- छत्तीसगढ़ बीजेपी में बड़ा भूचाल!
- संगठन में सब कुछ ठीक नहीं? छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में सुलग रही है बगावत की आग!
छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों कुछ बहुत बड़ा पक रहा है! एक तरफ सरकार अपनी योजनाओं और दावों की पीठ थपथपा रही है, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल यानी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अंदर से ही बगावत के सुर अब दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलेआम सड़कों और सोशल मीडिया पर सुनाई देने लगे हैं।
साथियों, सवाल ये उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है? क्या जिन कार्यकर्ताओं ने खून-पसीना बहाकर सरकार बनाई थी, आज वही खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या रवि भगत जैसे युवा और फायरब्रांड नेता का पार्टी से किनारा कर लेना किसी बड़े भूचाल की आहट है?
आज के इस रिपोर्ट में हम चीर-फाड़ करेंगे छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों की जमीनी हकीकत की—चाहे बात डोंगरगढ़ की हो, मोहला-मानपुर की हो, सारंगढ़ की हो या फिर लैलूंगा से लेकर रायपुर तक सुलग रही असंतोष की आग की। वीडियो बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण होने वाला है, अंत तक बने रहिएगा।"
रवि भगत का इस्तीफा और संगठन की कार्यशैली पर सवाल
"शुरुआत करते हैं छत्तीसगढ़ बीजेपी के उस झटके से, जिसने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। हम बात कर रहे हैं भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कद्दावर नेता रवि भगत की।
रवि भगत ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना इस्तीफा मंडल अध्यक्ष को भेजा, जो अब सोशल मीडिया पर आग की तरह वायरल हुआ है। हालांकि इस्तीफे में उन्होंने 'निजी कारणों' का हवाला दिया है, लेकिन राजनीतिक पंडित अच्छी तरह समझते हैं कि इसके पीछे की असल कहानी क्या है।
याद कीजिए, पिछले साल जुलाई 2025 में पार्टी संगठन ने रवि भगत को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। उनकी गलती क्या थी? उनकी गलती ये थी कि उन्होंने अपनी ही सरकार के सामने जनता और गांवों के विकास के लिए 'DMF फंड' (जिला खनिज न्यास) के इस्तेमाल को लेकर खुलकर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि गांवों की सड़क और पानी जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए इस फंड का सही जगह इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन जनहित की बात उठाने पर एक तेज-तर्रार युवा नेता को अनुशासन का पाठ पढ़ा दिया गया, नोटिस थमा दिया गया।
और नतीजा क्या निकला? आखिरकार एक जमीनी नेता को घुटन महसूस हुई और उसने पार्टी से नाता तोड़ लिया। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि रवि भगत का जाना सिर्फ एक बानगी है, आने वाले दिनों में कई और बड़े और नाराज नेता भी इस फेहरिस्त में शामिल हो सकते हैं।"
सारंगढ़ से लेकर डोंगरगढ़ और मोहला-मानपुर तक सुलगता असंतोष
, मामला सिर्फ रवि भगत तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी हैं।
अभी हाल ही में सारंगढ़ जिला भाजपा की बैठक का एक वाकया देखिए। बैठक में कार्यकर्ताओं का गुस्सा इस कदर फूटा कि जिला अध्यक्ष ज्योति पटेल और जिला प्रभारी शंकरलाल अग्रवाल की कार्यशैली पर खुलेआम सवाल खड़े किए गए। हालात तब और बिगड़ गए जब सारंगढ़ नगर मंडल अध्यक्ष जयप्रकाश बानी को पद से हटा दिया गया। इसके बाद कार्यकर्ताओं का सब्र टूट गया, बैठक के बाद जमकर नारेबाजी हुई और मांग उठी कि प्रभारी मंत्री और संगठन के प्रभारियों को तुरंत बदला जाए! सोचिए, एक पार्टी बैठक जहां रणनीति बननी चाहिए थी, वहां विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी हो रही है।
यही हाल डोंगरगढ़ क्षेत्र और मोहला-मानपुर क्षेत्र का भी है। इन इलाकों से लगातार खबरें आ रही हैं कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच एक भारी दूरी बनती जा रही है। कार्यकर्ताओं का दर्द यह है कि सरकार बनने के बाद उनकी पूछपरख बंद हो गई है। जिन लोगों ने विपक्ष में रहकर लाठियां खाईं, संघर्ष किया, आज सत्ता आने के बाद वे खुद को हाशिए पर पा रहे हैं। संगठन के बड़े फैसले ऊपर से थोपे जा रहे हैं, और जमीनी कार्यकर्ताओं की राय को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।"
छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियां और नौकरशाही का दखल
"आखिर इस बगावत की जड़ में क्या है? क्यों छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में पार्टी के भीतर ही घमासान मचा हुआ है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसके पीछे सरकार की कार्यशैली और नौकरशाही (ब्यूरोक्रैसी) का बढ़ता दखल है। कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि सरकार चलाने वाले नेता अब आम जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से कटते जा रहे हैं। फाइलें अफसरों के दफ्तरों में घूमती हैं, और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों या पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं होती।
जब रवि भगत जैसे नेता ने डीएमएफ (DMF) फंड जैसे मुद्दों पर जनता की आवाज उठाई, तो उन्हें दबाने की कोशिश की गई। यह संदेश कार्यकर्ताओं में बहुत गलत गया। कार्यकर्ताओं के मन में यह सवाल उठ रहा है कि अगर पार्टी के भीतर ही सच बोलने पर पाबंदी लग जाएगी, जनता की बुनियादी बात रखने पर नोटिस थमा दिए जाएंगे, तो फिर आम आदमी की सुनवाई कहां होगी?"
लब्बोलुआब यह है कि छत्तीसगढ़ बीजेपी के अंदर सब कुछ अंदरखाने खौल रहा है। सारंगढ़ की खींचतान, डोंगरगढ़ और मोहला-मानपुर का असंतोष, और रवि भगत का पार्टी छोड़ना—ये महज छिटपुट घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरी नाराजगी का संकेत हैं। यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने इस आंतरिक असंतोष को नहीं संभाला, कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं दिया और तानाशाही रवैये को खत्म नहीं किया, तो आने वाले समय में यह चिंगारी बड़ा रूप ले सकती है। चर्चा यह भी है कि कई अन्य असंतुष्ट नेता भी सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल आपसे है—आपको क्या लगता है? क्या छत्तीसगढ़ में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की यह नाराज़गी आने वाले दिनों में पार्टी के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है? क्या रवि भगत के बाद कुछ और बड़े चेहरे भी पार्टी छोड़ सकते हैं?
नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताइएगा।

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