सोमवार, 30 अगस्त 2010

सालों बाद निमोरा में दिखा जागरूकता...

राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को ग्रहण लगने लगा था। मालिको के सरकारी विज्ञापन के प्रति जीभ लपलपाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने छत्तीसगढ़ की पहचान पर ही सवाल उठाये थे। बाल्को कांड हो या मंत्रियों की घपलेबाजी, आईएएस अफसरों की काली करतूतें हो या डीजी का साहित्य प्रेम सब कुछ सरकारी विज्ञापन की बलि चढ़ रही थी। ऐसे में धरसींवा के पास निमोरा में हुई तीन मासूमों की हत्या केबाद छत्तीसगढ़ के मीडिया ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की वह यहां के पुराने तेवर को ताजा कर दिया। हर मामले को कुरेदकर सरकार को कार्रवाई के लिए मजबूर करने वाला तेवर ही छत्तीसगढ़ के मीडिया की पहचान है। बहुत संभव है अब यह तेवर फिर से दिखने लगेगा हम यही आशा कर सकते हैं...!
सनत फिर भास्कर में
अपनी सीधे साधे छवि के लिए जाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार सनत चतुर्वेदी ने फिर दैनिक भास्कर ज्वाईन कर लिया है। जनसत्ता से वे भास्कर क्यों गये यह पता नहीं चला है पर तीसरी बार वे भास्कर को सेवा दे रहे हैं। कितने दिन देंगे? सवाल कायम है?
सुरेन्द्र का भ्रम टूटा
देशबंधु को अपना सब कुछ मानकर सुबह से रात तक सेवा बजाने वाले सुरेन्द्र शुक्ला ने पत्रिका की ओर रूख किया तो कई लोग अचरज में रह गये कि आखिर देशबंधु में यह सब क्या हो रहा है। अब तो दामादों का खौफ भी नहीं है। इसी तरह बेर ने नई दुनिया ज्वाईन कर लिया है।
पी. बुद्धदेव की वापसी
दैनिक समवेत शिखर से भास्कर रायपुर फिर रायपुर में सब कुछ बेच-बाच कर इंदौर गए भरत पी. बुद्धदेव को इंदौर रास नहीं आया और एक बार फिर वे दैनिक भास्कर आ गए हैं। उनका मकान खरीदना इन दिनों चर्चा में है।
डीबी का हंगामा
वैसे तो भास्कर हमेशा कुछ न कुछ नया कर सुर्खियों में बना रहना चाहता है। पत्रिका के आने की हड़बड़ाहट भी भास्कर में झलकने लगी है पहले ही नेशनल लुक और नई दुनिया से झटका खा चुके भास्कर समूह कोई रिस्क लेना नहीं चाहता इसलिए डीबी स्टार शुरु कर दिया है। अब स्टोरी इसमें क्या जा रही है अभी मत पूछना? कैसे भी हो हंगामा खड़ा होना चाहिए।
पैसा कम दो दस्तखत अधिक में कराओ
कांग्रेस के प्रतिष्ठित परिवार द्वारा निकाले जा रहे अखबार में इन दिनों यही सब कुछ हो रहा अब कर्मचारी तो कर्मचारी, पत्रकार भी मजबूर है नौकरी जो आसानी से नहीं मिलती। दरअसल ऐसे दस्तखत करने वाले पत्रकार ही कब थे।

