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शनिवार, 22 दिसंबर 2012
गृहमंत्री साहब ! अपराध तो बढ़ेंगे ही ...
जब प्रदेश के गृह मंत्री शराब ठेकेदारों के हाथों थाने बिकने की सिर्फ बात करता हो, पुलिस कप्तान को निकम्मा तो कहता हो लेकिन कार्रवाई नहीं कर पाता हो तब अपराध तो बढ़ेगे ही । अब तो लोगों को सोच लेना चाहिए कि उनकी सुरक्षा उन्हें स्वयं करना है
क्योंकि वर्दी का सारा रौब तो यातायात सुधारने के बहाने की जाने वाली वसूली में निकल जाती है और थोड़ी बहुत ताकत बचती है वह वीआईपी ड्यूटी की भेंट चढ़ जाती है ।
भाजपा के इस दूसरे शासन काल में बढ़ते अपराध पर बेवजह कांग्रेसी हल्ला मचा रहे हैं । जब गृह मंत्री की बेबसी उनके शब्दों में बाहर आ रही हो तब भला पुलिस की मनमर्जी तो चलेगी ही । फिर कोई सरकार को कैसे दोष दिया जा सकता है ।
अब राजधानी की पुलिस को ही देख लीजीए । जो आई जी बने हंै उन पर एक आईपीएस राहूल शर्मा को लेकर गंभीर आरोप है लेकिन सरकार मुक्त में तनख्वाह देगी नहीं और काम लेना है तो भेज दिया रायपुर । फिर ऐसे अफसर की शायद सरकार को भी जरूरत है जो बेहद चालाक हो ।
इसके बाद पुलिस कप्तान दीपांशु काबरा को समझ ले । कहने को तो किसी भी आईपीएस को एक स्थान पर तीन साल से Óयादा नहीं रहना चाहिए लेकिन वे चार साल से कप्तानी संभाल रहे है । इस बीच कई गंभीर अपराध हुए । मन्नू नत्थानी से लेकर राजेश शर्मा जैसे अपराधी नहीं पकड़े जा सके । हत्या के कितने ही मामलों का पता नहीं चला । इस बीच कई थानेदार बदल गये । उनके नीचे के कई अधिकारी बदल गये । अपराधियों में दहशत पैदा करने वाले रत्नेश सिंह - शशिमोहन सिंह हो या मुकेश गुप्ता जैसे आई जी हो सब चले गए लेकिन काबरा साहब चार साल से जमें हुए हैं ।
राजधानी के थानों और यहां की थानेदारी के किस्से भी कम नहीं है । हर थाने के अपने किस्से है । मोटे तौर पर पीडि़तों को परेशान करने का आरोप के अलावा सटोरियों-जुआडिय़ों और अवैध शराब बेचने वालों से महिना वसूलने का आरोप साबित होने पर भी कुछ नहीं होता । खासकर पंडरी मोवा और टिकरापारा में तो थानेदारों के कारनामों से आम आदमी तक परेशान है । शिकायतें दर्ज करने की बजाय पीडि़तों को भगाकर थाने का आर सी सुधारने में ये माहिर है और यहि धोखे से मामला कप्तान तक चल दे तब भी कोइ्र फिक्र नहीं क्योंकि ऐसी शिकायतों को रद्दी की टोकरी में कैसे फेंकना हैे यह कप्तान साहब भी जानते हैं । और Óयादा हल्ला हुआ तो कुछ नहीं करना है बस एक आई आर लिख दो ।
भले ही राजधानी की पुलिस अपने यहां अपराध रोकने में फेल हो गई हो लेकिन पड़ोसी जिले में कुछ हुआ नहीं कि भरपूर नाकेबंदी की जाती है । अरे नाके बंदी करनी हो तो चौक चौराहों की बजाय प्रवेश स्थल पर कर लो लेकिन नहीं वहां जाने का झंझट कौन पाले । शहर में ही पकड़ लेंगे ।
ऐसा नहीं है कि दीपांशु काबरा जी चार साल से जमें है इसलिए रायपुर का यह हाल है । दूसरी जगह भी स्थिति अ'छी नहीं है ।
चांपा-जांजगीर, रायगढ़ में तो पुलिस अद्योग पतियों के इशारे पर काम कर रही है । जबकि अंबिकापुर सरगुजा में तो अब भी माफिया गिरी हो रही है । कोयला चोर हो या जंगल तस्कर सबसे पैसा मिल रहा है । जबकि बस्तर क्षेत्र में तो नक्सली दहशत उन्हें रोक रखी है । लेकिन वहां के पुलिस वालों के घरों के फर्नीचर किसी से छिपे नहीं है ।
पुलिस के दुश्मन मीडिया वाले है । नेता तो सेट हो जाते है । मामला बना दो नेता चुप । लेकिन मीडिया का तोड़ ढूंढना मुश्किल है ।
चलते - चलते ...
डाल्फिन स्कूल के संचालक राजेश शर्मा, वायदा कारोबारी मन्नू नत्थानी के अलावा शहर में ही दर्जन भर से Óयादा ईनामी अपराधी को पुलिस नहीं ढूढ़ पा रही है लेकिन सीबीआई जांच की सिफारिश नहीं होगी ? आखिर पुलिस भी जानती है कि .इनके पीछे किसका हाथ है ?
शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012
पार्षदों की चाहत, शहर वासी आहत...
राजधानी का नगर निगम इन दिनों राÓय सरकार के लिए राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है । सत्ता में बैठी राÓय सरकार के दो मंत्री अभी भी यह बात हजम नहीं कर पा रहे हैं कि जनता ने भाजपा को नकार दिया है । वे यह बात देखना ही नहीं चाहते कि उनकी पैसे की भूख को लोगों ने देख लिया है । निगम के अधिकारी भी सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं ।
आयुक्त के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हर हाल में राजधानी में ही रहना चाहते हैं । ऐसे में ठुकुर -सुहाती तो करनी ही पड़ेगी । फिर तहसील के पाप भी तो कम नहीं है ।
महापौर किरणमयी नायक तो अभी से विधानसभा चुनाव की तैयारी में है । विदेश यात्रा भी कम नहीं हो रहा है । छत्तीसगढिय़ा वाद को लेकर स्वाभिमान यात्रा अब पद के साथ गुम होने लगा है तभी तो प्रभारी महापौर मनोज कंदोई के हिस्से में चला जाता है । अब शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदर चंद धाड़ीवाल पर भी तो दबाव बनाना है और भाजपा तो राजनैतिक बैरी है ही ।
पहले इस राजनैतिक बैरी को साधने की कोशिश हुई । स्वयं सेवकों पर फूल बरसाये गये लेकिन जल्द ही यह बात समझ में आ गई कि इससे कोई फायदा नहीं है । इसलिए यह गलती दोहराई नहीं गई ।
अब व्यवस्था व नियम को लेकर सभापति संजय श्रीवास्तव और महापौर में ठन गई है । यानी शहर विकास से Óयादा राजनीति जरूरी है । और ऐसे में जब बैजनाथ पारा वार्ड में चुनाव हो तो राजनीति जोरदार होनी तय है ।
कांग्रेस को अब भी यहां मुस्लिम वोटों पर भरोसा है । जबकि भाजपा समझने लगी है कि वोट कहां से हासिल होंगे । लेकिन जनता भी समझ गई है कि जो लोग खड़े हैं उनमें वार्ड की चिंता किसे Óयादा है । पहले भी देश में कई चुनावों में किन्नरों की जीत हुई है । यहां भी एक किन्नर प्रत्याशी है ?
