रविवार, 10 मार्च 2019

क्या देश के प्रधानमंत्री को झूठ बोलना चाहिए?

  • क्या देश के प्रधानमंत्री को झूठ बोलना चाहिए? यह सवाल आम जनमानस में चर्चा का विषय है तो इसकी वजह प्रधानमंत्री के लगातार पकड़ाते झूठ ही है। वैसे तो झूठ बोलना पाप है यह बात बचपन में ही सिखाई जाती  है लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री की कई बातें झूठी साबित हो तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति भी जब भरोसे के लायक नहीं रह गया है तब भला आम आदमी किसकी बातों पर भरोसा करे।लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पांच साल क्या किया, जनता से किये वादों का क्या हुआ के बीच इन दिनों पूरे देश में सर्वाधिक चर्चा का विषय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का समय-समय पर झूठ बोलकर अपनी राजनीति चमकाने की शैली है। राजनीति चमकाने के इस खेल में सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या झूठ के बल पर आम जनमानस को असली मुद्दों से भटका दिया जाए और वे सिर्फ इस झूठ के सहारे सरकार चुन ले।

सवाल यह भी है कि क्या नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष पद पर बैठकर जनसभा में झूठ बोलना चाहिए? सवाल इसलिए भी उठाये जा रहे हैं कि क्या लगातार बोले जाने वाले झूठ को भूल कहा जा सकता है। और इस पर जनमानस में क्या संदेश जायेगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वाकपटुता के सभी कायल है उनके आक्रामक रवैये ने अनेक विरोधियों को धराशाही कर दिया है लेकिन इस सबके पीछे उनकी झूठ ने उनकी छवि को भी प्रभावित किया है। प्रधानमंत्री ने जनसभा में कितनी बार झूठ बोला इसका ठीक-ठाक आंकड़ा जारी करना मुश्किल हो सकता है लेकिन कहने वाले तो इसकी गिनती सौ से उपर गिन रहे है। हालांकि झूठ बोलने के मामले में हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से बहुत पीछे है क्योंकि अमेरिकी मीडिया ने राष्ट्रपति ट्रंप के द्वारा झूठ बोलने की गिनती को 6 हजार से पार कर दिया है।
प्रधानमंत्री ने कब कहां और कितनी बार झूठ बोला इसे लेकर अलग-अलग दावे है। यू-ट्यूब और फेसबुक में किये जा रहे दावों के इतर हमने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की झूठ को खोजने की कोशिश की तो प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पहली झूठ कब कहा इसकी तारीख नहीं ढूंढ पाये लेकिन यह जरुर पता चला कि उन्होंने जनसभाओं में अनेकों बार झूठ बोला है। एक बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कह दिया कि संत कबीर, गुरुनानक देव और गुरु गोरखनाथ एक साथ बैठकर चर्चा करते थे जबकि तीनों के जन्म में शतकों का अंतर रहा है।
राजनीति चमकाने उनकी झूठ को लेकर इतने वीडियो वायरल हो रहे है कि इनमें सच को आसानी से छांटा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक जनसभा में कहा कि महान क्रांतिकारी जब भगत सिंह जेल में बंद थे तब उनसे मिलने कोई कांग्रेसी नहीं गया लेकिन यह भी पूरी तरह से झूठ था क्योंकि तब जवाहरलाल नेहरु उनसे मिलने गए थे और 10 अगस्त की ट्यूबून में इस मुलाकात की पूरी रिपोर्ट छपी भी थी। इसी तरह भगत सिंह की फांसी को लेकर कहा गया कि महात्मा गांधी ने फांसी रुकवाने कोई प्रयास नहीं किया नहीं तो फांसी नहीं होती तब इसका भी खुलासा हो गया कि भगत सिंह की फांसी रुकवाने गांधी जी ने वायसराय को पत्र लिखा था।
इसी तरह एक बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार में आयोजित जनसभा में कह दिया कि सिकन्दर जब भारत पर आक्रामण किया और राज्यों को जीतते हुए बिहार आया तो यहां के लोगों ने सिकन्दर को परास्त कर दिया। इस झूठ के बाद कुछ लोगों ने इसका वीडियो वायरल कर खूब मजा भी लिया। जबकि सिकन्दर ने कभी गंगा पार ही नहीं किया। लेकिन प्रधानमंत्री का भाषण मनोरंजन के लिए नहीं होना चाहिए और न ही मजाक बनना चाहिए लेकिन जब झूठ बोला जायेगा तो लोग मजाक उड़ायेंगे।
इसी तरह नरेन्द्र मोदी ने एक बार गुजरात की सभा में श्यामाप्रसाद मुखर्जी को गुजरात का सपूत बताते हुए कह दिया कि स्वामी विवेकानंद जी से श्री मुखर्जी चर्चा करते थे और दयानंद सरस्वती से उनकी चर्चा होती थी जबकि हकीकत यह है कि श्री मुखर्जी का जन्म 1901 को हुआ और स्वामी विवेकानंद 1902 को स्वर्ग सिधार गये थे। इतना ही नहीं दयानंद सरस्वती का निधन 1883 में ही हो गया था। अब यह बातचीत और दोस्ती कैसे संभव थी।
इतना कहकर ही नरेन्द्र मोदी नहीं रुकते है वे कहते हैं कि क्रांतिकारी मदनलाल ढिगरा ने श्यामप्रसाद मुखर्जी के कहने पर कर्नल वायली को मारा था जबकि हकीकत यह है कि जब मदनलाल ढीगरा ने कर्नल वायली को मारा था तब श्यामप्रसाद मुखर्जी की उम्र महज 8 साल थी। यही नहीं श्यामप्रसाद मुखर्जी का निधन 1930 में लंदन में होना बताया जबकि श्यामा प्रसाद जी का निधन कश्मीर में हुआ था और उनका जन्म गुजरात नहीं बंगाल में हुआ था। इसी तरह एक बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कह दिया कि राहुल गांधी कहते हैं कि इस देश में 60 प्रतिशत अशिक्षित है तो आनलाईन बैकिंग की बात कैसे की जा सकती है जबकि राहुल गांधी ने यह बात कही ही नहीं थी। राहुल ने कहा था कि हिन्दुस्तान के एक प्रतिशत लोगों के पास हिन्दुस्तान का साठ प्रतिशत धन पकड़ा दिया है।
इसी तरह अमेरिका में नरेन्द्र मोदी ने कह दिया कि कोणार्क सूर्य मंदिर को दो हजार साल पुराना बताया तो वहां की मीडिया ने उनका खूब मजाक उड़ाया क्योंकि यह मंदिर सात सौ साल पुराना है। नवम्बर 2013 में एक रैली में महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनलाल करमचंद गांधी बता दिया इसे तकनीकी भूल मान भी ले तब भी स्वयं को गुजरात का बेटा कहने वाले के सामान्य ज्ञान पर सवाल तो उठेंगे ही। 
पटना के 2013 के बहुचर्चित रैली में कह दिया कि तक्षशिला बिहार की शान है जबकि तक्षशिला पाकिस्तान में हैं। इसी तरह उन्होंने जुलाई में अहमदाबाद की एक सभा कहा दिया कि आजादी के समय भारत का एक रुपया एक डालर के बराबर था कह दिया जबकि उस समय 1 रुपया एक पाउण्ड के बराबर थी। इसी तरह महाराष्ट्र में 26 मुख्यमंत्री होने की बात कही  जबकि यहां सिर्फ 17 मुख्यमंत्री हुए। इसी तरह जम्मू में मेजर सोमनाथ शर्मा को महावीर चक्र ब्रिगेडियर रजिन्दर सिंह को परमवीर चक्र मिला जबकि यह बिल्कुल उलट था।
नरेन्द्र मोदी का झूठ लगातार जारी है वे लालकिले से भी झूठ बोलने से परहेज नहीं किया। नरेन्द्र मोदी ने कह दिया कि स्वच्छता अभियान से 3 लाख बच्चों की जान बची है कह दिया जबकि आंकड़े कुछ और ही कहते है। लाल किले से ही उन्होंने कह दिया कि भारत के पासपोर्ट की बड़ी इज्जत है और वह नम्बर एक है जबकि वास्वत में इसमें जापान नम्बर एक पर है और भारत का नम्बर 65वां है। इसी तरह लाल किले में ही उन्होंने शहद के निर्यात के मामले में भी भारत का नम्बर एक बता दिया जबकि भारत इस मामले में 11वें नंबर पर है। इसी तरह मुद्रा लोन की तारीफ करते हुए कह दिया कि 13 करोड़ लोगों को बड़ा लोन दिया जबकि एक-डेढ़ प्रतिशत को ही इस तरह का लोन मिला। इसी तरह उनके चाय बेचने से लेकर डिग्री तक को लेकर सवाल कायम है। 
प्रधानमंत्री के झूठ पकड़े जाने का सवाल कितना बड़ा है और इसका चुनाव में क्या असर होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन आने वाली पीढ़ी के लिए यह शर्मसार करने वाली जरुर होगी। और यह भी संभव है कि किसी मां-बाप को झूठ बोलना पाप है समझाने के एवज में बच्चे ये न कह दे कि प्रधानमंत्री भी तो झूठ बोलते है।