मालिक  को खुश रखो नौकरी दो जगह करो
कई पत्रकारों के लिए यह जुमला कारगर हुआ है कि ऐड़ा बनकर पेड़ा खाओ। प्रेस लाईन में दत्तक पुत्र के रूप में मशहूर पाटन छाप पत्रकार ने अब दो जगह नौकरी बजाना शुरू कर दिया है। उन्हें ‘अ’ रास आ गया है पहले भी खाने पीने के नाम से बदनाम इस युवा पत्रकार के सीधाई का लोहा सभी मानते हैं।
लुक ही नहीं दिख रहा...
भास्कर को हलाकान करने वाले नेशनल लुक अब मैनेजमेंट की वजह से गायब होते जा रहा है खबरें अब भी अच्छी है लेकिन जब बांट ही नहीं पाओंगे तो पढ़ेगा कौन ? सरकारी विज्ञापन लेते रहो।
तरूण की पीड़ा
पहले ही निगम की तोडफ़ोड़ से पीडि़त सांध्य दैनिक तरूण छत्तीसगढ़ इन दिनों पार्किंग की वजह से परेशान है। नियमानुसार बिल्डिंग बनी है या नहीं यह तो निगम और तरूण छत्तीसगढ़ वाले जाने लेकिन जिस तरह से नवभारत ने टूटने वाले बिल्डिंगों की सूची में तरूण छत्तीसगढ़ का नाम छापा है उससे तरूण छत्तीसगढ़ बेहद खफा है लेकिन छोटा आदमी बड़ों का कर क्या सकता है?
और अंत में ...
पत्रकारों की जमीन पर अपनी बिल्डिंग तानने वाले एक सांध्य दैनिक के मालिक ने हाईरईश कमेटी से दस मंजिल का परमिशन क्या लिया अच्छे अच्छों की नींद उड़ गई। दूसरा सांध्य दैनिक अब जुगाड़ में है कि परमिशन कैसे लिया जाए।

रविवार, 29 अगस्त 2010

भाजपा में अय्याश व दागी मंत्रियों का जमावड़ा

सत्ता पाते ही सिद्धांत भूले भाजपाई
मप्र-छत्तीसगढ़ के  प्रभारी नाराज
 सत्ता पाते ही राम को  धोखा देने वाले भाजपाईयों की  लूटखसोट को  लेकर अब पार्टी के  सत्ता वाले प्रदेशों में चल रहे गफलत को  लेकर  पार्टी हाईकमान न केवल चिंतित है बल्कि  कड़ाई बरतने का  संकेत दिया है।
बताया जाता है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में इन दिनों मंत्रियों कि  करतूतों को  लेकर उच्च स्तर पर जबरदस्त बवाल मचा है और इन दोनों राज्यों में मंत्रियों की लूटखसोट व अय्याशी की  पुख्ता सबूत के  साथ शिकायत भी की  गई है।
मध्यप्रदेश के  प्रभारी और भाजपा के  राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार ने तो मध्यप्रदेश में मंत्रियों की  करतुत पर इतने क्रोधित  हुए कि उन्होंने सीधे प्रेस से ही कह दिया कि  मध्यप्रदेश के  दागी मंत्रियों को  सत्ता से जल्दी बाहर किया  जाना चाहिए यही नहीं 25 अगस्त को  तो वे यहां तक  कह गए कि  मध्यप्रदेश के  कई मंत्री अय्याशी में डुबे हैं और इन्हें तत्काल  हटाया जाना चाहिए।
बताया जाता है कि  छत्तीसगढ़ के  प्रभारी मंत्री श्री नड्डा भी छत्तीसगढ़ के कई मंत्रियों की  करतूत से बेहद खफा है और उन्होंने अपनी रिपोर्ट भी हाई·मान को  सौंप दी है। बताया जाता है कि श्री नड्डा को  यहांके  कई मंत्रियों खास·र बृजमोहन अग्रवाल, चन्द्रशेखर साहू, राजेश मूणत और मुख्यमंत्री त· ·ी शि·ायतें पुख्ता सबूत और अखबार में छपी खबरों के   साथ सौंपी गई है।
बताया जाता है कि  छत्तीसगढ़ के  कई मंत्रियों पर रातो रात करोड़पति व अरबपति बनने के   अलावा कार्यकर्ताओं के   साथ आए दिन होने वाले दुव्र्यवहार की भी शिकायत छत्तीसगढ़ के   प्रभारी श्री नड्डा से की  गई है।
बताया जाता है कि मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के   कुछ विधायको  ने न केवल प्रदेश प्रभारियों से बल्कि  हाईकमान से मिलकर स्थिति से अवगत करा दिया है।
भाजपा के   उच्च पदस्थ सूत्रों के   मुताबिक  हाईकमान नीतिन गडकरी जी इन दोनों राज्यों में पार्टी की स्थिति को  लेकर चिंतित है और आने वाले दिनों में वे कड़ा रूख अख्तियार कर सकते है।
वैसे भी भाजपा के   राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी सितम्बर के   पहले हफ्ते में छत्तीसगढ़ के   दौरे पर आ रहे है और कहा जा रहा है तब वे विधायको  से अलग-अलग मिलकर पार्टी की  स्थिति का  न केवल जायजा लेंगे बल्की  कुछ मंत्रियों को  उनकी  करतूत पर चेतावनी दे सकते हैं। हालांकइ  पार्टी हाईकमान को  खुश करने छत्तीसगढ़ सरकार हर संभव को शिश में लगा है।
बहरहाल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की  सरकार को  लेकर उच्च स्तर पर जबरदस्त हलचल है और कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसका  असर भी दिखेगा।