वैसे भी राजधानी के 70 पार्षदों का हाल जनता अ'छे से जान रही है । कौन पार्षद कहां से पैसे कमा रहा है किसी से छिपा नहीं है । गुमटी और पानठेला लगाने के एवज में कहां-कहां वसूली चल रही है । बगैर नक्शा स्वीकृत कैसे मकान बन रहे है और पार्षद को कितना मिल रहा है । यह भी छिपा नहीं है ।
हद तो यह है कि सफाई कर्मियों की उपस्थिति को लेकर भी पैसा कमाया जा रहा है। कई पार्षद के रिश्तेदार तो निगम के ठेकेदार तक बन गये है । और महिला पार्षदों से Óयादा तो उनके पति लगे रहते है भले ही पार्षद पति को लोग शार्ट कट में पाप कह रहे हो लेकिन इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता आखिर राजनीति तो मोटी चमड़ी वाले ही करते है ।
बंद आंख से ...
शंकर नगर क्षेत्र के एक पार्षद की दादागिरी चरम पर है । कार्यक्रम के लिए पैसा नहीं देने वाले गुमटी वाले को दूकान बंद कर भागना पड़ा । जब कब्जा ही अवैध हो तो पार्षद की दादागिरी ऐसी ही चलती है । दूसरा मामला स्टेशन क्षेत्र का है । भतीजे की ठेकेदारी की करतूत सड़क पर दिखने लगी है और पाप बाहर आने से रोका जा रहा है ।
गुरुवार, 20 दिसंबर 2012
गर्भाशय कांड के डाक्टरों से भी करोड़ों वसूली !
गर्भाशय कांड के डाक्टरों से भी करोड़ों वसूली !
रमन राज में चल रहा राम नाम की लूट !
छत्तीसगढ़ सरकार में मची राम नाम की लूट का एक और चौकाने वाला मामला उÓाागर हुआ है । पैसों की लालच में गर्भाशय निकालने के आरोपी डाक्टरों को बचाने करोड़ों रूपये वसूलने जाने का आरोप सामने आया है । लोगों की जान के एवज में चल रहे इस गोरख धंधे में प्रदेश सरकार के मंत्री से लेकर सचिव स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत की खबर है । छत्तीसगढ़ में सत्ता में बैठे लोगों की पैसे की हवस समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है । ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां भ्रष्टाचार की नदियां नहीं बह रही हो । स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कोल ब्लाक मामले में आरोपी है ओपन एक्सेस घोटाले से खनिज घोटाले, रतनजोत घोटाले में सीधे मुख्यमंत्री पर आरोप लग रहा है जबकि रोगदाबांध से लेकर सरकारी जमीनों के मामले भी गर्म है ।
स्वास्थ्य विभाग में घोटाला चरम पर है । हालत यह है कि सरकार गरीबों की जान की कीमत लगाने लगी है और गरीबों की जान से खिलवाड करने वाले डाक्टरों को बचाने तक पैसा वसूले जाने की चर्चा है ।
नेत्र कांड में अब तक करीब सौ लोगों की आंखे फोड़ दी गई और स्मार्ट कार्ड घोटाले के आरोपी को पकडऩे में भी प्रशासन असफल रहा है ।
ताजा सनसनीखेज मामला गर्भाशय कांड के डाक्टरों को बचाने का है । हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों की माने तो इस कांड में फंसे डाक्टरों को बचाने के एवज में करोड़ों रूपये वसूले गए है । ज्ञात हो कि ईलाज के नाम पर छत्तीसगढ़ के करीब दर्जनभर डाक्टरों ने बेवजह गर्भाशय निकालकर गरीबों से आपरेशन के एवज में पैसे वसूले थे । कम उम्र की इन महिलाओं का पैसे के लिए गर्भाशय निकालने का मामला जब प्रकाश में आया तो डाक्टरों की करतूत से अ'छे-अ'छे के रोंगटे खड़े हो गए ।
जांच में ऐसे सैकड़ों मामले सामने आये जिनमें डाक्टरों की करतूत सामने आई और जांच में दोष्शी पाये जाने वाले करीब 9 डाक्टरों का पंजीयन रद्द कर दिया गया ।
सूत्रों का क हना है कि पंजीयन रद्द होने से क्षेत्र के बाकी डाक्टरों में हड़कम्प मच गया और वे सरकार से आरपार की लड़ाई पर उतर आये ।
डाक्टरों की धमकी से घबराकर सरकार ने गर्भाशय कांड की एक और जांच शुरू करने की घोषणा कर दी और निलंबन समाप्त कर दिया ।
सूत्रों का कहना है कि डाक्टरों का निलंबन समाप्त करने प्रत्येक डाक्टरों से 50 लाख से लेकर एक करोड़ तक लिये गये । सूत्रों की माने तो यह रकम सचिव से लेकर डाक्टरों की जेब में पहुंच चुका है ।
स्लाटर हाऊस में तब्दिल होतते नर्सिंग होम के खिलाफ कार्रवाई की बजाय उनके प्रति सरकार का रवैया आश्चर्यजनक है । दूसरी तरफ निलंबित डाक्टरों ने बहाली के बाद फिर जोरशोर से अपना पुराना खेल शुरू कर देने की चर्चा है ।
रमन राज में भ्रष्टाचार के इस तरह के शर्मनाक खेल की चर्चा तो अब चौक चौराहों में होने लगी है ।
इधर गर्भाशय कांड के मामले की जांच की घोषणा तो कर दी गई है लेकिन सूत्रों का दावा है कि यह केवल विषय से ध्यान भटकाने के लिए किया गया है । जबकि वास्तविकता यह है कि लेनदेन का सारा मामला रफा दफा कर दिया गया है ।
रमन राज में चल रहा राम नाम की लूट !