राफेल की सीक्रेट फाइलें चोरी होने का अर्थ...
यह तो चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत को चरितार्थ करता है वरना राफेल घोटाले की जिन फाईलों को सरकार सीक्रेट बताती रही वह यूं इस तरह चोरी नहीं हो जाती। रक्षा मंत्रालय से फाईलों का वह भी राफेल का यूं चोरी चला जाना सरकार की नियत पर तो ऊंगली उठाता ही है। सरकार की मंशा भी स्पष्ट करने के लिए काफी है।
राफेल घोटाले के दस्तावेजों को देश हित में बताते नहीं थकने वाली सरकार इस दिशा में कितना गंभीर है कि महिने भर बाद भी न तो थाने में रिपोर्ट ही लिखी गई न ही चोर का ही पता चला। इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज का चोरी होने का खुलासा सरकार सीधे सुप्रीम कोर्ट में तब करती है जब सुप्रीम कोर्ट के तेवर तल्ख होते हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि राफेल घोटाले को घर बैठे नकारने वाले भाजपा कार्यकर्ता भी इस बारे में सोशल मीडिया में खामोश रहकर अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं। राफेल ख्ररीदी में घोटाला हुआ है या नहीं यह प्रश्न का खुलासा अब इसलिए भी जरुरी हो गया है क्योंकि इस मामले में जिस तरह से एक के बाद एक सरकार का झूठ सामने आ रहा है वह शर्मनाक है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज कराने जिस तरह से कैग की रिपोर्ट पेश करने का झूठ बोला गया और बाद में इसे टंकन त्रुटि बताया गया तभी से ही सरकार की नियत पर सवाल उठने लगा था। हालाकि सरकार की नियत पर सवाल तो उसी दिन से उठने लगा था जब डिफाल्टर हो चुकी अंबानी की नई नवेली कंपनी को पार्टनर बना दिया गया था। लेकिन प्रधानमंत्री इसे विपक्ष का झूठ बताते रहे। और अब जब रक्षा मंत्रालय जैसी जगह से सीक्रेट फाईलों का चोरी होना सरकार के कामकाज पर तो सवाल उठा ही रहे हैं नियत पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

मोदी है तो मुमकिन है का नया जुमला..

