भ्रष्टाचारियों को बचाने का अजब खेल
आज बात सिर्फ एक सरकारी खरीदी की नहीं है... आज बात है कि कैसे आम जनता के टैक्स के पैसों पर डाका डाला जाता है और जब मामला सामने आता है, तो छोटे कर्मचारियों को आगे करके बड़े-बड़े मंत्री और सचिव स्तर के लोग पर्दे के पीछे छिप जाते हैं!
रायपुर के आदिम जाति विकास विभाग से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर आपका खून खौल उठेगा। पूरे 1.92 करोड़ रुपये की रोटी मेकर खरीदी! जी हां, सही सुना आपने—रोटी बनाने वाली मशीनों की खरीदी में करोड़ों का घोल! लेकिन सबसे बड़ा तमाशा यह नहीं है कि घोटाला हुआ... तमाशा यह है कि जब मामला खुला, तो सरकार ने क्या किया? सिर्फ एक इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) रोक कर मामला रफा-दफा करने की कोशिश की!
"आइए पहले मामले को समझते हैं। रायपुर में आदिम जाति विकास विभाग ने 1.92 करोड़ रुपये की रोटी मेकर मशीनें खरीदीं। नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। शिकायतकर्ताओं ने जब आवाज उठाई कि घोर अनियमितता हुई है, तब जांच का नाटक शुरू हुआ।
लेकिन देखिए 'सरकारी सजा' का तमाशा! 20 अप्रैल 2026 को लोक सेवा आयोग (PSC) ने असंचयी प्रभाव (non-cumulative) से सिर्फ एक वेतन वृद्धि (increment) रोकने पर सहमति दी!
आप समझ रहे हैं इसका मतलब? इसका मतलब यह है कि सजा सिर्फ नाम-मात्र की है! आगे चल कर सैलरी फिर से नॉर्मल हो जाएगी! 1.92 करोड़ रुपये के घोटाले-आरोप के बदले सिर्फ एक इंक्रीमेंट का कटना? क्या यह सजा है या खानापूर्ति?"
अब आते हैं सबसे बड़े झोल पर! शिकायतों में तत्कालीन सहायक आयुक्त तारकेश्वर देवांगन और विजय कंवर की भूमिका पर सवाल उठे। लेकिन तारकेश्वर देवांगन जी जुलाई 2026 में रिटायर हो गए!
अरे भाई, रिटायरमेंट से ठीक पहले ऐसी मेहरबानी क्यों? शिकायतकर्ताओं ने साफ सवाल उठाया है कि क्या विभागीय कार्रवाई को जानबूझकर इतना हल्का रखा गया ताकि रिटायरमेंट के बाद मामला अपने आप ठंडा पड़ जाए?
आपने उन्हें आसानी से रिटायर होने दिया, उनके बकाया पैसों का भुगतान भी कर दिया! अगर सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है, तो उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या आम जनता के टैक्स का पैसा ऐसे ही बांटा जाएगा?"
"अब आते हैं सबसे कड़वे और सीधे सवाल पर! शिकायतों और जांच में सिर्फ दो-तीन अफसर के नाम आगे करके मामले को दबा दिया गया। लेकिन असली सवाल यह है:
- फाइल किसने तैयार की?
- खरीदी को अप्रूवल (मंजूरी) किस स्तर पर मिली?
- पेमेंट किसने पास करवाया?
- नियमों को दरकिनार करने में और कौन-कौन से बड़े अधिकारी शामिल थे?
क्या आपको लगता है कि 1.92 करोड़ का मामला सिर्फ एक सहायक आयुक्त के लेवल पर निपट गया होगा? बिल्कुल नहीं! बात तो यह उठ रही है कि इस पूरे खेल में सचिव स्तर तक पैसा पहुंचने की बातें सामने आ रही हैं! मंत्री तक पर लेन-देन के गंभीर आरोप लग रहे हैं!
जब इतनी बड़ी रकम का लेन-देन होता है, तो कट हर लेवल पर बंटता है! लेकिन जब जांच की बात आती है, तो सिर्फ छोटे अफसर पर एक वेतन वृद्धि रोक कर बाकी पूरे सिस्टम को बचाने की कोशिश की जाती है!"
"सरकार को जवाब देना होगा! अगर यह सिर्फ दो लोगों का मामला था, तो बकाया भुगतान क्यों हुआ? और अगर इसमें बड़े-बड़े सचिव और मंत्री शामिल हैं, तो उन पर एफआईआर और सीबीआई/एसीबी जांच क्यों नहीं?
केवल एक इंक्रीमेंट रोक कर आप 1.92 करोड़ के नुकसान का हिसाब नहीं छिपा सकते। आम जनता की गाढ़ी कमाई की लूट पर यह खानापूर्ति अब नहीं चलेगी!
आप लोग इस विषय पर क्या सोचते हैं? क्या रिटायरमेंट के बाद अफसर को ऐसी मेहरबानी मिलनी चाहिए? क्या मंत्री और सचिव स्तर पर इसकी जांच नहीं होनी चाहिए? मुझे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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