छत्तीसगढ़ सरकार में मची राम नाम की लूट का एक और चौकाने वाला मामला उÓाागर हुआ है । पैसों की लालच में गर्भाशय निकालने के आरोपी डाक्टरों को बचाने करोड़ों रूपये वसूलने जाने का आरोप सामने आया है । लोगों की जान के एवज में चल रहे इस गोरख धंधे में प्रदेश सरकार के मंत्री से लेकर सचिव स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत की खबर है । छत्तीसगढ़ में सत्ता में बैठे लोगों की पैसे की हवस समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है । ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां भ्रष्टाचार की नदियां नहीं बह रही हो । स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कोल ब्लाक मामले में आरोपी है ओपन एक्सेस घोटाले से खनिज घोटाले, रतनजोत घोटाले में सीधे मुख्यमंत्री पर आरोप लग रहा है जबकि रोगदाबांध से लेकर सरकारी जमीनों के मामले भी गर्म है ।
स्वास्थ्य विभाग में घोटाला चरम पर है । हालत यह है कि सरकार गरीबों की जान की कीमत लगाने लगी है और गरीबों की जान से खिलवाड करने वाले डाक्टरों को बचाने तक पैसा वसूले जाने की चर्चा है ।
नेत्र कांड में अब तक करीब सौ लोगों की आंखे फोड़ दी गई और स्मार्ट कार्ड घोटाले के आरोपी को पकडऩे में भी प्रशासन असफल रहा है ।
ताजा सनसनीखेज मामला गर्भाशय कांड के डाक्टरों को बचाने का है । हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों की माने तो इस कांड में फंसे डाक्टरों को बचाने के एवज में करोड़ों रूपये वसूले गए है । ज्ञात हो कि ईलाज के नाम पर छत्तीसगढ़ के करीब दर्जनभर डाक्टरों ने बेवजह गर्भाशय निकालकर गरीबों से आपरेशन के एवज में पैसे वसूले थे । कम उम्र की इन महिलाओं का पैसे के लिए गर्भाशय निकालने का मामला जब प्रकाश में आया तो डाक्टरों की करतूत से अ'छे-अ'छे के रोंगटे खड़े हो गए ।
जांच में ऐसे सैकड़ों मामले सामने आये जिनमें डाक्टरों की करतूत सामने आई और जांच में दोष्शी पाये जाने वाले करीब 9 डाक्टरों का पंजीयन रद्द कर दिया गया ।
सूत्रों का क हना है कि पंजीयन रद्द होने से क्षेत्र के बाकी डाक्टरों में हड़कम्प मच गया और वे सरकार से आरपार की लड़ाई पर उतर आये ।
डाक्टरों की धमकी से घबराकर सरकार ने गर्भाशय कांड की एक और जांच शुरू करने की घोषणा कर दी और निलंबन समाप्त कर दिया ।
सूत्रों का कहना है कि डाक्टरों का निलंबन समाप्त करने प्रत्येक डाक्टरों से 50 लाख से लेकर एक करोड़ तक लिये गये । सूत्रों की माने तो यह रकम सचिव से लेकर डाक्टरों की जेब में पहुंच चुका है ।
स्लाटर हाऊस में तब्दिल होतते नर्सिंग होम के खिलाफ कार्रवाई की बजाय उनके प्रति सरकार का रवैया आश्चर्यजनक है । दूसरी तरफ निलंबित डाक्टरों ने बहाली के बाद फिर जोरशोर से अपना पुराना खेल शुरू कर देने की चर्चा है ।
रमन राज में भ्रष्टाचार के इस तरह के शर्मनाक खेल की चर्चा तो अब चौक चौराहों में होने लगी है ।
इधर गर्भाशय कांड के मामले की जांच की घोषणा तो कर दी गई है लेकिन सूत्रों का दावा है कि यह केवल विषय से ध्यान भटकाने के लिए किया गया है । जबकि वास्तविकता यह है कि लेनदेन का सारा मामला रफा दफा कर दिया गया है ।
बुधवार, 19 दिसंबर 2012
स्वास्थ और नैतिकता ...
स्वास्थ और नैतिकता ...
अब राजनीति में नैतिकता नहीं रह गई है । रेल दुर्धटना में रेल मंत्री का इस्तीफा इतिहास बन गया है । अब नैतिकता कहीं बची है तो सिर्फ विरोधियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए ही बच गया है ।
छत्तीसगढ़ की राजनीति से तो यह पूरी तरह से गायब हो चुका है । सरकार में बैठे जो लोग कल तक नैतिकता की दुहाई देते नहीं थकते थे आज सत्ता में बैठते ही केवल पैसे कमाने में लग गये हैं ।
बालोद नेत्र कांड से लेकर बागबाहरा नेत्र कांड में करीब सौ लोगों की आंखे फोड़ दी गई । लेकिन कुछ नहीं हुआ । न स्वास्थ मंत्री का इस्तीफा आया और न ही किसी डाक्टर पर ही कार्रवाई की गई । आखिर गरिबों की जान की कीमत ही क्या है । Óयादा हल्ला मचेगा तो मुआवजा दे दो । कौन सा अपनी जेब से देना है ।
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है । सरकारी अस्पतालों में घोर लापरवाही चल रही है । और निजी अस्पताल तो किसी स्लाटर हाऊस से कम नहीं रह गया है । और सरकार में बैठे लोगों ने तो अपनी आंखे बंद कर ली है । ऐसे में आम आदमी के सामने क्या स्थिति है यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।
छत्तीसगढ़ सरकार भले ही लाख दावा करे लेकिन वह आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है । स्मार्ट कार्ड घोटाला हो या गर्भीशय कांड का मामला हो । सरकार डाक्टरों के सामने असहाय साबित हो चुकी है ।
अब तो आम लोगों में यह चर्चा साफ सुनी जा सकती है कि सरकार में बैठे लोगों का ध्येय सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना रह गया है उन्हें आम लोगों की जिंदगी से कोई लेना देना नहीं है ।
एक तरफ मुख्यमंत्री हर व्यक्ति के लिए &0 हजार रूपये तक का मुफ्त ईलाज करने के लिए योजना बना रहे है तो दूसरी तरफ ईलाज के अभाव में या डाक्टरों की लापरवाही से लोगों की जान पर बन आई है । एक तरफ जब सरकारी अस्पतालों में लापरवाह डाक्टर मौजूद हो, दवाई न हो तथा दूसरी तरफ निजी अस्पताल केवल पैसे कमाने की मशीन बन कर स्लाटर हाऊस में तब्दिल हो रहे हो तब &0 हजार नहीं &0 लाख रूपये के मुफ्त ईलाज की योजना बना दिया जाए । आम लोगों को क्या लाभ होगा ।
