शनिवार, 7 नवंबर 2026

लालफीताशाही और घूसखोरी का नंगा सच

 लालफीताशाही और घूसखोरी का नंगा सच: एसीबी के आंकड़े खोल रहे हैं सिस्टम की पोल, आखिर कब तक बचेगा भ्रष्टाचारियों का यह गिरोह?


जरा सोचिए... आप अपनी ही जमीन का नामांतरण कराने के लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर काटते हैं, अपने ही हक के भुगतान के लिए फाइलें दबाई जाती हैं, और हर टेबल पर बैठे बाबू से लेकर साहब तक की आँखों में लालच का पर्दा पड़ा होता है। छत्तीसगढ़ के सरकारी दफ्तरों का यह कोई नया सच नहीं है, लेकिन इस सच के पीछे जो आंकड़े हैं, वे आपके पैरों तले जमीन खिसका देने के लिए काफी हैं।

आज हम बात करेंगे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के उन काले चिट्ठों की, जो यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जनता की गाढ़ी कमाई को लूटने वाले बेखौफ हैं। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है— क्या सरकार का इकबाल सिर्फ फाइलों तक सिमट कर रह गया है? क्या वजह है कि घूसखोर पकड़े तो जाते हैं, लेकिन फिर वही कागजी पेचीदगियों और अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) के नाम पर फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं? आइए, एक-एक आंकड़े का कच्चा चिट्ठा खोलते हैं।

लूट की पूरी दास्तान 

जरा इन आंकड़ों पर गौर फरमाइश कीजिए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021 से लेकर 28 मई 2026 तक यानी इन चंद सालों के भीतर, छत्तीसगढ़ में रिश्वतखोरी के कुल 154 मामलों में तगड़ी ट्रैप कार्रवाई (Trap Action) की गई।

सुनने में यह आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे का दर्द देखिए। इन 154 मामलों में कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि 193 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत लेते हुए सीधे रंगे हाथों दबोचे गए! और भ्रष्टाचार का कुल खेल कितने का था? इन छापों के दौरान कुल 51 लाख 67 हजार 540 रुपये की अवैध रिश्वत की राशि बरामद की गई।

यानी सरकार के नुमाइंदे जनता का खून चूसने में एक सेकंड की भी देर नहीं लगाते। जरा साल-दर-साल के इन आंकड़ों की चाल देखिए, जो सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार के बढ़ते ग्राफ की गवाही दे रहे हैं:

  • वर्ष 2021: रिश्वतखोरी के 13 मामले दर्ज हुए, जिसमें 14 लोकसेवक पकड़े गए।
  • वर्ष 2022: फिर वही 13 मामले सामने आए और 18 अधिकारी-कर्मचारी शिकंजे में आए।
  • वर्ष 2023: चमत्कार देखिए! इस साल दर्ज ट्रैप प्रकरणों की संख्या सीधे शून्य हो गई। एक भी लोकसेवक नहीं पकड़ा गया। क्या इस साल भ्रष्टाचार अचानक गायब हो गया था या फिर एसीबी की आँखें बंद कर दी गई थीं? यह बहुत बड़ा सवाल है।
  • वर्ष 2024: इसके बाद अचानक ग्राफ उछलता है और 44 मामले दर्ज होते हैं, जिसमें 57 अधिकारी-कर्मचारी धरे जाते हैं।
  • वर्ष 2025: यह साल तो मानो भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ देता है! इस साल सबसे ज्यादा 60 मामलों में ट्रैप लगाया गयाऔर रिकॉर्ड 71 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी रंगे हाथों पकड़े गए।
  • वर्ष 2026 (28 मई तक): और इस साल के शुरुआती महीनों में ही यानी 28 मई तक 24 ट्रैप प्रकरण दर्ज हो चुके हैं, जिसमें 33 लोकसेवक पकड़े जा चुके हैं।

मतलब साफ है, साल दर साल घूसखोरी का ग्राफ ऊपर चढ़ता जा रहा है, लेकिन सिस्टम की सुई वहीं की वहीं अटकी हुई है।

कौन से विभाग सबसे आगे? — जनता की लूट के अड्डे 

 अब सवाल यह उठता है कि जनता को सबसे ज्यादा किस विभाग में लूटा जा रहा है? क्या स्वास्थ्य या शिक्षा महकमा सुधरा है? बिल्कुल नहीं! आइए विभागवार सूची देखते हैं:

  1. राजस्व विभाग (Revenue Department): इस सूची में नंबर वन पर है राजस्व विभाग। जमीन की खरीद-बिक्री, नामांतरण, सीमांकन और सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि राजस्व रिकॉर्ड में सुधार कराने के नाम पर भी जमकर रिश्वतखोरी चल रही है। आम आदमी अपनी ही जमीन के कागजात के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।
  2. स्कूल शिक्षा विभाग (School Education Department): जी हाँ, नौनिहालों का भविष्य गढ़ने वाला शिक्षा विभाग इस सूची में दूसरे स्थान पर है। यहाँ 20 मामलों में 25 अधिकारी और कर्मचारी घूस लेते पकड़े गए। शिक्षा के मंदिरों में भी भ्रष्टाचार का दीमक लग चुका है।
  3. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग: यहाँ 14 मामले दर्ज हुए और 15 कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में आए। गांवों के विकास के लिए आने वाला पैसा किसकी जेब में जा रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है।
  4. गृह (पुलिस) विभाग: कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जिनकी है, उसी पुलिस विभाग में रिश्वतखोरी के 10 मामले सामने आए और 13 अधिकारी-कर्मचारी पकड़े गए।
  5. न्याय प्रशासन एवं विधिक सेवा विभाग: यहाँ तक कि न्याय दिलाने वाले महकमे में भी 7 मामले दर्ज हुए और 10 लोकसेवकों को पकड़ा गया।

अनुमति के नाम पर फाइलें दबाने का खेल 

, असली खेल तो अब शुरू होता है। एसीबी ने ट्रैप कर लिया, घूसखोरों को रंगे हाथ पकड़ भी लिया, पैसे भी बरामद हो गए... तो फिर क्या हुआ? क्या उन भ्रष्ट अधिकारियों को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया?

यहीं से शुरू होती है सरकार और तंत्र की असली चालबाजी!

न्यायालय में चालान पेश करने और भ्रष्ट अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए शासन स्तर से अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) की जरूरत होती है। और यहीं पर आकर सरकार का सारा एंटी-करप्शन का ढोल, खोखला साबित हो जाता है। महीनों, बल्कि सालों तक सक्षम प्राधिकारी और सरकार के नुमाइंदे इन फाइलों को फाइलों के नीचे दबाकर बैठ जाते हैं।

अरे हुक्मरानों, जनता पूछ रही है कि आखिर इन भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने के लिए फाइलें क्यों रोकी जाती हैं? क्यों महीनों और सालों तक अभियोजन की अनुमति नहीं दी जाती? क्या सरकार के आशीर्वाद के बिना यह सब संभव है? जब आप ट्रैप के आंकड़े बड़े गर्व से जारी करते हैं, तो फिर उन मामलों को अंजाम तक पहुँचाने में आपकी यह ढीली-ढाली कार्यप्रणाली क्यों सामने आती है?

अदालतों में फाइलें इसलिए लटक जाती हैं क्योंकि सरकार समय पर अनुमति नहीं देती। पुराना रिकॉर्ड उठा कर देख लीजिए, कई मामलों में तो घूसखोर बाबू रिटायर भी हो जाते हैं, मलाई भी काट लेते हैं, और सरकार की मेहरबानी से अदालती प्रक्रिया फाइलों में ही दम तोड़ देती है। यह ढीला-ढाला रवैया नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों को परोक्ष रूप से दिया जा रहा संरक्षण है!

छत्तीसगढ़ की जनता अब सब देख रही है। एक तरफ गरीब आदमी चपरासी से लेकर बाबू के सामने हाथ जोड़ने को मजबूर है, और दूसरी तरफ एसीबी के जाल में फंसने के बाद भी ये रसूखदार अधिकारी राजनीतिक संरक्षण के सहारे बेखौफ घूम रहे हैं।

यह वक्त सिर्फ आंकड़े गिनाने का नहीं, बल्कि सरकार को कटघरे में खड़ा करने का है। यदि सच में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति है, तो हर एक ट्रैप केस में तुरंत अभियोजन की अनुमति दी जाए और दोषियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए सजा दिलाई जाए।

अगर सरकार ने अपना यह ढीला-ढाला रवैया नहीं बदला, तो जनता का गुस्सा इन फाइलों से बाहर आकर सड़कों पर दिखेगा।

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