अधिकारियों पर भड़के अपने ही विधायक! भावना बोहरा से नेताम तक... छत्तीसगढ़ में ये क्या हो रहा है?
छत्तीसगढ़ में विधायकों का 'एक्शन मोड'! अफसरों की क्लास और ऑन द स्पॉट फैसला |
छत्तीसगढ़ की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी और दिलचस्प खबर सामने आ रही है। सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि ही अब सिस्टम की सुस्ती और अधिकारियों की कार्यशैली से नाराज नजर आ रहे हैं। जनता की समस्याओं को लेकर अब विधायक जी का गुस्सा सीधे अधिकारियों पर फूट रहा है।
हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां अपनी ही व्यवस्था पर नाराजगी जताते हुए विधायकों ने ऑन द स्पॉट एक्शन लिया है। चाहे पंडरिया से विधायक भावना बोहरा का बिजली दफ्तर पहुंचना हो, या मंत्री रामविचार नेताम का खस्ताहाल सड़कों को लेकर अधिकारियों पर गाज गिराना हो।
आज के इस रिपोर्ट में हम छत्तीसगढ़ के उन तमाम वाकयों और विधायकों के एक्शन मोड की पूरी इनसाइड स्टोरी आपको बताएंगे, जिसे जानकर आप भी कहेंगे कि आखिर सिस्टम में चल क्या रहा है!
सबसे पहले बात करते हैं कवर्धा/पंडरिया क्षेत्र की विधायक भावना बोहरा की। क्षेत्र में लगातार बिजली कटौती और लो-वोल्टेज की शिकायतें आ रही थीं। ग्रामीण परेशान थे और शिकायतों के बाद भी बिजली विभाग के अधिकारी कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे थे।
विधायक भावना बोहरा बिना किसी पूर्व सूचना के सीधे बिजली विभाग के कार्यालय जा पहुंचीं। वहां उन्होंने अधिकारियों को जमकर क्लास लगाई और स्पष्ट शब्दों में कहा कि जनता को परेशानी में डालकर दफ्तरों में आराम फरमाना नहीं चलेगा। उन्होंने अधिकारियों से पेंडिंग आवेदनों और बिजली आपूर्ति की स्थिति पर तुरंत जवाब तलब किया। यह मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया कि कैसे एक जनप्रतिनिधि को खुद सड़क पर उतरकर दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
दूसरी तरफ, कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम का रुख और भी सख्त नजर आया। बलरामपुर-रामानुजगंज और आसपास के इलाकों में सड़कों की दुर्दशा और निर्माण कार्य में हो रही देरी को लेकर जनता में भारी आक्रोश था।
जब मंत्री जी ने क्षेत्र का दौरा किया और सड़कों की बदहाल हालत देखी, तो उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों की मीटिंग में सख्त नाराजगी जताई। सिर्फ चेतावनी ही नहीं दी, बल्कि काम में लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों को निलंबित (Suspend) करने का आदेश दे दिया। उनका साफ संदेश था—काम में कोताही और भ्रष्टाचार किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा, चाहे अफसर कितना भी बड़ा क्यों न हो।
सिर्फ भावना बोहरा या रामविचार नेताम ही नहीं, प्रदेश के अन्य हिस्सों से भी ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं:
अस्पतालों और राशन दुकानों में औचक निरीक्षण: प्रदेश के कई अन्य विधायक अपने-अपने क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों, धान खरीदी केंद्रों और राशन दुकानों में औचक निरीक्षण के लिए पहुंच रहे हैं।
समय पर दफ्तर न पहुंचने वाले कर्मचारियों की क्लास: सरगुजा और बस्तर संभाग के कुछ इलाकों में जनप्रतिनिधियों ने दफ्तरों में अधिकारियों की अनुपस्थिति को लेकर कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की और ऑन-द-स्पॉट उपस्थिति रजिस्टर चेक किए।
सड़क और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांच: कई विधायकों ने खुद पीडब्ल्यूडी (PWD) और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के कामों का जायजा लिया और गुणवत्ता घटिया पाए जाने पर काम रोकने तथा जांच कराने के निर्देश दिए।
जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि जनता ने उन्हें चुना है, इसलिए सरकारी योजनाओं और बुनियादी सुविधाओं का लाभ हर हाल में आम लोगों तक पहुंचना चाहिए।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक विधायकों का यह कड़ा रुख क्यों दिख रहा है? इसके दो बड़े पहलू हैं:
1. जनता का दबाव: चुनाव जीतने के बाद जनता अपने विधायकों से सड़क, पानी, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार की उम्मीद करती है। जब निचले स्तर का प्रशासनिक अमला काम नहीं करता, तो जनता का दबाव सीधे जनप्रतिनिधियों पर आता है।
2. प्रशासनिक ढर्रे पर लगाम: अक्सर देखा गया है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में मैदानी अधिकारी ढिलाई बरतते हैं। विधायकों के इस कड़े रुख से निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों में एक डर और जवाबदेही का माहौल बनता है।
जनप्रतिनिधियों का अधिकारियों पर इस तरह भड़कना और एक्शन लेना सही है या यह प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है? क्या इस तरह की कड़ाई से वाकई जमीन पर बदलाव आएगा?
आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? हमें कमेंट करके जरूर बताएं।


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