जब तक सरकार में बैठे लोगों की पैसों भूख समाप्त नहीं होगी किसी भी योजना का कोई मतलब नहीं रह जाता । ऐ वहीं भाजपा है जो सोते जागते राजनैतिक सुचिता और नैतिकता की बात करते नहीं थकते थे लेकिन सत्ता में आते ही सब भूल बैठे । ये वहीं मुख्यमंत्री है जिनकी छवि को लेकर भाजपा ने पिछला चुनाव जीता था लेकिन इस बार वे स्वयं कोयले की कालिख से पूते हुए है ।
ऐसे में मंत्रियों या अधिकारियों से नैतिकता की उम्मीद कैसे की जा सकती है ।
हद तो यह है कि चर्चा यहां तक आ पहुंची है कि आंख फोड़वा कांड के डाक्टरों को बचाने पैसे लिये जाते है । गर्भाशय कांड के दोषी आधा दर्जन डाक्टरों से उन्हें बचाने करोड़ो लिये गये । हद तो यह भी है कि सोची समझी इस गर्भाशय कांड के दोषियों के द्वारा आज भी उन्ही क्लीनिक में मजे से प्रेक्टिस चल रहा है ।
यह कैसी सरकार है जो आंख फोडऩे या गर्भाशय हजम करने या गरीबों के ईलाज वाले स्मार्ट कार्ड का पैसा हजम करने वालों पर कार्रवाई नहीं करती । हद तो यह भी है कि ऐसे मामले में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी हल्ला मचाने के अलावा Óयादा कुछ नहीं करती । चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर आम लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने वालों को बख्शने की यह कोशिश नैतिकता का कौन सा परिभाषा गढ़ रही है यह तो राजनैतिक दल ही जाने लेकिन यह ठीक नहीं है और यह बात राजनैतिक दलों को समझ लेना चाहिए कि एक और सर्वो"ा सत्ता है जिसकी लाठी बेआवाज होती है
अब राजनीति में नैतिकता नहीं रह गई है । रेल दुर्धटना में रेल मंत्री का इस्तीफा इतिहास बन गया है । अब नैतिकता कहीं बची है तो सिर्फ विरोधियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए ही बच गया है ।
छत्तीसगढ़ की राजनीति से तो यह पूरी तरह से गायब हो चुका है । सरकार में बैठे जो लोग कल तक नैतिकता की दुहाई देते नहीं थकते थे आज सत्ता में बैठते ही केवल पैसे कमाने में लग गये हैं ।
बालोद नेत्र कांड से लेकर बागबाहरा नेत्र कांड में करीब सौ लोगों की आंखे फोड़ दी गई । लेकिन कुछ नहीं हुआ । न स्वास्थ मंत्री का इस्तीफा आया और न ही किसी डाक्टर पर ही कार्रवाई की गई । आखिर गरिबों की जान की कीमत ही क्या है । Óयादा हल्ला मचेगा तो मुआवजा दे दो । कौन सा अपनी जेब से देना है ।
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है । सरकारी अस्पतालों में घोर लापरवाही चल रही है । और निजी अस्पताल तो किसी स्लाटर हाऊस से कम नहीं रह गया है । और सरकार में बैठे लोगों ने तो अपनी आंखे बंद कर ली है । ऐसे में आम आदमी के सामने क्या स्थिति है यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।
छत्तीसगढ़ सरकार भले ही लाख दावा करे लेकिन वह आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है । स्मार्ट कार्ड घोटाला हो या गर्भीशय कांड का मामला हो । सरकार डाक्टरों के सामने असहाय साबित हो चुकी है ।
अब तो आम लोगों में यह चर्चा साफ सुनी जा सकती है कि सरकार में बैठे लोगों का ध्येय सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना रह गया है उन्हें आम लोगों की जिंदगी से कोई लेना देना नहीं है ।
एक तरफ मुख्यमंत्री हर व्यक्ति के लिए &0 हजार रूपये तक का मुफ्त ईलाज करने के लिए योजना बना रहे है तो दूसरी तरफ ईलाज के अभाव में या डाक्टरों की लापरवाही से लोगों की जान पर बन आई है । एक तरफ जब सरकारी अस्पतालों में लापरवाह डाक्टर मौजूद हो, दवाई न हो तथा दूसरी तरफ निजी अस्पताल केवल पैसे कमाने की मशीन बन कर स्लाटर हाऊस में तब्दिल हो रहे हो तब &0 हजार नहीं &0 लाख रूपये के मुफ्त ईलाज की योजना बना दिया जाए । आम लोगों को क्या लाभ होगा ।
जब तक सरकार में बैठे लोगों की पैसों भूख समाप्त नहीं होगी किसी भी योजना का कोई मतलब नहीं रह जाता । ऐ वहीं भाजपा है जो सोते जागते राजनैतिक सुचिता और नैतिकता की बात करते नहीं थकते थे लेकिन सत्ता में आते ही सब भूल बैठे । ये वहीं मुख्यमंत्री है जिनकी छवि को लेकर भाजपा ने पिछला चुनाव जीता था लेकिन इस बार वे स्वयं कोयले की कालिख से पूते हुए है ।
ऐसे में मंत्रियों या अधिकारियों से नैतिकता की उम्मीद कैसे की जा सकती है ।
हद तो यह है कि चर्चा यहां तक आ पहुंची है कि आंख फोड़वा कांड के डाक्टरों को बचाने पैसे लिये जाते है । गर्भाशय कांड के दोषी आधा दर्जन डाक्टरों से उन्हें बचाने करोड़ो लिये गये । हद तो यह भी है कि सोची समझी इस गर्भाशय कांड के दोषियों के द्वारा आज भी उन्ही क्लीनिक में मजे से प्रेक्टिस चल रहा है ।
यह कैसी सरकार है जो आंख फोडऩे या गर्भाशय हजम करने या गरीबों के ईलाज वाले स्मार्ट कार्ड का पैसा हजम करने वालों पर कार्रवाई नहीं करती । हद तो यह भी है कि ऐसे मामले में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी हल्ला मचाने के अलावा Óयादा कुछ नहीं करती । चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर आम लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने वालों को बख्शने की यह कोशिश नैतिकता का कौन सा परिभाषा गढ़ रही है यह तो राजनैतिक दल ही जाने लेकिन यह ठीक नहीं है और यह बात राजनैतिक दलों को समझ लेना चाहिए कि एक और सर्वो"ा सत्ता है जिसकी लाठी बेआवाज होती है
मंगलवार, 18 दिसंबर 2012
छत्तीसगढ़ में दागी व विवादास्पद आईएएस अफसरों का जमावड़ा...
