरा समिति से कुछ सीधे और तीखे सवाल पूछते हैं:

  1. पहला सवाल: क्या प्रशासनिक अधिकारियों के लिए बस्तर की 600 साल पुरानी परंपराएं सिर्फ एक 'इवेंट' या 'फोटो-ऑप' (Photo-op) बनकर रह गई हैं?
  2. दूसरा सवाल: किस अधिकारी के इशारे पर वास्तविक काछन देवी (पीहू) को दरकिनार किया गया? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या इसके पीछे अपनी पसंदीदा एंट्री कराने का कोई वीआईपी खेल था?
  3. तीसरा सवाल: देश की राष्ट्रपति खुद एक आदिवासी समाज से आती हैं। बस्तर के आदिवासी और पारंपरिक समाजों की आस्था के साथ राष्ट्रपति के सामने ही ऐसा 'फर्जीवाड़ा' करके अफसरों ने राष्ट्रपति भवन की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई?
  4. चौथा सवाल: जब पनका समाज ने विसर्जन रस्म रोक दी और बस्तर दशहरा के बहिष्कार की चेतावनी दी, तब जाकर जनप्रतिनिधि क्यों जागे? क्या बस्तर के रीति-रिवाजों की कोई कीमत अफसरों की नज़रों में नहीं है?
  5. पांचवां सवाल: 'दिल्ली में राष्ट्रपति से मिलवा देंगे'—यह आश्वासन देकर क्या मामले को दबाने की कोशिश हो रही है? दोषी अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?"


 बस्तर दशहरा कोई आम मेला या सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है। यह सदियों पुरानी लोक-आस्था, संस्कृति और जनजातीय अस्मिता का प्रतीक है। जब प्रशासन इस तरह की परंपराओं में 'डमी' या फर्जी विकल्प खड़े करने लगता है, तो समाज का विश्वास टूटता है।

आज पनका समाज आहत है। मुख्य पुजारी आहत हैं। और बस्तर का हर वो नागरिक दुखी है जो इस परंपरा को अपनी पहचान मानता है।

अगर आज इस लापरवाही पर जवाबदेही तय नहीं हुई, अगर जिम्मेदार अफसरों पर गाज नहीं गिरी, तो कल को किसी और परंपरा के साथ ऐसा ही खिलवाड़ होगा।

आप इस पूरे विवाद पर क्या सोचते हैं? क्या प्रशासन की इस गंभीर लापरवाही पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं? क्या 'दिल्ली ले जाकर मिलाने' का आश्वासन काफी है?

अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें। 

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