- दीवाली पर जहर परोस रही हैं बड़ी कंपनियां! खुली पोल, सरकार की मिलीभगत?
- सावधान! नकली खोवा-घी का खेल और सरकार की चुप्पी, किसकी शह पर बिक रहा जहर?
, जरा आंखें खोलिए! त्योहारों का सीजन आते ही हमारे घरों में खुशियों की मिठाइयां आनी शुरू हो जाती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आप अपने परिवार को जो खोवा, पनीर और घी खिला रहे हैं, वह किसी मिठाई की दुकान से नहीं, बल्कि सीधे मौत के कारखानों से आ रहा है?
और इस बार का खेल उससे भी बड़ा है! मिलावट का यह काला कारोबार सिर्फ किसी नुक्कड़ के हलवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इस खेल में बाजार की बड़ी-बड़ी नामी गिरामी कंपनियां भी शामिल हो चुकी हैं। जी हाँ, वही ब्रांड जिन पर आप आंख बंद करके भरोसा करते हैं।
जांच रिपोर्टें इस बात की गवाह हैं कि इनके कई बड़े बैचेस फेल हो चुके हैं। और सबसे डरावनी बात क्या है? इन मिलावटी सामानों में सिर्फ घटिया सामग्री नहीं, बल्कि शीशा (Lead) और ऐसे खतरनाक केमिकल्स मिल रहे हैं जो धीरे-धीरे आपके गुर्दे और लीवर को गला रहे हैं।
बड़ी कंपनियों के खेल और खतरनाक केमिकल्स की पोल
जरा सोचिए, जब देश के बड़े ब्रांड्स के पैकेटबंद घी और पनीर की जांच होती है, तो उसमें खतरनाक स्तर पर सिंथेटिक फैट, डिटर्जेंट और यूरिया के साथ-साथ सेहत के लिए जानलेवा मेटल्स और केमिकल्स पाए जाते हैं।
- खोवे का सच: त्योहारों पर मांग इतनी बढ़ जाती है कि फैक्ट्रियों में सिंथेटिक खोवा धड़ल्ले से बनता है। इसमें यूरिया, रिफाइंड ऑयल, और स्टार्च के साथ-साथ ऐसे केमिकल्स होते हैं जो आपकी आंतों को जला कर रख देते हैं।
- घी और पनीर का जहर: जो पैकेटबंद घी और पनीर आप मलाईदार समझकर खरीदते हैं, लैब टेस्ट में उसके कई सैंपल पूरी तरह फेल हो चुके हैं। कई मामलों में इनमें भारी धातुओं (Heavy Metals) और शीशे की मिलावट की पुष्टि हुई है, जो सीधे तौर पर कैंसर जैसी बीमारियों को न्योता दे रही है।
लेकिन सवाल यह है कि ये कंपनियां इतनी बेखौफ क्यों हैं? इन्हें किसका संरक्षण मिला हुआ है?
खाद्य विभाग की नाकामी और सरकार की मिलीभगत
यहाँ आकर शासन-प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग (Food Safety Department) की भूमिका पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा होता है!
हर साल त्योहारी सीजन से पहले बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। विभाग के अधिकारी एसी कमरों से बाहर निकलकर दो-चार दुकानों पर औचक निरीक्षण का नाटक करते हैं। मीडिया के सामने सैंपलिंग की फोटो खिंचवाई जाती है। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू होता है!
- सैंपलिंग का ढकोसला: जब रिपोर्ट आती है, तो क्या कार्रवाई होती है? कागजों में जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। क्या किसी बड़े ब्रांड का लाइसेंस रद्द हुआ? क्या किसी बड़े चेहरे पर आपराधिक मुकदमा चला?
- लापरवाही या मिलीभगत? जब बाजार में खुलेआम जहर बिक रहा है और बड़ी कंपनियों के गोदामों तक विभाग की पहुंच होने के बावजूद मिलावट रुक नहीं रही है, तो इसे महज़ लापरवाही नहीं कहा जा सकता। यह सीधी-सीधी मिलीभगत है! जनता की सेहत दांव पर लगी है, और जिम्मेदार आंखें मूंदकर बैठे हैं।
जब तक प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक संरक्षण के तार इन मिलावटखोरों से जुड़े रहेंगे, तब तक आम जनता के स्वास्थ्य के साथ यूं ही खिलवाड़ होता रहेगा। खाद्य विभाग के अधिकारी सिर्फ त्योहारों पर खानापूर्ति के लिए औपचारिकता निभाते हैं, ताकि जनता को यह लगे कि सरकार काम कर रही है। असलियत यह है कि जनता की जान भगवान भरोसे छोड़ दी गई है।

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