गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

साड़ी घोटाले के आरोपियों को कौन बचा रहा

 साड़ी घोटाले के आरोपियों को कौन बचा रहा 



क्या इस देश में कानून सिर्फ आम जनता के लिए है? अगर कोई छोटा-मोटा व्यापारी या आम आदमी एक पैसे की भी गड़बड़ी कर दे, तो पुलिस और प्रशासन उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है। लेकिन जब मामला करोड़ों के घोटाले का हो, सीनियर IAS अफसरों और मंत्रियों के करीबियों का हो, तो फाइलें दबा दी जाती हैं!

छत्तीसगढ़ में बीते साल हुआ 'साड़ी घोटाला' याद है आपको? लगभग 9.70 लाख साड़ियों की खरीदी में जो बड़ा झोल हुआ था, उस पर अब एक साल बाद ऐसा पर्दा डाला जा रहा है जिसे देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे। जांच खत्म, मामला ठंडे बस्ते में, और किसी एक भी व्यक्ति पर कोई कार्रवाई नहीं!

घोटाले की पूरी कहानी 

बात शुरू होती है छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग और खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड से। राज्य की गरीब महिलाओं और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए साड़ियों की खरीदी का आदेश जारी हुआ। 9 लाख 70 हजार साड़ियों का बड़ा ऑर्डर दिया गया।

लेकिन जब साड़ियां पहुंचीं, तो पता चला कि खरीदी में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। साड़ियों की क्वालिटी से लेकर रेट्स तक में जमकर बंदरबांट की गई। जब मामला मीडिया में उछला, तो आनन-फानन में जांच के आदेश दिए गए। जनता को लगा कि इस बार तो भ्रष्टाचारियों को सजा मिलेगी, लेकिन जो सच सामने आया, वो प्रशासनिक लीपापोती का सबसे बड़ा उदाहरण है।"

कौन है ज़िम्मेदार?

"अब सबसे बड़ा सवाल: इस घोटाले की ज़िम्मेदारी किसकी थी? अगर आप अखबार की कटिंग्स और रिपोर्ट्स देखें, तो आरोप सीधे-सीधे मंत्री बंगले के पदस्थ अधिकारियों और सीनियर आईएएस अफसर पी.एल. एल्मा (P.L. Elma) पर उठे।

अब इसमें सबसे मजेदार और हास्यास्पद बात क्या है पता है? जिस वक्त यह खरीदी हुई, उस वक्त पी.एल. एल्मा साहब 'महिला एवं बाल विकास विभाग' के डायरेक्टर भी थे और 'खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड' के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) भी!

यानि ध्यान से समझिए:

  1. साड़ी का सप्लाई ऑर्डर देने वाले कौन? - पी.एल. एल्मा!
  2. साड़ी की खरीदी करने और ऑर्डर रिसीव करने वाले कौन? - पी.एल. एल्मा!

एक ही अधिकारी ऑर्डर दे रहा है, वही अधिकारी खरीद रहा है, और जब घोटाला सामने आता है, तो साहब कहते हैं—'सप्लाई करने वालों को तो मैंने ही नोटिस दिया था, पेमेंट रोक दिया था, और अब तो मैं उस विभाग में हूं ही नहीं!' क्या बात है! खुद ही खरीदार, खुद ही सप्लायर के निरीक्षक, और जब जांच की बारी आई तो हाथ खड़े कर दिए!"

लीपापोती और सिस्टम का बचाव 

एक साल बीत गया है दोस्तों, पूरा एक साल! न तो किसी बड़े अफसर को आरोपी बनाया गया, न ही किसी मंत्री के बंगले में बैठे साहबों पर कोई आंच आई। नए आदेश जारी करके जांच को ऐसे समाप्त किया जा रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।

  • मंत्री जी के करीबियों को बचा लिया गया।
  • कटघरे में खड़े अफसरों को सुरक्षित निकाल लिया गया।
  • और पूरे 9.70 लाख साड़ियों के इस खेल को कागजों में समेट दिया गया।

क्या जांच का मतलब सिर्फ इतना होता है कि मामला जब तक गर्म है, तब तक कमेटी-कमेटी खेलो, और जैसे ही जनता भूल जाए, मामले को रफा-दफा कर दो? जनता के टैक्स के पैसों का ऐसा मजाक कब तक चलेगा?"

"यह सिर्फ एक साड़ी घोटाले की बात नहीं है। यह उस ढर्रे की बात है जहां बड़े-बड़े अधिकारी और रसूखदार घोटालों पर कुंडली मारकर बैठ जाते हैं और कार्रवाई के नाम पर शून्य सन्नाटा छा जाता है।

  • अगर आईएएस अफसर और मंत्री बंगले के अधिकारी निर्दोष थे, तो जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
  • अगर घोटाला हुआ था, तो 9.70 लाख साड़ियों के नुकसान की भरपाई किससे की जाएगी?
  • क्या किसी एक भी व्यक्ति पर कार्रवाई न होना यह साबित नहीं करता कि पूरे सिस्टम ने मिलकर अपनों को बचाया है?"

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि प्रशासनिक जांच सिर्फ एक छलावा बनकर रह गई है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।

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