स्कूलों की बर्बादी के गुनहगार
हिंदू-मुस्लिम' का शोर और सड़कों पर सिसकता भविष्य
स्कूल बर्बाद, पद खाली, संपत्तियां नीलाम... आखिर युवाओं और बच्चों के हिस्से में क्या आया?
सरकारी दफ्तरों से कुछ ही दूरी पर जब स्कूल की यूनिफॉर्म पहने मासूम बच्चे हाथों में तख्तियां लेकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। हाल के दिनों में देश और राज्यों के अलग-अलग हिस्सों से आई तस्वीरों ने हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर कर रख दिया है। जिन हाथों में किताबें, कलम और भविष्य के सपने होने चाहिए थे, वे हाथ आज अपने बुनियादी हक के लिए नारेबाजी कर रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों की नजर इन सिसकती तस्वीरों पर क्यों नहीं पड़ रही?
1. धर्म का चश्मा और जहरीली राजनीति का शोर
जब-जब जनता ने अपने बुनियादी अधिकारों—बेहतर शिक्षा, अस्पताल, रोजगार और बुनियादी ढांचे—पर सवाल पूछे, तब-तब सत्ता की ओर से एक ही आजमाया हुआ फॉर्मूला पेश किया गया: सांप्रदायिक ध्रुवीकरण।
पिछले कुछ सालों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखता है कि बहस के मुख्य मुद्दे बदलकर क्या कर दिए गए हैं:
- असली मुद्दे: गिरता शिक्षा स्तर, खाली पड़े शिक्षकों के पद, बंद होते सरकारी स्कूल और युवाओं की बेरोजगारी।
- बनाए गए मुद्दे: कौन क्या पहनेगा, कौन क्या खाएगा, किसका नाम बदला जाएगा और किस धर्म का प्रतीक बड़ा है।
राजनीतिक रैलियों से लेकर मुख्यधारा के मीडिया मंचों तक चौबीसों घंटे 'हिंदू-मुस्लिम' का विमर्श परोसा जा रहा है ताकि आम आदमी अपने बच्चे की खाली क्लासरूम और भविष्य के अंधेरे के बारे में सोचना ही भूल जाए।
2. संपत्तियों की 'महासेल' और सरकारी ढांचे का समर्पण
एक तरफ जहां देश के युवाओं को भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर रखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे सार्वजनिक संपत्तियों की अंधाधुंध बिक्री और निजीकरण का खेल जारी है।
- निजीकरण की होड़: रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बिजली कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को एक-एक कर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।
- सरकारी संपत्तियों का अवमूल्यन: 'राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन' (National Monetization Pipeline) जैसी योजनाओं के नाम पर दशकों में बनी राष्ट्रीय संपत्तियों को कॉरपोरेट मित्रों के हवाले किया जा रहा है।
- जनता पर बोझ: निजीकरण के इस दौर में आम आदमी से सस्ती सरकारी सेवाएं छीनकर उन्हें कॉरपोरेट के महंगे टैरिफ और फीस के भरोसे छोड़ दिया गया है।
3. शिक्षा का विनाश और रिक्त पदों पर ताले
सड़कों पर उतरे स्कूली बच्चों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं का गुस्सा बेवजह नहीं है। आंकड़े और जमीनी हकीकत सत्ता के दावों की पोल खोलते हैं:
क्षेत्र | जमीनी हकीकत और आंकड़े |
सरकारीस्कूल | हजारों सरकारी स्कूल 'मर्ज' करने के नाम पर बंद कर दिए गए हैं। जर्जर इमारतें, पीने के पानी और शौचालयों काअभाव। |
शिक्षक भर्ती | लाखों पद सालों से खाली पड़े हैं। भर्ती परीक्षाएं होती हैं तो पेपर लीक हो जाते हैं, या फिर मामले सालों तक अदालतोंमें लटके रहते हैं। |
अस्थायीव्यवस्था | स्थायी नौकरियों की जगह संविदा (Contractual) और आउटसोर्सिंग प्रथा को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि न्यूनतमवेतन पर काम कराया जा सके। |
बजट मेंकटौती | जीडीपी का एक मामूली हिस्सा ही शिक्षा पर खर्च हो रहा है, जो विकसित राष्ट्र बनने के दावों के साथ भद्दा मजाक है। |
4. सड़कों पर उतरा भविष्य: कब जागेगी सरकार?
जब सरकारी स्कूलों में शिक्षक नहीं होंगे, प्रयोगशालाओं में उपकरण नहीं होंगे और डिग्रियों के बावजूद रोजगार के अवसर नहीं होंगे, तो युवा और बच्चे सड़कों पर नहीं आएंगे तो कहाँ जाएंगे?
आज का छात्र और युवा यह समझ चुका है कि 'नफरत का शोर' उसके पेट की भूख नहीं मिटा सकता और न ही उसे एक सुरक्षित भविष्य दे सकता है। सत्ता में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं को यह याद रखना होगा कि:
- मंदिर-मस्जिद के नाम पर चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन देश का निर्माण केवल शिक्षा और रोजगार से होता है।
- संपत्तियों को बेचकर तात्कालिक राजस्व तो जुटाया जा सकता है, लेकिन आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक नींव को हमेशा के लिए कमजोर कर दिया जाता है।
संपादकीय निष्कर्ष
सड़कों पर उतरे इन स्कूली बच्चों के चेहरे पर दिख रही लाचारी और गुस्सा किसी एक सरकार की नाकामी नहीं, बल्कि हमारी पूरी लोकतांत्रिक प्राथमिकता का रिपोर्ट कार्ड है। यदि अब भी नीति-निर्माताओं ने नफरत की राजनीति छोड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान नहीं दिया, तो इतिहास इस दौर को 'भविष्य की बलि चढ़ाने वाले युग' के रूप में याद रखेगा।
समय आ गया है कि जनता और खासकर युवा वर्ग, नफरती बयानों के बजाय सीधे सवाल पूछे: "हमारे स्कूल क्यों बंद हो रहे हैं? हमारी नौकरियां कहाँ हैं?"

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