छत्तीसगढ़ में दागी व विवादास्पद आईएएस अफसरों का जमावड़ा...
छत्तीसगढ़ में कार्यरत अधिकांश आईएएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के इन अधिकारियों की विवादास्पद छवि के चलते जनता के करोड़ों रुपए डकारे जा रहे हैं। पदों का दुरुपयोग खुलेआम किया जा रहा है और डॉ. रमन सरकार इन बेकाबू होते अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उन्हें संरक्षण देने में आमदा है।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लूट-खसोट मची है वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के दामन में एक बदनुमा दाग बनकर सामने आने लगा है और एक बारगी तो सीधे सरकार से गठजोड़ दिखाई देने लगा है। हालत यह है कि बेहिसाब संपत्ति के मालिक इन अफसरों पर अंकुश लगाने में सरकार पूरी तरह विफल है। सर्वाधिक चर्चित अफसरों में इन दिनों बाबूलाल अग्रवाल का नाम सबसे ऊपर है। उनके साथ तो सीधे सीएम हाउस से गठजोड़ की खबर है जबकि अन्य अफसरों में विवेक ढांड का नाम भी सामने आया है। कहा जाता है कि रायपुर के इस अफसर ने अपने पद का दुरुपयोग इतनी चालाकी से किया है कि अ'छे-अ'छे नटवर लाल भी फेल हो जाए ताजा मामला तो उनके स्वयं के दुकान सजाने व गृहनिर्माण मंडल के बंगले को रेस्ट हाउस के लिए किराए से देने का है।
मालिक मकबूजा कांड में फंसे नारायण सिंह को किस तरह से पदोन्नति दी जा रही है यह किसी से छिपा नहीं है जबकि सुब्रत साहू पर तो धमतरी कांड के अलावा भी कई आरोप है। दूसरे चर्चित अफसरों में सी.के. खेतान का नाम तो आम लोगों की जुबान पर चढ गय़ा है। बारदाना से लेकर मालिक मकबूजा के आरोपों से घिरे खेतान साहब पर सरकार की मेहरबानी के चर्चे आम होने लगे हैं।
ताजा मामला जे. मिंज का है माध्यमिक शिक्षा मंडल के एमडी श्री मिंज पर रायपुर में अपर कलेक्टर रहते हुए जमीन प्रकरणों में अनियमितता बरतने का आरोप है। सरकारी जमीन को बड़े लोगों से सांठ-गांठ कर गड़बड़ी करने के मामले में उन्हें नोटिस तक दी जा चुकी है। एम.के. राउत पर तो न जाने कितने आरोप हैं जबकि अब तक ईमानदार बने डी.एस. मिश्रा पर भी आरोपों की झड़ी लगने लगी है। अजय सिंह, बैजेन्द्र कुमार, सुनील कुजूर तो आरोपों से घिरे ही है। आरपी मंडल के खिलाफ तो स्वयं भाजपाई मोर्चा खोल चुके हैं लेकिन वे भी महत्वपूर्ण पदों पर जमें हुए हैं। जबकि अनिल टूटेजा पर तो हिस्ट्रीशिटरों के साथ पार्टनरशिप के आरोप लग रहे हैं। कहा जाता है कि देवेन्द्र नगर वाले इस शासकीय सेवा से जुड़े अपराधी को हर बार बचाने में अनिल टुटेजा की भूमिका रहती है।
अधिकांश आईएएस की करतूतों का क'चा चि_ा सरकार के पास है आश्चर्य का विषय तो यह है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब इनमें से अधिकांश अधिकारियों की करतूत पर मोर्चा खोल चुकी है लेकिन सत्ता में आते ही इनके खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। बताया जाता है कि आईएएस और मंत्रियों के गठजोड़ की वजह से करोड़ों रुपए इनके जेब में जा रहा है। यहां तक कि जांच रिपोर्टों को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। बहरहाल छत्तीसगढ़ में बदनाम आईएएस अफसरों का जमावड़ा होता जा रहा है और सरकार भी इनकी करतूत पर आंखे मूंदे है।
छत्तीसगढ़ में कार्यरत अधिकांश आईएएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के इन अधिकारियों की विवादास्पद छवि के चलते जनता के करोड़ों रुपए डकारे जा रहे हैं। पदों का दुरुपयोग खुलेआम किया जा रहा है और डॉ. रमन सरकार इन बेकाबू होते अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उन्हें संरक्षण देने में आमदा है।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लूट-खसोट मची है वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के दामन में एक बदनुमा दाग बनकर सामने आने लगा है और एक बारगी तो सीधे सरकार से गठजोड़ दिखाई देने लगा है। हालत यह है कि बेहिसाब संपत्ति के मालिक इन अफसरों पर अंकुश लगाने में सरकार पूरी तरह विफल है। सर्वाधिक चर्चित अफसरों में इन दिनों बाबूलाल अग्रवाल का नाम सबसे ऊपर है। उनके साथ तो सीधे सीएम हाउस से गठजोड़ की खबर है जबकि अन्य अफसरों में विवेक ढांड का नाम भी सामने आया है। कहा जाता है कि रायपुर के इस अफसर ने अपने पद का दुरुपयोग इतनी चालाकी से किया है कि अ'छे-अ'छे नटवर लाल भी फेल हो जाए ताजा मामला तो उनके स्वयं के दुकान सजाने व गृहनिर्माण मंडल के बंगले को रेस्ट हाउस के लिए किराए से देने का है।
मालिक मकबूजा कांड में फंसे नारायण सिंह को किस तरह से पदोन्नति दी जा रही है यह किसी से छिपा नहीं है जबकि सुब्रत साहू पर तो धमतरी कांड के अलावा भी कई आरोप है। दूसरे चर्चित अफसरों में सी.के. खेतान का नाम तो आम लोगों की जुबान पर चढ गय़ा है। बारदाना से लेकर मालिक मकबूजा के आरोपों से घिरे खेतान साहब पर सरकार की मेहरबानी के चर्चे आम होने लगे हैं।
ताजा मामला जे. मिंज का है माध्यमिक शिक्षा मंडल के एमडी श्री मिंज पर रायपुर में अपर कलेक्टर रहते हुए जमीन प्रकरणों में अनियमितता बरतने का आरोप है। सरकारी जमीन को बड़े लोगों से सांठ-गांठ कर गड़बड़ी करने के मामले में उन्हें नोटिस तक दी जा चुकी है। एम.के. राउत पर तो न जाने कितने आरोप हैं जबकि अब तक ईमानदार बने डी.एस. मिश्रा पर भी आरोपों की झड़ी लगने लगी है। अजय सिंह, बैजेन्द्र कुमार, सुनील कुजूर तो आरोपों से घिरे ही है। आरपी मंडल के खिलाफ तो स्वयं भाजपाई मोर्चा खोल चुके हैं लेकिन वे भी महत्वपूर्ण पदों पर जमें हुए हैं। जबकि अनिल टूटेजा पर तो हिस्ट्रीशिटरों के साथ पार्टनरशिप के आरोप लग रहे हैं। कहा जाता है कि देवेन्द्र नगर वाले इस शासकीय सेवा से जुड़े अपराधी को हर बार बचाने में अनिल टुटेजा की भूमिका रहती है।
अधिकांश आईएएस की करतूतों का क'चा चि_ा सरकार के पास है आश्चर्य का विषय तो यह है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब इनमें से अधिकांश अधिकारियों की करतूत पर मोर्चा खोल चुकी है लेकिन सत्ता में आते ही इनके खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। बताया जाता है कि आईएएस और मंत्रियों के गठजोड़ की वजह से करोड़ों रुपए इनके जेब में जा रहा है। यहां तक कि जांच रिपोर्टों को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। बहरहाल छत्तीसगढ़ में बदनाम आईएएस अफसरों का जमावड़ा होता जा रहा है और सरकार भी इनकी करतूत पर आंखे मूंदे है।
रविवार, 16 दिसंबर 2012
उद्योगों की गुण्डागर्दी पर सरकारी चुप्पी !
