छत्तीसगढ़ में पेड़ों पर कुल्हाड़ी और सियासत! माना-तूता के जंगल बचाने के लिए आदिवासियों-ग्रामीणों का अनोखा विरोध, सरकार से तीखे सवाल!
आज हम बात करने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ की उस धरती की, जिसे कभी हरे-भरे जंगलों और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता था। लेकिन आज उसी छत्तीसगढ़ में विकास के नाम पर विनाश का खेल खुलेआम खेला जा रहा है।
सवाल ये है कि क्या 'विकास' का मतलब सिर्फ पेड़ों को काटना और कंपनियों को फायदा पहुँचाना रह गया है? नवा रायपुर के माना-तूता क्षेत्र में प्रस्तावित 'चित्तोत्पल फिल्म सिटी' के नाम पर लगभग 1100 हरे-भरे पेड़ों को काटने का प्रस्ताव है! जरा सोचिए, 1100 पेड़! क्या छत्तीसगढ़ सरकार के पास इस फिल्म सिटी को बनाने के लिए कोई बंजर ज़मीन नहीं थी? क्या सिर्फ इसलिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है ताकि कागजी विकास के आंकड़े चमकाए जा सकें? आज इसी पर होगी तीखी चर्चा,
पूरा मामला क्या है? माना-तूता का सच
"आइए पहले आपको पूरा मामला समझाते हैं कि आखिर चल क्या रहा है।
- रायपुर के पास नवा रायपुर के माना-तूता क्षेत्र में प्रस्तावित फिल्म सिटी के लिए करीब 1100 पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने की तैयारी कर ली गई है।
- जब 27 अक्टूबर को प्रशासन की कटाई वाली मशीनें यानी जेसीबी और कटर लेकर गाड़ियां मौके पर पहुँचीं, तो स्थानीय ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी चुपचाप बैठने वालों में से नहीं थे।
- उन्होंने पेड़ों से लिपटकर चिपको आंदोलन की तर्ज पर विरोध जताना शुरू कर दिया!
- हद तो तब हो गई जब अपनी ज़मीन और अपने जंगलों को बचाने की गुहार लगा रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में से 10 ग्रामीणों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया! हालांकि, भारी विरोध के बाद उन्हें करीब एक घंटे बाद छोड़ दिया गया।
अब सरकार और पर्यटन विभाग का तर्क सुनिए। पर्यटन विभाग का दावा है कि 'अरे, चिंता मत कीजिए, हम इसके बदले 11 हजार नए पौधे लगा देंगे!' अरे भाई, वाह! क्या तर्क है? एक तरफ आप सालों पुराने, फल-फूल रहे, पर्यावरण को आक्सीजन देने वाले 1100 पेड़ काट रहे हैं, और दूसरी तरफ कागजों पर 11 हजार पौधे लगाने का झुनझुना थमा रहे हैं। क्या एक नया पौधा तुरंत जाकर उन 1100 पेड़ों की जगह ले लेगा? क्या उसकी छांव और पर्यावरण संतुलन की भरपाई तुरंत हो जाएगी? ये जनता को बेवकूफ बनाने के अलावा और कुछ नहीं है।"
विरोध का नया और अनोखा तरीका: पेड़ों पर देवी-देवता और छत्तीसगढ़ महतारी
"लेकिन तारीफ करनी होगी हमारे गांवों के लोगों की, आदिवासियों और पर्यावरण प्रेमियों की! जब प्रशासन और पुलिस अपनी ताकत दिखाने पर उतर आए, तो गांव वालों ने विरोध का एक ऐसा नायाब और धार्मिक-सांस्कृतिक तरीका निकाला कि सरकार और प्रशासन के भी होश उड़ गए।
ग्रामीणों ने पेड़ों को बचाने के लिए उन पर देवी-देवताओं की तस्वीरें और हमारी अपनी 'छत्तीसगढ़ महतारी' की तस्वीरें लगा दी हैं! सोचिए, जब कोई बुलडोजर या कटर किसी ऐसे पेड़ के पास जाएगा जिस पर छत्तीसगढ़ महतारी या देवी-देवताओं की तस्वीर टंगी हो, तो कोई कैसे उन पर वार करेगा? यह सिर्फ पेड़ों को बचाने की लड़ाई नहीं है, यह छत्तीसगढ़ की संस्कृति, आस्था और जल-जंगल-जमीन को बचाने की आखिरी जंग बन चुकी है।
ग्रामीण और स्थानीय समितियां साफ कह रही हैं कि भाई, फिल्म सिटी बनानी है तो बनाओ, हमें एेतराज नहीं है, लेकिन इसके लिए दूसरी बंजर या खाली जगह का चयन करो, इन हरे-भरे जंगलों को क्यों उजाड़ रहे हो? लेकिन बहरी हो चुकी व्यवस्था को शायद ये चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं।"
सरकार और कंपनियों की मिलीभगत
"अब वक्त आ गया है सरकार से सीधे और तीखे सवाल पूछने का। मैं पूछता हूं छत्तीसगढ़ के हुक्मरानों से:
- पहला सवाल: क्या छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ उद्योगपतियों और कंपनियों को यहां के संसाधन और जंगल सौंपने के लिए रह गई है? जब भी कोई बड़ा प्रोजेक्ट आता है, तो सबसे पहले जंगलों और आदिवासियों की ज़मीन को ही क्यों निशाना बनाया जाता है?
- दूसरा सवाल: क्या नवा रायपुर विकास प्राधिकरण या पर्यटन विभाग के पास फिल्म सिटी के लिए कोई अन्य वैकल्पिक ज़मीन उपलब्ध नहीं थी? ज़िद क्यों है कि माना-तूता के जंगल को ही काटना है? कहीं इसके पीछे कोई और बड़ा कमर्शियल खेल तो नहीं है?
- तीसरा सवाल: पेड़ों से लिपटकर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे ग्रामीणों को पुलिस द्वारा हिरासत में लेना क्या तानाशाही नहीं है? क्या अपनी ज़मीन और पर्यावरण बचाने वाले अब इस राज्य में अपराधी माने जाएंगे?
- चौथा सवाल: वो 11 हजार नए पौधे लगाने का दावा कागजों पर कब तक दौड़ता रहेगा? जो पेड़ आज खड़े हैं, जो पर्यावरण को शुद्ध कर रहे हैं, उन्हें काटकर आप कौन सा इको-फ्रेंडली विकास मॉडल पेश करना चाहते हैं?
इन सवालों के जवाब सरकार को जनता को देने होंगे। सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देने से या कागजी दावे कर देने से पर्यावरण का नुकसान पूरा नहीं हो जाता।"
, मामला सिर्फ 1100 पेड़ों का नहीं है। मामला इस बात का है कि कल को आपके शहर, आपके गांव के जंगलों पर भी इसी तरह बुलدोज़र चल सकता है। अगर आज हमने माना-तूता के इन ग्रामीणों का साथ नहीं दिया, तो कल पर्यावरण और हमारी संस्कृति का और भी बड़ा सौदा हो जाएगा।
ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का यह संघर्ष हम सबका संघर्ष है। पेड़ों पर देवी-देवताओं और छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर लगाकर उन्होंने बता दिया है कि वे अपनी आस्था और पर्यावरण के साथ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे।
आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या सरकार को फिल्म सिटी की जगह बदलनी चाहिए? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिए,
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