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अच्छे दिन आयेंगे के नारे के साथ सत्ता तक पहुंची मोदी सरकार ने बालाकोट एयर स्ट्राईक के बाद मोदी है तो मुमकिन है के नये नारे के सहारे 2019 में होने वाली सत्ता की लड़ाई को जीत लेना चाहती है। युद्ध उन्माद से पैदा हुए इस नये नारे की गूंज पार्टी दफ्तर से लेकर सोशल मीडिया में हथियार के रुप में इस्तेमाल किया जाने लगा है और केन्द्र सरकार के हर विभाग ने प्रधानमंत्री नरेन्द्री मोदी के फोटो के साथ नामुमकिन अब मुमकिन है का नारा भी अपने विज्ञापनों में चिपकाने लगा है।
सूचना तंत्र की घोर लापरवाही और सरकार की असफलता के बीच मोदी राज में एक के बाद एक हुए बड़े आतंकवादी हमले के पहले ही अच्छे दिन आयेंगे का नारा जब जुमला में तब्दिल होकर किसान, बेरोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा हावी होने लगा था। मोदी सरकार की हार साफ दिखलाई देने लगा था तब पुलवामा के बाद बालाकोट में हुए एयर स्ट्राईक ने एक बार फिर नरेन्द्र मोदी को संजीवनी देने की कोशिश की।
हिन्दू मुस्लिम मंदिर मस्जिद और भारत पाक का मुद्दा हमेशा से ही राजनेताओं के लिए सत्ता की सीढ़ी रहा है। ऐसे में जब-जब किसान और बेरोजगारी का मुद्दा बड़ा होने लगता है सत्ता के लिए परेशानी बढऩे लगती है और तब सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे हथियारों का इस्तेमाल होता है जिसमें उसके अपने फायदे हो।
2014 में अच्छे दिन आयेंगे के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसान और बेरोजगारी के मुद्दे थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल की नियुक्ति के अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे बड़ी चुनौती थी। आतंकवाद और भ्रष्टाचार के अलावा राम मंदिर से लेकर धारा 370 को हटाने का मामला भी मोदी सरकार के लिए चुनौती भरा था। इनमें से सरकार ने किस दिशा में बेहतर काम किया यह सरकार भी नहीं बता पायेगी। लोगों की सरकार से उम्मीद टूटने लगी और विपक्ष मुद्दों को लेकर सरकार पर तीखे हमले शुरु किये तो सरकार इससे बच निकलने का रास्ता ढूंढने लगी। उपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार से व्यापार तो प्रभावित हुआ ही लाखों नौकरी भी चली गई।
कहां तो तय था चिरागा हर शहर के लिए
आज मयस्सर नहीं एक घर के लिए

हर साल दो करोड़ बेरोजगारों को नौकरी देकर अच्छे दिन लाने का वादा था लेकिन नौकरी छिनी जाने लगी। कम होती नौकरी में युवाओं ने स्वयं को ठगा महसूस करना शुरु कर दिया और लोग कहने लगे कि इससे अच्छा तो वही दिन थे। अच्छे दिन लाने का वादा जुमला साबित हो गया। तीन बड़े राज्यों के चुनाव को सेमीफाइनल बताने के बाद भी भाजपा सत्ता से बेदखल कर दी गई। संवैधानिक संस्थाओं के औचित्य का सवाल बड़ा होने लगा और सबसे बड़ी बात तो आतंकवाद के मसले जस के तस खड़े दिखाई दिये। मोदी राज में आतंकवादियों के बड़े हमलों की वजह से सीमा और कश्मीर से आती शहीदों की लाश से लोगों का गुस्सा बढऩे लगा। सरकार के खुफिया तंत्र की असफलता ने मोदी सरकार की परीक्षा ही नहीं ली बल्कि लोगों ने फेल करना भी शुरु कर दिया।
उरी हमले के बाद किये गये सर्जिकल स्ट्राइक की चमक को भुनाने में लगी भाजपा के लिए पुलवामा की घटना सत्ता छिनते नजर आई तब एक बार फिर राष्ट्रभक्ति और देशद्रोही का प्रमाण पत्र बांटने का सिलसिला शुरु हो गया। बालाकोट में किये हवाई हमले को भुनाने युद्ध उन्माद तक ले जाया जाने लगा। इस मामले में कई टीवी चैनलों ने तो बालाकोट में तीन साढ़े तीन सौ आतंकवादियों के मारे जाने की खबर बगैर पुष्टि किये चला दी। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो हमले वाले दिन दोपहर को ही चार सौ आतंकवादियों को मारने का दावा कर दिया और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने तो ढाई सौ मार गिराने का दावा किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी हर सभा में बालाकोट की कार्रवाई का न केवल जिक्र करते रहे बल्कि घर में घुसकर मारने की घोषणा करते रहे।
युद्ध उन्माद के बीच किसान, बेरोजगार स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी बुनियादी मुद्दों से जुड़ी खबरें गायब होने लगी। हिन्दू मुस्लिम और भारत पाक के इस उन्माद में भाजपा को अपनी बात दिखलाई देने लगी और यहीं से एक नया नारा निकला मोदी है तो मुमकिन है।
लेकिन अब सवाल यह है कि क्या मोदी है तो मुमकिन है का यह नारा अच्छे दिन आयेंगे की तरह आम जनमानस के विश्वास पर खरा उतरेंगी। इस नारे की विश्वसनियता बनाये रखने क्या देश की जनता में जारी युद्ध उन्माद को चुनाव तक बनाये रखा जा सकता है और युद्ध उन्माद बना रहे इसके लिए भाजपा क्या करेगी। यह उसके लिए बड़ी चुनौती है। 
क्योंकि जब यह उन्माद उतरेगा तब फिर जो सवाल उठेंगे वह मोदी सरकार की राह में बाधा डालेंगे। नोटबंदी और जीएसटी की मार से परेशान व्यापारी, नौकरी के अभाव में बेरोजगार युवा, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य का सवाल फिर खड़ा होगा तब लोग पूछेंगे कि मोदी के रहते जब सब मुमकिन है तो अच्छे दिन क्यों नहीं आयें?