शनिवार, 28 अगस्त 2010

सतनाम धर्मसभा ने रावण जलाने से मना किया तो धर्मसेना भडक़ी

 सतनाम धर्मसेना ने इस साल रावण नहीं जलाने का आह्वान करते हुए पर्चे बांटना शुरु किया है और इसके विरोध में कवर्धा के धर्मसेना खड़ी हो गई है।
सतनाम धर्म सभा के अध्यक्ष केवल प्रकाश सतनामी के द्वारा वितरित पर्चे में कहा गया है कि रावण ने मनुवादी व्यवस्था को तोडऩे का कार्य किया है इसलिए रावण को पूजा जाना चाहिए। उन्होंने सतनामी समाज सहित आम लोगों से अपील की है कि इस बार दशहरे में रावण का वध न करो और न ही रावण का पुतला दहन करो।
हमारे कवर्धा संवाददाता के मुताबिक इस पर्चे का धर्मसेना ने सख्त विरोध किया है और ऐसे पर्चे बांटे जाने वाले के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

बृजमोहन ने दी छूट और हरे राम ने की लूट

दंतेवाड़ा में नक्सलियों की आड़ में लूट
 यह प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की दमदारी नहीं तो और क्या है कि जिस व्यक्ति का किसी भी सरकारी विभाग में सेवा नहीं है और जिसके संविलियन को हाईकोर्ट तक ने अवैध करार दिया और पीएससी ने तीन बार टर्न कर दिया ऐसे व्यक्ति को न केवल दंतेवाड़ा जिला का शिक्षा अधिकारी बनाया गया है बल्कि शिक्षा मिशन का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। बात इतनी ही नहीं है यहां चल रहे लूट-खसोट का यह आलम है कि नक्सली भी शरमा जाए।
कहा जाता है कि शिक्षा विभाग देश का भावी पीढ़ी तैयार करता है और जब इस विभाग को ही जब भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया जाए तो भावी पीढ़ी कैसे होगी इसकी कल्पना से ही होश उड़ जाते है। वैसे इस विभाग में शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल जिस तरह से दमदारी दिखा रहे हैं और तमाम भ्रष्ट और विवादास्पद लोगों को प्रमुख पदों पर बिठाया जा रहा है वह आने वाले समय के लिए घातक माना जा रहा है। तवारिस और बाम्बरा जैसे लोगों को तवज्जों दिए जाने के बाद सिंह जैसों को अपने बंगले में बिठाने के लिए चर्चित शिक्षा विभाग इन दिनों दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी एचआर शर्मा की कारगुजारियों और मंत्री के संरक्षण के कारण चर्चा में है।
एचआर शर्मा को दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी के साथ-साथ शिक्षा मिशन में जिला परियोजना समन्वयक का प्रभार भी दिया गया है। वक्त पढऩे पर राजनैतिक निष्ठा बदलने के आरोपित एचआर शर्मा कभी कवर्धा में असिसेंट प्राध्यापक रहे हैं। बताया जाता है कि तब इनकी निष्ठा कांग्रेस के प्रति थी और इसी के चलते इनके संविलियन का प्रयास कांग्रेस विधायक ने की थी लेकिन यह हो नहीं पाया और सत्ता बदलते ही इनके संविलियन का प्रयास भाजपा की महिला पूर्व सांसद ने की और इस तात्कालिन सांसद के चुनाव के लिए फंड भी दिया गया। इस प्रयास के चलते ही शिक्षा विभाग के आवेदन पर पीएससी ने 3 सामान्य पद में से एक पद विलोपित कर दिया था। कहा जाता है कि खेल यही से शुरु हुआ और जब एचआर शर्मा यानी हरेराम शर्मा की फाईल पहुंची तो पता चला कि उनका संविलियन ही अवैध है और भर्ती नियम 1982 की कंडिका 4 की अनदेखी की गई है और संविलियन किया गया है।
बताया जाता है कि मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने संविलियन रद्द कर दिया। इस सबके बाद भी वे दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी बनाए गए। नागरिक आपूर्ति निगम से हकाले जाने की अपनी कहानी है। दंतेवाड़ा में जिस पैमाने पर घपलेबाजी हो रहे हैं उसे सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए हैं जिसमें स्कूल भवन ढहाने से लेकर केश पेमेंट की लंबी दस्तान है। बताया जाता है कि इस सबकी शिकायत शिक्षा मंत्री से लेकर राज्यपाल तक की जाती रही है लेकिन नामालूम कारणों से कार्रवाई टलते रही है। बहरहाल दंतेवाड़ा शिक्षा और शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल इन मामलों में चर्चा में है देखना है मुख्यमंत्री इस मामले में क्या करते हैं?