ऐसा नहीं है कि वंदना समूह की मनमानी की कहानी समाप्त हो गई है वह बेधड़क
जारी है लेकिन ताजा मामला दुर्ग जिले के अहिवारा के समीप स्थापित हो रहे जे
के लक्ष्मी सीमेंट की गुण्डागर्दी का है । एक तरफ सरकार इनवेस्टर मीट के
नाम पर करोड़ों खर्च कर उद्योगों को भरपूर सुविधा देने की घोषणा करती है
दूसरी तरफ यहां आकर उद्योग गुण्डागर्दी कर रहे है क्या ऐसे में उद्योग यहां
आने चाहिए ?
विशेष प्रतिनिधि
ऐसा नहीं है कि वंदना समूह की
मनमानी की कहानी समाप्त हो गई है वह बेधड़क जारी है लेकिन ताजा मामला दुर्ग
जिले के अहिवारा के समीप स्थापित हो रहे जे के लक्ष्मी सीमेंट की
गुण्डागर्दी का है । एक तरफ सरकार इनवेस्टर मीट के नाम पर करोड़ों खर्च कर
उद्योगों को भरपूर सुविधा देने की घोषणा करती है दूसरी तरफ यहां आकर उद्योग
गुण्डागर्दी कर रहे है क्या ऐसे में उद्योग यहां आने चाहिए ?
पिछले
चार अंको में हमने वन्दना समूह के करतूतों पर विस्तार से प्रकाश डाला था इस
बार एक और उद्योग के कारनामें बताये जा रहे है । इस उद्योग को जमीन दिलाने
शासन प्रशास
न ने न केवल फर्जी जनसुनवाई की
बल्कि विरोध करने वाले ग्रामीणों की पिटाई व गिरफ्तारी भी हुई । हालत यह
हे कि गांव वाले आन्दोलित हे लेकिन विपक्षी कांग्रेस के नेता नदारत है ।
स्वाभिमान मंच ने जरूर यहां किसानों व गांव वालों का साथ दिया लेकिन सरकार
तो हर हाल में उद्योग के साथ खड़ा दिख रहा है ।
छत्तीसगढ़ सरकार की
नीतियों के चलते जल जंगल जमीन और दवा तक में उद्योगों का हक होने लगा है ।
अहिवारा विधानसभा क्षेत्र खासाडीह अहिवारा, गिरहोला,भलपुरी खुई, सेमरिया के
किसान इन दिनों आन्दोलित है उनका न केवल जेके लक्ष्मी सीमेंट प्रबंधक पर
गलत तरीके से जमीन हासिल करने का आरोप है बल्कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा
का भी आरोप है । आश्चर्य का विषय तो यह हे कि यह संयंत्र लगभग पूरी तरह
कृषि भूमि पर स्थापित हे । लगभग दो हजार एकड़ जमीन कौडिय़ों के मोल खरीदने
में सरकार की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता सूत्रों की माने तो लघु
उद्योग लगाने के नाम पर किसानों से जमीन ट्रकड़े-ट्रकड़े में ली गई और
गांव की सरकारी जमीनों पर बेतहाशा कब्जा किये जाने का आरोप किसान लगा रहे
हें । यहां तक कि बगीचे, चरागन और श्मशान घाट तक उद्योग में शामिल कर लिये
गए और जब गांव वालों ने इसका विरोध किया तो उनके खिलाफ ही कार्रवाई की जा
रही हे ।
सूत्रों की माने तो संयंत्र प्रबंधन ने किसानों को उद्योंगों
में नौकरी देने का झांसा देकर कौडिय़ों के मोल जमीन हथियायी और अब नौकरी
देने से मना किया जा रहा है । यहां तक कि कंपनी के लेटर पैड पर नौकरी का
आश्वासन देने की चर्चा है और ऐसी शिकायतों पर पुलिस कार्रवाई करने से साफ
मुकर रही है । इधर अपने को ठगा महसूस कर किसान जब आन्दोलन करने लगे तो
उन्हें सुरक्षा गार्डो से पिटवाया गया और जब वे थाने पहुंचे तो वहां भी
उनकी सुनवाई नहीं हुई ।
इधर किसानों के मुताबिक संयंत्र स्थापना से
पहले होने वाली जनसुनवाई भी नहीं हुई और पर्यावारण मंडल मे उद्योग स्थापना
की अनुमति भी दे दी । यही नहीं जनसुनवाई का विज्ञापन जानबहुझकर दिल्ली और
रायपुर से प्रकाशित होने वाले ऐसे अखबार में कराया गया जिन्हें अहिवारा
क्षेत्र के लोग ठीक से जानते ही नहीं है । सूत्रों की माने तो उद्योग से ही
विकास की रणनीति की अवधारणा पर चल रही भाजपा की रमन सरकार को ग्रामीणों की
तकलीफ से कोइ्र सरोकार नहीं है जबकि उद्योगों को बिजली पानी जमीन की
सुविधाएं दी जा रही है ।
छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों के चलते जल जंगल जमीन और दवा तक में उद्योगों का हक होने लगा है । अहिवारा विधानसभा क्षेत्र खासाडीह अहिवारा, गिरहोला,भलपुरी खुई, सेमरिया के किसान इन दिनों आन्दोलित है उनका न केवल जेके लक्ष्मी सीमेंट प्रबंधक पर गलत तरीके से जमीन हासिल करने का आरोप है बल्कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा का भी आरोप है । आश्चर्य का विषय तो यह हे कि यह संयंत्र लगभग पूरी तरह कृषि भूमि पर स्थापित हे । लगभग दो हजार एकड़ जमीन कौडिय़ों के मोल खरीदने में सरकार की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता सूत्रों की माने तो लघु उद्योग लगाने के नाम पर किसानों से जमीन ट्रकड़े-ट्रकड़े में ली गई और गांव की सरकारी जमीनों पर बेतहाशा कब्जा किये जाने का आरोप किसान लगा रहे हें । यहां तक कि बगीचे, चरागन और श्मशान घाट तक उद्योग में शामिल कर लिये गए और जब गांव वालों ने इसका विरोध किया तो उनके खिलाफ ही कार्रवाई की जा रही हे ।