सोमवार, 4 मार्च 2019

अडानी को परसा कोल ब्लॉक देने राजस्थान का सहारा लिया मोदी सरकार ने


सत्ता बदली पर अडानी की सत्ता बरकरार
विशेष प्रतिनिधि
केन्द्र में बैठी नरेन्द्र मोदी   सरकार पर अडानी प्रेम का जो आरोप लगता है वह कितना सही है यह जानने के लिए सरगुजा के परसा कोल ब्लॉक के आंबटन प्रक्रिया को जानना समझना होगा। परसा कोल ब्लॉक आबंटित करने जिस तरह से राजस्थान बिजली बोर्ड को माध्यम बनाया गया उससे यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर अपने निजी हित के लिए जल जंगल जमीन की बर्बादी कब तक की जाती रहेगी।
छत्तीसगढ़ में जल जंगल जमीन का मसला नया नहीं है। विकास के नाम पर संसाधनों की लूट और बरबादी का आलम यह है कि अपने ही जमीन से बेदखल होते आदिवासियों की पीड़ा कौन सुने? पिछले 15 सालों में जनसुनवाई की आड़ में सरकारी गुण्डागर्दी चरम पर रही और औद्योगिक आतंकवाद ने सवाल उठाने वालों की गर्दन दबोचने की कोशिश की। अडानी प्रेम ने तो परसा कोल ब्लॉक में आदिवासियों की ही नहीं जल जंगल जमीन पर्यावरण सब की बरबादी का नया इतिहास लिख दिया।
केन्द्र में बैठी नरेन्द्र मोदी के कार्पोरेट प्रेम को लेकर विरोधियों ने जो सवाल खड़ा किये है उसका प्रमाण परसा कोल ब्लॉक सबके सामने है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर भूपेश बघेल के द्वारा अडानी पर सीधे हमला किया जाता है तो इसकी वजह परसा कोल ब्लॉक के आबंटन की प्रक्रिया और इससे बरबाद होता पूरा क्षेत्र है।
सवाल तो यह भी उठ रहा है कि अब जब सत्ता बदल गई है तब भी अडानी की सत्ता बरकरार क्यों है? हालांकि केन्द्र की नीति के चलते छत्तीसगढ़ सरकार के पास परसा कोल ब्लॉक के आबंटन को रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन वह आदिवासियों के साथ खड़ी होकर जल जंगल जमीन की बरबादी को रोकने कड़ा कदम उठा सकती है।
हमने इसी जगह पर पहले ही परसा कोल ब्लाक के आबंटन के तरीके को लेकर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार के अधिकारों के हनन का सवाल उठाया है।
दरअसल मोदी सरकार ने जिस तरह से कोल ब्लॉक के आबंटन के नियमों में बदलाव किया है उसके बाद राज्य के लिए ज्यादा कुछ करने को नहीं रह गया है। नये नियम के चलते ही छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग की आपत्ति के बाद भी अडानी को कोल ब्लॉक दे दिया गया। हालांकि तब राज्य में भाजपा की रमन सरकार थी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मंशा के विपरित जब किसी भाजपा नेता में जाने का साहस नहीं रह गया हो तब राज्य की हित ही बेमानी हो जाती है।
सूत्रों की माने तो अडानी को परसा कोल ब्लॉक आबंटित करने जिस तरह से खेल खेला गया वह सत्ता और कार्पोरेट जगत के सांठगांठ का अनूठा उदाहरण है। केन्द्र पहले नीति बनाती  है कि कोल ब्लॉक के आबंटन में राज्य की राय कोई मायने नहीं रखेगा और सीधे आरोप से बचने के लिए नियम में यह भी जोड़ दिया जाता है कि कार्पोरेट घराने को कोल ब्लाक पाने का अधिकार तभी होगा जब वह किसी सरकारी या सार्वजनिक कंपनी से भागीदारी करनी होगी।
सूत्रों का कहना है कि अडानी को परसा कोल ब्लाक इसी नये नियम के तहत दिये गये और इसके लिए भाजपा शासित दो राज्यों को चुना गया। इस खेल के तहत सबसे पहले अडानी की कंपनी ने राजस्थान बिजली बोर्ड से समझौता करती है समझौते के तहत राजस्थान बिजली बोर्ड 76 फीसदी शेयर अडानी को देने राजी हो जाता है और सिर्फ 24 फीसदी में राजस्थान बिजली बोर्ड तैयार हो जाती है तो इसकी वजह राजस्थान में बैठी भाजपा सरकार को माना जाता है। 
सूत्रों की माने तो मोदी सरकार ने अडानी के लिए राजस्थान की वसुधरा रकार पर दबाव भी बनाया था और जैसे ही राजस्थान बिजली बोर्ड से अडानी की कंपनी का समझौता होता है। परसा कोल ब्लॉक को तमाम आपत्तियों और परिस्थितियों को नजर अंदाज कर अडानी की कंपनी को आबंटित कर दिया जाता है।
सूत्रों की माने तो इस आबंटन के बाद रमन सरकार पर अडानी को सहयोग करने का दबाव भी डाला गया। यही वजह है कि 21 सौ हेक्टेयर में परसा कोल ब्लाक के अंतर्गत आने वाले करीब दर्जनभर गांव के आदिवासियों की जमीन फर्जी जनसुनवाई और झूठे वादों के आधार पर कंपनी के पास चली जाती है। बताया जाता है कि जनसुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ताओं को शांति भंग करने के आरोप में हिरासत में ले लिया जाता है तो जमीन नहीं देने पर अड़े आदिवासियों को भय दिखाया गया।
सूत्रों की माने तो कोल ब्लाक आबंटन से पहले यह क्षेत्र हाथी कारीडोर के लिए सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था, यही नहीं महत्वपूर्ण वन क्षेत्र के अलावा जीव जन्तुओं के लिए भी यह क्षेत्र सुरक्षित रहा है लेकिन खनन के लिए रोज होने वाले धमाकों ने इस क्षेत्र की सुख शांति छीन ली है और अब देखना है कि जब दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार सत्ता में है तब राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का रुख क्या होता है।