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

नवभारत का कारनामा, किसमें है दम

पैसा पटाया नहीं बिल्डिंग बना दी
 लगता है छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की चीज नहीं है और यदि कही सरकार है भी तो वह केवल बड़े लोगों के मुठ्ठी में कैद है। अपने को तुरम खां कहने वाले मंत्री और छोटे-छोटे लोगों के कब्जों पर बुलडोजर चलाने वाले भी बड़े लोगों की जेबों में समा गए है। तभी तो सरकार को नियम कानून की सीख देने वाला नवभारत स्वयं ही नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए रजबंधा मैदान में अपनी बिल्डिंग खड़ा कर लेता है और पूरा शासन-प्रशासन नपुसंक की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठा है। तब न तो उन्हें नियम कानून ही नजर आता है और न ही इसमें कोई अपराध ही नजर आता है।
महिनेभर पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार पर टिप्पणी की थी कि आधे राज्य में शासन ही नहीं है तब कांग्रेसी भी चुप रह गए थे लेकिन अब इसकी जमीनी सच्चाई सामने आने लगी है कि सरकार किनके द्वारा चुनी जाती है और वह किसके हित के लिए काम करती है। मीडिया भी सरकार के गलत नीतियों की आलोचना करने से क्यों परहेज करती है।
दरअसल बेशकीमती जमीनों के बंदरबाट में जिस तरह से मीडिया खासकर प्रिंट मीडिया भागीदार बनते जा रही है उससे सरकार को मनमानी करने की छूट मिली हुई है। रायपुर में भी दो-पांच सौ छपने वाले अखबारों को भी जिस तरह से कौड़ी के मोल जमीन दी गई है और इन जमीनों का व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है वह सरकार और उसके पूरे कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है कि किस तरह से गलत लोगों को सरकार संरक्षण दे रही है। यहां हम छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित माने जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत को आबंटित जमीन और उस पर किए गए अवैधानिक निर्माण की चर्चा कर रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने दैनिक नवभारत को 1985-86 में रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक नम्बर 9, प्लांट नंबर 1 में से रकबा 60750 वर्ग फीट जमीन प्रेस स्थापना के लिए स्वीकृत की थी। इस घोषणा के साथ ही नवभारत को अग्रिम आधिपत्य मिल गया था और शासन ने निर्देश दिया था कि निर्धारित राशि पटाए जाने पर ही पट्टा निष्पादन किया जाए लेकिन नवभारत ने राज्य बनने के बाद तक न तो पैसा पटाया और न ही उसे पट्टा ही दिया गया। बावजूद नवभारत की बिल्डिंग बन गई। अब सवाल यह उठता है कि आखिर नवभारत को किस नियम के तहत बिल्डिंग बनाने की अनुमति दी गई। क्या बिल्डिंग का नक्शा पास कराया गया और नक्शा किस नियम के तहत पास किया गया। किस अधिकारी ने पास किया। इस समय इस निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई। ऐसे कितने ही सवाल है जो आम आदमी के जेहन में उठ रहे हैं। क्या नवभारत का इतना प्रभाव है कि किसी सरकार ने नियम विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ कार्रवाई नहीं की या सरकार सिर्फ बड़े लोगों का संरक्षक बनकर रह गई है।
ऐसे कई मामले हैं जो सरकार और नवभारत के सांठगांठ की कहानी को उजागर करता है। सब कुछ गलत फिर भी सरकार की तरफ से एडवांश? भू-उपयोग भी गलत होता रहा सरकार खामोश रही। एमजी रोड से लेकर मालवीय रोड, जीई रोड में कितने बार अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला तब किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई। क्या सरकार अब भी ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली रहेगी जो अपने प्रभाव और पैसों से गलत करे रहेगें।