सूत्रों की माने तो संयंत्र प्रबंधन ने किसानों को उद्योंगों में नौकरी देने का झांसा देकर कौडिय़ों के मोल जमीन हथियायी और अब नौकरी देने से मना किया जा रहा है । यहां तक कि कंपनी के लेटर पैड पर नौकरी का आश्वासन देने की चर्चा है और ऐसी शिकायतों पर पुलिस कार्रवाई करने से साफ मुकर रही है । इधर अपने को ठगा महसूस कर किसान जब आन्दोलन करने लगे तो उन्हें सुरक्षा गार्डो से पिटवाया गया और जब वे थाने पहुंचे तो वहां भी उनकी सुनवाई नहीं हुई ।
इधर किसानों के मुताबिक संयंत्र स्थापना से पहले होने वाली जनसुनवाई भी नहीं हुई और पर्यावारण मंडल मे उद्योग स्थापना की अनुमति भी दे दी । यही नहीं जनसुनवाई का विज्ञापन जानबहुझकर दिल्ली और रायपुर से प्रकाशित होने वाले ऐसे अखबार में कराया गया जिन्हें अहिवारा क्षेत्र के लोग ठीक से जानते ही नहीं है । सूत्रों की माने तो उद्योग से ही विकास की रणनीति की अवधारणा पर चल रही भाजपा की रमन सरकार को ग्रामीणों की तकलीफ से कोइ्र सरोकार नहीं है जबकि उद्योगों को बिजली पानी जमीन की सुविधाएं दी जा रही है ।
शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012
कप्तान पर भारी पड़ते थानेदार...
कप्तान पर भारी पड़ते थानेदार...
राÓय के नये डीजीपी राम निवास यादव ने आते ही अपनी ताकत पीएचक्यू यानी पुलिस मुख्यालय में दिखा दी । इस यादवी फेरबदल का असर क्या होगा यह तो वही जाने लेकिन मुख्यालय की चर्चा सड़कों तक पहुचने लगी है । सरकार नहीं चाहती थी कि इस चुनावी साल में कोई भ्रष्ट अफसरों को लेकर कोई बखेड़ा खड़ा हो इसलिए डीएस अवस्थी को छापामारी से हटा दिया ।
अब सरकार के लिए इतना तो करना ही था आखिर सिनियर संत कुमार पासवान को नजर अंदाज कर रामनिवास यादव पर जो भरोसा किया गया है । यह सरकार तो वैसे भी भ्रष्टाचारियों की संरक्षक मानी जाती है ऐसे में चुनावी साल बहाना ही है और जब प्रदेश के लोकतंात्रिक मुखिया पर ही कोयले की कालिख पूती हो तो फिर उनसे इससे Óयादा उम्मीद बेमानी है ।
हाथ-पांव तोडऩे के लिए चर्चित आई जी मुकेश गुप्ता तो स्वयं हटना चाहते थे और फिर सरकार भी नहीं चाहती थी कि मुकेश गुप्ता को लेकर कार्यकर्ताओं के मन में उठने वाले सवालों का सामना करें इसलिए उन्हें भी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया लेकिन ये क्या जिसे बिठाया गया उस पर कम आरोप नहीं है । जी पी सिंग को आईजी बनाते समय शायद यह नहीं सोचा गया कि उन पर तो सीधे आई पी एस राहूल शर्मा की मौत को लेकर गंभीर आरोप है । और राजधानी के आई जी पर जब ऐसे आरोप हो तो सवाल उठने से रोक पाना आसान नहीं है । हालांकि पुलिस वालों को ऐसे आरोप से फर्क नहीं पड़ता लेकिन सरकार को फर्क पड़ सकता है । राजधानी के दिग्गज मंत्रियों की सलाह से यदि जीपी सिंग को आई जी बनाया गया है तो फिर सांसद रमेश बैस या नंदकुमार साय कितना भी पुलिस को नियंत्रण करने की बात करें कोई मतलब नहीं है ।
वैसे भी बैस जी कब मुंह खोले और कब पलटी मार दे कोई ठीकाना नहीं है । भतीजे को पड़ी तो बोल दिये । बाद में ऐसा नहीं कहा करने में कितनी देर लगेगी । यानी पुलिस को क्लीन चिट मिलना तय है । नहीं तो गृहमंत्री यदि किसी पुलिस कप्तान को निकम्मा कहे और उसके बाद भी कप्तानी रहे यह ल"ााजनक बात नहीं मानी जाती ।
राजधानी में चार साल से जमें पुलिस कप्तान दीपांशु काबरा भले ही खुशबू के अपहरकर्ताओं को पकडऩे के लिए अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन सच तो यह है कि जिले के कई थानेदार उनकी नहीं सुनते ।
अब मोवा थाने का ही मामला ले । यहां पदस्थ श्रीमती संध्या द्विवेदी की रोज शिकायत हो रही है । यहां लूट की घटना को चोरी बता दिया जाता है । अवैध शराब से लेकर जुआरियों और सटांरिये तक से महिने वसुलने की शिकायतें है । बिल्डरों के पक्ष में पीढि़तों को चमकाने की शिकायत है । अपराधियों से गठजोड़ की तो शिकायतों का अंबार है लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई ही नहीं होती है ।
अब तो दहेज प्रताडि़त एक महिला Óाया शर्मा ने मोवा थाने पर रिपोर्ट नहीं लिखने की शिकायत कर दी है लेकिन कप्तान को इससे मतलब ही नहीं है । अब लोग कहते रहे हैं कि थानेदार के आगे कप्तान की नहीं चलती । न तो सरकार को फर्क पड़ता है और न ही मुख्यालय में बैठे अफसरों को ही इससे फर्क पड़ता है । आखिर पुलिस की छवि ऐसी बनी रहेगी तभी तो खर्चा चलेगा ।