रविवार, 3 मार्च 2019

अमेरिका, चीन का फिर सरपंच बनने की कोशिश


विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले और भारत की बालाकोटा में एयर स्ट्राईक के बाद दोनों देशों के बीच जिस तरह से युद्ध के हालात बने थे वह पायलट अभिनंदन की वापसी के बाद सुधरे हैं लेकिन आतंकवाद बीमारी समाप्त हो गये हैं यह सोचना ही गलत होगा। दोनों देश में युद्ध न हो इसकी कोशिश में दोनों ही देश के लोग लगे है लेकिन दोनों देशों के तनाव का फायदा उठाकर अमेरिका-चीन सहित कई देश सरपंच बनने की कोशिश में लगा है। भारत ने रणनीतिक जीत हासिल कर ली है लेकिन आतंकवाद पर जीत दर्ज करना बाकी है।
पुलवामा में आतंकवादी कार्रवाई में जिस तरह से हमारे चालीस जवान और अफसर शहीद हुए थे उसके बाद देश में आतंकवादियों के खिलाफ आक्रोश के स्वर फुटने लगे थे। सरकार के खिलाफ ही नहीं पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा फुटने लगा था। मोदी सरकार पर बदला लेने का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। फिर सेना ने पाकिस्तान के बालाकोट में जिस तरह की कार्रवाई की उसके बाद दोनों देशों के बीच युद्ध का माहौल बनने लगा था। हालांकि बालाकोट की घटना के कुछ ही घंटों बाद पाकिस्तान ने भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश की लेकिन हमारी सेना ने इसे नाकामयाब कर दिया। इस आपाधापी में हमारा एक पायलट पाकिस्तान के कब्जे में चला गया और फिर तनाव और बढ़ गया।
भारत और पाक के बीच युद्ध के हालात बनने लगे थे और भारत हर हाल में पाक के खिलाफ पूरे विश्व को एक करने की कोशिश को सफल बनाता जा रहा था। पायलट अभिनंदन की वापसी की घोषणा पाकिस्तान को करनी पड़ी।
दोनों देशों के बीच इस हालात का फायदा उठाकर अमेरिका-चीन सऊदी अरब सहित कई देश सरपंची हासिल करने में लग गये जबकि भारत का स्पष्ट मत है कि दोनों देश की लड़ाई में किसी की भी मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जायेगी।
पाकिस्तान के द्वारा पायलट अभिनंदन की वापसी की घोषणा को भारत की रणनीतिक जीत के रुप में देखा जाना चाहिए लेकिन इस जीत की खुशी में हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि इससे आतंकवाद की बीमारी खत्म नहीं हुई है और जब तक पाकिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं करती तब तक पाकिस्तान पर पूरी तरह विश्वास कर लेना हमारी भूल होगी।
अंधी राष्ट्रीयता न कहे क्योंकि राष्ट्रीयता हमेशा अंधी होती है। भले ही रुस के इतिहासकार ने यह बात किसी और संदर्भ में कही हो लेकिन यह भारत-पाक के बीच तनाव के समय साफ तौर पर देखी जा सकती है। तनाव के इस माहौल में जिस तरह से कुछ दक्षिणपंथी और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने विषवमन किया उससे आम लोगों के लिए खतरनाक माना जाना चाहिए। जिस तरह से न्यूज चैनलों ने मार डालो, काट डालो की भाषा का इस्तेमाल किया वह हैरान करने वाला ही नहीं शर्मनाक भी रहा। ये इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे जिसे आतंक की भाषा कहना गलत नहीं होगा।
इस मामले में राजनीति साधने की कोशिश हुई। यहां तक की राममंदिर तक के मुद्दे गौण हो गये, राफेल, बेरोजगार, किसानों के मुद्दे की बात तो छोडिय़े, संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा वाले मुद्दे पर भी कोई बोलने को तैयार नहीं था। यह सही है कि 1971 के बाद पाकिस्तान के खिलाफ हुई इस सबसे बड़ी कार्रवाई ने भारतीय जनता पार्टी के लिए संजीवनी का काम किया है और अब तक सत्ता जाने का डर लिये बैठी भाजपा को अब सत्ता में वापसी का भरोसा मिला  है लेकिन अभी चुनाव में समय है देखना है कि भाजपा को इसका कितना फायदा मिलता है।
कर्नाटक भाजपा के नेता यदिरप्पा ने जिस तरह से एयर स्ट्राईक के बाद कर्नाटक में 28 सीटों में से 22 सीट जीतने का दावा किया है। उसके बाद राहत इंदौरी का यह शेर पुन: याद आता है कि 
सरहदों पर बहुत तनाव है क्या
पता तो करो कहीं चुनाव है क्या

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

नजर...