बुधवार, 25 अगस्त 2010

देश का खजाना खाली, दलों में हरियाली

इन दिनों पूरे देश में यह बहस चल रही है कि सांसदों के वेतन भत्ते बढऩा चाहिए या नहीं बढऩा चाहिए। हमने आम आदमियों के बीच यह सवाल उठाया तो अब तक हमें एक भी व्यक्ति नहीं मिला जिन्होंने सांसदों के वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी पर सहमत हो। आखिर सांसद और विधायकों को वेतन क्यों? क्या जनसेवा के बदले मेवा वे सरकारी खजानों से कब तक लेते रहेंगे। आश्चर्य का विषय तो यह है कि जिंदल से लेकर हेमामालिनी तक को वेतन भत्ते और पेंशन चाहिए?
सांसद-विधायक अब पूरी तरह से व्यवसायी हो चुके हैं। समाज सेवा के बदले उन्हें मोटी तनख्वाह चाहिए और पेंशन भी चाहिए? ऐसा तो यह देश कतई नहीं था। फिर आजादी के सिर्फ 63 साल में ऐसा क्या हो गया कि सांसद विधायक नौकरों की तरह वेतन के लिए इतने लालायित हैं? आम लोगों ने तो कभी नहीं चाहा कि उनके जनप्रतिनिधि वे व्यक्ति बने जिनके लिए वेतन सर्वोच्च प्राथमिकता है और जिन लोगों को अपनी सेवा करानी होती है वे अपने हैसियत के अनुसार नौकर रख लेते हैं। ऐसे में आम आदमी के गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा मिल बांटकर डकारने की इस कोशिश को क्या कहेंगे।
दुखद स्थिति तो यह है कि अपने को समाजसेवी कहने वाले सैकड़ों सांसदों और हजारों विधायकों में से एक भी ऐसा नहीं है जो वेतन भत्ते या पेंशन नहीं लेने की घोषणा कर दे। 'माल ए मुफ्त दिल ए बेरहम' की तर्ज पर हम दो चार साल में वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी के लिए जरूर ये लोग लामबंद हो जाते हैं तब न पार्टी प्रतिद्वंद्विता ही आड़े आती है और न ही सिद्धांत मायने रखते हैं। आज भी इस देश में ऐसी पीढ़ी मौजूद है जो बगैर वेतन के समाजसेवा में लगे हैं। राजनीतिक दल ऐसे लोगों को अपनी पार्टियों में शामिल ही नहीं करना चाहते? हमारे बहुत से मित्र सांसद-विधायक है? उनका कहना है कि ऐसी घोषणाएं करने पर पार्टी निकाल बाहर करेगी? क्योंकि अमूमन सभी पार्टियों में यह परिपाटी है कि सांसद-विधायक अपने वेतन का एक हिस्सा पार्टी फंड में दे। पार्टी फंड में पैसा जमा होते होते यह स्थिति है कि पार्टियों के पास इफरात धन संपत्ति जमा हो गई है और देश खोखला होता जा रहा है।
कांग्रेस हो या भाजपा, माकपा हो या लोकदल, जनता दल आप किसी भी पार्टी का नाम ले लिजिए। इनकी चली तो पार्टी कार्यालय के नाम पर सरकारी जमीनों का जमकर बंदरबाट हुआ। जिला या प्रदेश स्तर तो छोड़ दिजिए कस्बों तक में कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीनें इन राजनैतिक दलों को दी गई। देश की इस विषम स्थिति में जब आम आदमी को दो वक्त का खाना ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। पीने का पानी नहीं मिल रहा है और स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में दुरस्थ अंचल के लोग बेमौत मारे जा रहे हैं तब भला हमारे सांसदों की वेतन में बढ़ोत्तरी के लिए तीन-पांच करना निकृष्ठता नहीं तो और क्या है?
हमारा यह महाअभियान ऐसे ही अंधेरगर्दी के खिलाफ है। हम चाहते हैं सांसदों-विधायकों के वेतन-पेंशन बंद हो और जिन्हें डाक्टरों ने समाजसेवा करने कहा है वे बगैर वेतन का समाजसेवा करे। हम आम लोगों में यही जागरूकता पैदा कर रहे हैं कि वे अब ऐसे लोगों को ही अपना प्रतिनिधि चुने जो वेतन पेंशन नहीं लेने की घोषणा करें।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कांग्रेस-भाजपा में सांठ-गांठ