खर्चा चलेगा तभी तो सेहत बनेगी । तभी तो फरार होने वाले कैदियों को पकडऩे में ताकत लगेगी । अब कांकेर में बस स्टैण्ड से तीन जवानों को चकमा देकर कैदी भाग गया तो इसमें पुलिस वालों की गलती कैसे ? लेकिन लोगों का ध्यान रखना है इसलिए तीनों निलंबित कर दिये गये । लोगों की याददाश्त Óयादा होती नहीं इसलिए कुछ दिन में बहाल कर दिये जायेगे । आखिर बल की कमी है और बल की कमी न भी हो तब भी बैठा के वेतन देना ठीक नहीं है । तभी तो थाने में हुई हत्याओं के दोषी पुलिस कर्मी मजे से दूसरी जगह डूयूटी बजा रहे हैं मरने वाले का क्या । वह लौट के तो आयेगा नहीं लेकिन जो दोषी जिन्दा है उन्हें कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए ।
राÓय के नये डीजीपी राम निवास यादव ने आते ही अपनी ताकत पीएचक्यू यानी पुलिस मुख्यालय में दिखा दी । इस यादवी फेरबदल का असर क्या होगा यह तो वही जाने लेकिन मुख्यालय की चर्चा सड़कों तक पहुचने लगी है । सरकार नहीं चाहती थी कि इस चुनावी साल में कोई भ्रष्ट अफसरों को लेकर कोई बखेड़ा खड़ा हो इसलिए डीएस अवस्थी को छापामारी से हटा दिया ।
अब सरकार के लिए इतना तो करना ही था आखिर सिनियर संत कुमार पासवान को नजर अंदाज कर रामनिवास यादव पर जो भरोसा किया गया है । यह सरकार तो वैसे भी भ्रष्टाचारियों की संरक्षक मानी जाती है ऐसे में चुनावी साल बहाना ही है और जब प्रदेश के लोकतंात्रिक मुखिया पर ही कोयले की कालिख पूती हो तो फिर उनसे इससे Óयादा उम्मीद बेमानी है ।
हाथ-पांव तोडऩे के लिए चर्चित आई जी मुकेश गुप्ता तो स्वयं हटना चाहते थे और फिर सरकार भी नहीं चाहती थी कि मुकेश गुप्ता को लेकर कार्यकर्ताओं के मन में उठने वाले सवालों का सामना करें इसलिए उन्हें भी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया लेकिन ये क्या जिसे बिठाया गया उस पर कम आरोप नहीं है । जी पी सिंग को आईजी बनाते समय शायद यह नहीं सोचा गया कि उन पर तो सीधे आई पी एस राहूल शर्मा की मौत को लेकर गंभीर आरोप है । और राजधानी के आई जी पर जब ऐसे आरोप हो तो सवाल उठने से रोक पाना आसान नहीं है । हालांकि पुलिस वालों को ऐसे आरोप से फर्क नहीं पड़ता लेकिन सरकार को फर्क पड़ सकता है । राजधानी के दिग्गज मंत्रियों की सलाह से यदि जीपी सिंग को आई जी बनाया गया है तो फिर सांसद रमेश बैस या नंदकुमार साय कितना भी पुलिस को नियंत्रण करने की बात करें कोई मतलब नहीं है ।
वैसे भी बैस जी कब मुंह खोले और कब पलटी मार दे कोई ठीकाना नहीं है । भतीजे को पड़ी तो बोल दिये । बाद में ऐसा नहीं कहा करने में कितनी देर लगेगी । यानी पुलिस को क्लीन चिट मिलना तय है । नहीं तो गृहमंत्री यदि किसी पुलिस कप्तान को निकम्मा कहे और उसके बाद भी कप्तानी रहे यह ल"ााजनक बात नहीं मानी जाती ।
राजधानी में चार साल से जमें पुलिस कप्तान दीपांशु काबरा भले ही खुशबू के अपहरकर्ताओं को पकडऩे के लिए अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन सच तो यह है कि जिले के कई थानेदार उनकी नहीं सुनते ।
अब मोवा थाने का ही मामला ले । यहां पदस्थ श्रीमती संध्या द्विवेदी की रोज शिकायत हो रही है । यहां लूट की घटना को चोरी बता दिया जाता है । अवैध शराब से लेकर जुआरियों और सटांरिये तक से महिने वसुलने की शिकायतें है । बिल्डरों के पक्ष में पीढि़तों को चमकाने की शिकायत है । अपराधियों से गठजोड़ की तो शिकायतों का अंबार है लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई ही नहीं होती है ।
अब तो दहेज प्रताडि़त एक महिला Óाया शर्मा ने मोवा थाने पर रिपोर्ट नहीं लिखने की शिकायत कर दी है लेकिन कप्तान को इससे मतलब ही नहीं है । अब लोग कहते रहे हैं कि थानेदार के आगे कप्तान की नहीं चलती । न तो सरकार को फर्क पड़ता है और न ही मुख्यालय में बैठे अफसरों को ही इससे फर्क पड़ता है । आखिर पुलिस की छवि ऐसी बनी रहेगी तभी तो खर्चा चलेगा ।
खर्चा चलेगा तभी तो सेहत बनेगी । तभी तो फरार होने वाले कैदियों को पकडऩे में ताकत लगेगी । अब कांकेर में बस स्टैण्ड से तीन जवानों को चकमा देकर कैदी भाग गया तो इसमें पुलिस वालों की गलती कैसे ? लेकिन लोगों का ध्यान रखना है इसलिए तीनों निलंबित कर दिये गये । लोगों की याददाश्त Óयादा होती नहीं इसलिए कुछ दिन में बहाल कर दिये जायेगे । आखिर बल की कमी है और बल की कमी न भी हो तब भी बैठा के वेतन देना ठीक नहीं है । तभी तो थाने में हुई हत्याओं के दोषी पुलिस कर्मी मजे से दूसरी जगह डूयूटी बजा रहे हैं मरने वाले का क्या । वह लौट के तो आयेगा नहीं लेकिन जो दोषी जिन्दा है उन्हें कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए ।
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