लोकसभा के चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। भाजपा कांग्रेस सहित सभी राजनैतिक दलों की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जा टिकी है। जनता का समर्थन हासिल करने सभी पार्टियां अपने अपने ढंग से लुभाने की कोशिश में लगी है। इसके साथ ही एक दूसरे के पापों को गिनने का खेल भी शुरु हो गया है और इस खेल में भाषा की सारी मर्यादाएं लांघी जा रही है। बड़़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों की भाषा मोहल्लों के गुण्डों बदमाशों की भाषा से भी बदतर हो चली है।
2014 में कांग्रेस के खिलाफ जिस तरह से देशव्यापी माहौल अन्ना और रामदेव बाबा ने बनाया था उसका फायदा भाजपा को मिला था लेकिन जिस लोकपाल आंदोलन के चलते भाजपा को सत्ता मिली थी सरकार बनते ही वह भी भूल गई। लोकपाल नहीं बना क्योंकि कोई भी नेता नहीं चाहता कि लोकपाल बने। यही हाल अयोध्या में राम मंदिर, कश्मीर में धारा &70 और देश में एक समान कानून का है। नरेन्द्र मोदी की सरकार की ऐसी कोई उलब्धि नहीं है जिसकी वजह से इस सरकार की पीठ थपथपाई जाये। मोदी सरकार ने उन्हें मुद्दों को हवा दी जिसका राजनैतिक फायदा मिले। गाय, तीन तलाक और आर्थिक आरक्षण को लेकर बखेड़ा खड़ा किया गया लेकिन गंगा की सफाई को लेकर कोई खास काम नहीं हुआ। गंगा की चिंता करने वाले बाबा ्अग्रवाल जी को तो अपनी जान तक गंवानी पड़ी।
मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल में बेरोजगारी और किसान के मुद्दे को हाशिये पर डाला गया तो नोटबंदी और जीएसटी की मार को लोग अब तक नहीं भूले हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि मोदी सरकार पुन: सत्ता में आने के लिए क्या करेंगी।
बेरोजगारों और किसानों के घोर निराशावादी के इस दौर में सरकार को वेलफेयर का काम भी बोझ लगने लगा है। हालांकि किसानी इस चुनाव का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है लेकिन क्या मुद्दा चुनाव तक रहेगा? और यदि चुनाव तक यह मुद्दा रहा तो क्या भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को बना रहने देगी?
दरअसल भाजपा भले ही राजनीति सुचिता की दुहाई देते हुए विकास की बात करती है लेकिन हकीकत तो यही है कि वह इसके सहारे सत्ता को कायम नहीं रख पायेगी इसलिए ुउसकी कोशिश होगी कि अयोध्या, हिन्दू मुस्लिम ही मुद्दा बने ताकि हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा मिल सके।
ऐसे में बरेली के उभरते हुए युवा कवि मध्यम सक्सेना की यह पंक्ति याद आती है-
नजर वालों की कहां रब पे नजर है साहेब
मगर जो रब है उसकी सबपे नजर है साहेब
जिस सियासत का खुद का ईमान ही नहीं उसकी
आपके और मेरे मजहब पे नजर है साहेब।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

अडानी का विकास सरगुजा का विनाश


0 परसा कोल ब्लॉक के नाम पर जंगल व आदिवासियों की बर्बादी
0
सामाजिक कार्यकर्ता प्रताडि़त कई आदिवासी जेल में 
0 नदी प्रदूषित, अवैध रुप से जंगल काटे जा रहे हैं
0 जमीन ले ली न नौकरी दी न मुआवजा
0 मोदी के कार्पोरेट प्रेम का नजारा
0 बरबाद होते जल जंगल जमीन पर खामोशी
0 वन्य जीवों के लिए मुसीबत
0 सरकार बदली पर अडानी की सत्ता बरकरार
0 टीएस बाबा भी निशाने पर, उनका विस क्षेत्र 
0 दस गांव के लोग आंदोलित

छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके में मोदी सरकार ने जिस तरह से अपने कार्पोरेट प्रेम का उदाहरण देते हुए तमाम आपत्ति के बावजूद अडानी ग्रुप को परसा कोल ब्लॉक में खनन का ठेका दे दिया उससे पूरा इलाका बरबाद होने लगा है वन्य प्राणियों के लिए तो यह क्षेत्र मुसिबत तो बना ही है आदिवासियों के सामने उजड़ जाने का संकट खड़ा हो गया है। बरबाद होते जल जंगल जमीन के लिए नियमों की ही नहीं संविधान के मूल भावना का भी उल्लघन किया जा रहा है। एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित कई नेता सीधे अडानी पर हमला कर रहे हैं तो दूसरी तरफ अडानी के उत्याचार का विरोध करने वालों को पिट कर जेल में ठूंसा जा रहा है। नदी प्रदूषित होने लगा है। अवैध रुप से जंगल काटे जा रहे हैं, जमीन ले ली लेकिन नौकरी नहीं दी और टीएस बाबा का प्रेम के चलते इस अत्याचार के खिलाफ दस गांव के आदिवासियों में आंदोलन की तपीश साफ महसूस की जा सकती है। (एक रिपोर्ट)
सरगुजा के उदयपुर का यह इलाका इन दिनों कोल ब्लॉक के धमाके से थर्राता हुआ साफ संकेत दे रहा है कि राज्य में सत्ता तो बदली लेकिन अडानी की सत्ता अब भी बरकरार है। परसा कोल ब्लॉक के नाम पर जिस तरह से जंगल व आदिवासियों को बरबाद किया जा रहा है उसका कोई विरोध भी नहीं कर सकता क्योंकि विरोध करने वालों को न केवल मारा पिटा जाता है बल्कि जेल में बंद करवा दिया जाता है। पूरे इलाके में भय का वातावरण है और पहले ही विकास से वंचित आदिवासी समाज अपने घर से बेदखल होने को मजबूर है।
दरअसल यह दर्दनाक कहानी मोदी सरकार के उस नीति से शुरु होती है जिसके तहत बगैर राज्य की मर्जी के केन्द्र सरकार किसी को भी कोयला ब्लाक का आबंटन कर सकती है और इसके लिए मोदी सरकार ने तत्कालीन भाजपा शासित राज्य राजस्थान को माध्यम बनाया। राजस्थान बिजली निगम को केवल 24 फीसदी का भागीदार बनाकर अडानी को सरगुजा में परसा कोल ब्लाक आबंटन कर जल जंगल जमीन आदिवासियों और वन्य जीवों को बरबाद करने की जो छूट दी गई वह सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। तब राज्य में रमन सिंह की सरकार थी और रमन राज के शह में अडानी ने जल जंगल जमीन को बरबाद करने का ऐसा कुचक्र किया जिसमें आदिवासी भी बरबाद होने लगे। कुचक्र कर आदिवासियों की जमीने छीनी जाने लगी। उन्हें भरपूर मुआवजा और परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी देने के नाम पर ठगा गया। पक्का मकान का लालच दिया गया और जमीन लेने फर्जी तरीके से जन सुनवाई की गई। अडानी के इस अत्याचार का जब सामाजिक कार्यकर्ताओं और आदिवासियों ने विरोध किया तो उन्हें रमन सरकार के इशारे पर पुलिस ने शांति भंग करने का आरोप लगाकर पिटने लगी और जेल में ठूंसने लगी।
बरबाद होते जल जंगल जमीन और आदिवासी प्रताडऩा को लेकर तब कांग्रेस ने सीधे मोदी और अडानी पर हमले किये यहां तक कि राहुल गांधी और भूपेश बघेल ने अपने हर भाषण में अडानी और मोदी के गठजोड़ की सीधे हमले किये और यह हमला अब भी जारी है। हालांकि अडानी के मामले में उस क्षेत्र के विधायक टीएस सिंहदेव का रुख नमर रहा लेकिन अपना सब कुछ बरबाद होते देख रहे आदिवासियों को भूपेश बघेल से उम्मीद है।
सूत्रों की माने तो इस क्षेत्र को पहले राज्य सरकार हाथी अभ्यारण प्रोजेक्ट के लिए सुरक्षित रखा था और तत्कालीन वन सचिव ने यहां कोल ब्लॉक के लिए आबंटित करने की मंशा पर आपत्ति भी की थी लेकिन कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब अडानी को यह क्षेत्र कोल ब्लॉक के लिए देने की घोषणा की तो रमन सरकार खामोश रह गई।
दूसरी तरफ राहुल गांधी आदिवासियों और किसानों के हित में बात करते रहे और इस भरोसे का नतीजा है कि भाजपा को छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में हार का मुंह देखना पड़ा। भाजपा की सत्ता जाते ही अडानी को गरियाने वाले भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बन गये अब देखना है कि वे इस मामले को किस तरह से निपटते है जबकि मोदी सरकार परसा कोल ब्लॉक के बाजू की जमीन भी अडानी को देने की तैयारी कर रही है।
कौशल तिवारी