परमाणु दायित्व विधेयक को लेकर कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ को लेकर लालू-मुलायम और वाम दलों ने खूब हंगामा किया। इस सांठ-गांठ के चलते गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बचाने का भी आरोप है? क्या सचमुच कांग्रेस और भाजपा में इस तरह की सांठ-गांठ हो रही है। हालांकि यह सत्य है कि राजनीति में न तो स्थाई दोस्त होते हैं और न ही दुश्मन। खासकर अपने हितों के लिए सांसद और विधायक कितने नीचे गिर सकते हैं यह इस देश के आम लोगों ने बहुत नजदीक से देखा है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस किस स्तर तक सांठगांठ कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये वही रमन सिंह है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले जोगी सरकार के घोटाले की जुलूस निकाला था। तब रमन सिंह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के अन्याय के खिलाफ संकल्प पत्र जारी किया था। अजीत जोगी को खलनायक बताने वाले संकल्प पत्र की कितनी बातें पूरी की गई? यह सवाल अब भी लोगों की जुबान पर है। आज रमन सरकार को 6 साल से उपर हो गए है और उसने अभी तक जोगी सरकार के किसी भी घोटाले पर कार्रवाई नहीं की। क्या यह सांठ-गांठ नहीं है। सांठ-गांठ का आलम यह है कि अपनी तनख्वाह बढ़ाने यही लालू-मुलायम या वामदल एक हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति है। प्रदेश सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां घोटाले, अनियमितता की खबरें नहीं आ रही है। लेकिन क्या कभी किसी कांग्रेसी ने कार्रवाई होते तक आंदोलन किया। हालत तो इतनी खराब है कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं के खिलाफ बोलने में कांग्रेसियों के पसीने छूट जाते हैं? क्या पीडब्ल्यूडी की करतूत किसी कांग्रेसी से छिपी है। कमीशन 15 से बढक़र 20 हो गया। तबादला उद्योग चलाया गया। पर्यटन में एमजी श्रीवास्तव हो या अजय श्रीवास्तव की दादागिरी पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। उल्टे नियम विरुद्ध यहां नियमितिकरण किया जा रहा है। संविलियन किया जा रहा है। नाते-रिश्तेदारों को नौकरी दी जा रही है। लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है। शिक्षा विभाग में तो फर्नीचर घोटाला हो या विज्ञान उपकरणों की खरीदी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। विवादास्पद तवारिस, बाम्बरा जैसे लोगों के मजे है और कांग्रेसी अपने मुंह पर ताला जड़े हुए हैं।
ऐसा नहीं कि सांठ-गांठ सिर्फ बृजमोहन अग्रवाल के मामले में है। चंद्रशेखर साहू हो या राजेश मूणत। खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह के विभाग में घोटाले की फेहरिश्त है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। मुख्यमंत्री धर्म का अपमान करते हैं और कांग्रेसी यह कहकर खामोशी ओढ़ लेते हैं कि यह व्यक्तिगत है। भाजपा का कमल दीप में महंगाई डायन पर भी कांग्रेसी दो-चार घंटे चिल्लाकर चुप हो जाते हैं। सांठ-गांठ इतनी की कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के आम कार्यकर्ता हैरान है और आम लोगों का पैसा बेदर्दी से लूटा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में राजस्व की कमी नहीं है लेकिन उस स्तर पर विकास कार्य नहीं हो रहे हैं जब एक ही सडक़ साल में दो-चार बार बनानी हो तो विकास के दूसरे कार्य कैसे होंगे। लालू-मुलायम या वामदलों को कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ अब दिखाई दे रहा है। वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी में यह सांठगांठ नहीं दिखता। भ्रष्टाचारियों को बचाने में सांठगांठ नहीं दिखता और न ही अपराधियों को संरक्षण में ही सांठगांठ दिखता है।