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

झूमा-झटकी

बदलापुर...
कहते हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुंदक पाल कर चलने वाले नेता हैं और वे उन लोगों को कभी नहीं छोड़ते जो उनसे टेढ़ापन दिखाने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि डॉ. रमन सिंह इन दिनों परेशान है। दरअसल नरेन्द्र मोदी ने बहुत पहले ही डॉ. रमन सिंह को राÓय की राजनीति छोड़ केन्द्र में आने का न्यौता दिया था लेकिन मुख्यमंत्री के रुतबे की वजह से उन्होंने तब मोदी जी को न कर दिया था और फिर छत्तीसगढ़ में पराजय के बाद जब डॉक्टर साहब ने राÓय की ही राजनीति करने की घोषणा की तो मोदी जी को यह नागवार गुजरा और उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर दिल्ली बुलवा लिया। हार के सदमें से अभी वे उबर ही नहीं पाये थे कि इस नये उलटफेर ने उन्हें सकते में ला दिया और वे चुपचाप स्वीकार कर दिल्ली अधिवेशन में शामिल हो गए।
गुरता का हिसाब चुकता
कभी अजीत जोगी के शासन काल में ताकतवर पुलिस अफसर रहे मुकेश गुप्ता ने जब रायपुर एसएसपी रहते हुए भाजपाईयों के हाथ पैर तुड़वाये तब सत्ता बदलते ही उनके लूपलाईन में जाने का कयास लगाया जा रहा था लेकिन भाजपा सरकार में भी मुकेश गुप्ता ताकतवर बने रहे। हालांकि मार खाये भाजपाईयों की चाहत रही थी कि गुप्ता जी के खिलाफ कार्रवाई हो लेकिन रमन राज में जब अफसरशाही हावी हो तो गुप्ताजी जैसे अफसरों का कोई कैसे कुछ बिगाड़ सकता था लेकिन 15 साल का राज समाप्त हुआ तो पहली गाज मुकेश गुप्ता पर ही गिरी। इस कार्रवाई से जहां कांग्रेसी खुश है वहीं भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी जश्न मना रहा है।

अमितेष का दर्द...
कभी प्रदेश और देश की राजनीति के प्रभावशील माने जाने वाले शुक्ल परिवार के इकलौते राजनीतिक वारिस अमितेष शुक्ल को इन दिनों अपने अस्तित्व के संकट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है तो इसकी वजह वे स्वयं है। पिछला चुनाव हार जाने के बाद तो जैसे सब कुछ समाप्त माना जा रहा था लेकिन कांग्रेस ने राजनैतिक विरासत के नाम पर टिकिट दी और कांग्रेस की लहर के चलते वे जीत भी गए। लेकिन मंत्री  बनने की ई'छा पूरी नहीं हो सकी।
अमितेष के साथ ऐसा अविभाजित मध्यप्रदेश के समय भी हो चुका है जब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने चाचा-पापा का खेल अमितेष के साथ खूब खेला था लेकिन इस बार तो सब कुछ विपरीत ही दिखाई दे रहा है और यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में अमितेष की राजनीति को भी ग्रहण लगना तय है।
पैसे का प्रभाव
कोरबा से विधायक चुनकर आने वाले जयसिंह अग्रवाल का मंत्री बन जाना सबके लिए आश्चर्य का विषय था लेकिन जो लोग बिलासपुर की राजनीति को नजदीक से देख रहे थे उनके लिए यह हैरानी से Óयादा महंत की ताकत का आकलन का मौका था। दरअसल सोशल मीडिया के जमाने में कुछ भी चीज छुपाना आसान नहीं रह गया है फिर प्रदेश की राजनीति में कौन किसके साथ और किस दम पर है यह बात तो और भी आसानी से जाना जा सकता है। छत्तीसगढ़ी अभियान में जयसिंह के मंत्री बनने को लेकर तो सवाल किये जाते ही रहे, मंत्री बनने की वजह को लेकर भी दिलचस्प कारण गिनाये गये। जयसिंह के लिए दिक्कत यह है कि वे अपने पैसे के प्रभाव को नकार भी नहीं सकते।
प्रमोद का पीड़ा...
यह तो खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा दो रुपये का वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना लोकसभा चुनाव लडऩे को इ'छुक प्रमोद दुबे को लेकर इन दिनों इस तरह की चर्चा नहीं होती।
अपनी वाक पटुता और न काहू से दोस्ती न काहू से बैर की तर्ज पर छात्र राजनीति से राजधानी के महापौर पद तक पहुंचने वाले प्रमोद दुबे के सामने लोकसभा की टिकिट को लेकर जिस तरह की चर्चा है वह प्रमोद दुबे के लिए भी चिंता का सबब बनता जा रहा है।
दरअसल कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ चुनाव लडऩे से मना करने की वजह से इस चर्चा को बल मिल रहा है कि उनकी टिकिट की राह में सेटिंग कहीं रोढ़ा न बन जाए। अब प्रमोद दुबे सफाई देने मजबूर है फिर चर्चा यह भी है कि एक बार मना करने वाले की मुसिबत कभी कम नहीं हुई है और राजनीति के जानकार सोमनाथ साहू का उदाहरण रखने से भी गुरेज नहीं करते।

न राम मिली न माया
क्षे
त्रीय पार्टी बनाकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में किंग मेकर बनने की चाह रखने वाले अजीत प्रमोद जोगी की स्थिति इन दिनों न राम मिली न माया की तरह हो गई है। जकांछ सुप्रीमों को यह भरोसा था कि कांग्रेस और भाजपा को किसी भी हाल में बहुमत नहीं मिलेगी और वे 5-7 जीतकर किंग मेकर की भूमिका में होंगे लेकिन कांग्रेस की लहर ने उनका सारा गणित बिगाड़ दिया यहां तक कि उनकी बहु ऋचा जोगी भी चुनाव हार गई। ऐसे में भले ही वे राष्ट्रीय पार्टी बनाकर खुश हो रहे हो लेकिन पार्टी के भीतर जिस तरह से बवाल मचा है और पार्टी से जुड़े लोग कांग्रेस का दामन थाम रहे है वह उनके लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है। हालत यह है कि उनके साथ जुड़े पूर्व विधायक ही नहीं कुछ वर्तमान विधायक भी पार्टी दफ्तर जाना छोड़ दिये हैं।


दामाद बाबू दुलरु
इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजनीति में दामाद बाबू फिर से विवाद में आ गये हैं। इस बार विवाद की वजह अंतागढ़ टेप कांड है और इस टेप कांड के मुताबिक कांग्रेस प्रत्याशी से लेन देन का मामला है।
ऐसा नहीं है कि दामाद बाबू पहली बार विवाद में आये हैंं। इनका विवादों से पुराना नाता है यही वजह है कि शहर के प्रसिद्ध डाक्टर जेबी गुप्ता के इस पुत्र का मेडिकल की पढ़ाई के दौरान के कारनामें चर्चा में रहे और उनका पहला विवाह भी चर्चा और विवादों से बच नहीं पाया। इसके बाद उनका तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह का दामाद बनना भी विवाद में रहा और कहा जाता है कि इस दामाद के लिए बमुश्किल से डॉक्टर साहब बड़ी मुश्किल से राजी हुए थे।
इसके बाद उन्हें जब डीकेएस का प्रभार सौंप कर लंबा-चौड़ा बजट बनाया गया तब डीकेएस में भर्ती और खर्च का भी विवाद होता रहा और फिर मामला अंतागढ़ टेपकांड का आया। लेकिन दामाद बाबू तो दामाद बाबू है और इसके लिए डाक्टर साहब क्या कुछ करेंगे यह भी चर्चा में है।
मनोज की उम्मीद...
छत्तीसगढ़ की राजनीति में कभी अजीत जोगी के नाक की बाल माने जाने वाले मनोज मंडावी को अब भी भरोसा है कि जोगी खेमा छोडऩे का फायदा उन्हें मिलेगा और मंत्रिमंडल में जो एक जगह बची है उस पर उसके नाम की मुहर लगेगी।
अजीत जोगी के लिए सीट छोडऩे की घोषणा करने की वजह से कभी मंत्री रहे मनोज मंडावी के बारे में कहा जाता था कि वे जोगी के ईशारे पर ही बागी होकर चुनाव लड़े थे। ऐसे में उनका जोगी खेमा छोडऩा अ'छे-अ'छे राजनैतिक विश्लेषकों को चौका देने वाला था। जोगी बनाम भूपेश की लड़ाई में भूपेश का साथ देने के कारण उन्हें टिकिट भी मिली और वे जीत भी गए लेकिन मंत्री नहीं बनाये गए तो इसके कई कारण गिनाये जा रहे हैं। अपने क्षेत्र में दबंग माने जाने वाले मनोज को लगता है कि देर-सबेर उन्हें मंत्री बनाया ही जायेगा।
शिकार करने को आये...
ये तो फिल्मी गाना शिकार करने को आये शिकार हो गये की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना पूर्व मंत्री विधान मिश्रा की यह हालत नहीं होती। कभी विद्याचरण शुक्ल के खास माने जाने वाले विधान मिश्रा को जब टिकिट नहीं मिली तो वे अजीत जोगी को गरियाते घुमते थे लेकिन जब जोगी ने पार्टी बनाई तो वे उनके साथ शामिल हो गए और भूपेश बघेल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कहा जाता है कि विधान मिश्रा के कंधे पर बंदूक रखने का काम भाजपा के एक दिग्गज नेता भी कर रहे थे और कांग्रेस की सत्ता कभी नहीं आयेगी यह सोचकर भूपेश बघेल के खिलाफ विधान ने जमकर विषवमन किया और अब जब कांग्रेस की सत्ता आ गई तो वे कांग्रेस में शामिल होने छटपटा रहे है।