छत्तीसगढ़ी का अपमान और हाईकोर्ट का चाबुक! कब तक सहेगा छत्तीसगढ़िया?
महतारी का अपमान और न्याय की लड़ाई: छत्तीसगढ़ के वजूद का सवाल!
आज फिर एक बार उन लोगों के कोलाहल को देखकर, छत्तीसगढ़िया समाज की दुर्दशा को देखकर, कसम से कलेजा थर-थर कांप उठता है और भीतर से एक उबाल उठ खड़ा होता है।
जिस माटी में हमने जन्म लिया, जिस छत्तीसगढ़ी बोली में हमने अपनी पहली लोरी सुनी, जिस महतारी के आंचल में हमने खेलना-खाना सीखा... आज उसी महतारी का अपमान, उसी छत्तीसगढ़ी भाषा की उपेक्षा और उसी छत्तीसगढ़िया समाज के हकों पर लगातार डाका डाला जा रहा है।
लेकिन आज बात सिर्फ दुख की नहीं है, आज बात न्याय की है, उम्मीद की है—जिसका एक मजबूत प्रमाण हाल ही में माननीय हाईकोर्ट के आदेश के रूप में हमारे सामने आया है।
छत्तीसगढ़ी भाषा की उपेक्षा - अपनों के बीच परायापन
सवाल यह उठता है कि जिस छत्तीसगढ़ी भाषा में ढाई-तीन करोड़ लोगों की सांसें बसती हैं, उसे आज कुछ तथाकथित 'सभ्य' लोग हीन भावना से क्यों देखते हैं?
जब कोई छत्तीसगढ़ी में बात करता है, तो उसे गंववार समझ लिया जाता है। दफ्तरों में, स्कूलों में, और बड़े-बड़े तड़क-भड़क वाले मंचों पर छत्तीसगढ़ी बोलने वालों को ऐसे देखा जाता है मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।
अरे, क्या छत्तीसगढ़ी बोलने वाले इंसान नहीं हैं? क्या उनकी मातृभाषा का कोई मोल नहीं है?
आज विडंबना यह है कि हमारे अपने ही घर में, हमारी अपनी माटी में, हमारी भाषा को दोयम दर्जे का बना कर रख दिया गया है। छत्तीसगढ़ के बड़े-बड़े मंचों पर अंग्रेजी और हिंदी की धूम है, पर जिस भाषा से इस माटी की सोंधी खुशबू आती है, उसे बिसारते जा रहे हैं। इसे उपेक्षा नहीं तो और क्या कहेंगे?"
छत्तीसगढ़ महतारी का अपमान
इससे भी ज्यादा पीड़ादायक बात यह है— छत्तीसगढ़ महतारी का अपमान!
जिस महतारी के नाम पर हमने छत्तीसगढ़ के गठन के सपने देखे थे, आज उसकी प्रतिष्ठा और उसकी अस्मिता के साथ सरेआम खिलवाड़ हो रहा है।
कभी राजनीतिक मंचों पर छत्तीसगढ़िया संस्कृति की खिल्ली उड़ाई जाती है, तो कभी बाहर से आकर लोग हमारी संस्कृति को नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास करते हैं।
सोचिए ज़रा! जो माटी अपना अन्न-जल देकर हमारा पेट भरती है, जो छत्तीसगढ़ महतारी अपने आंचल में हम सबको सहेज कर रखती है, उसका अपमान क्यों?
आखिर क्यों छत्तीसगढ़िया समाज को हर जगह अपने हक और सम्मान के लिए हाथ जोड़ने पड़ते हैं? क्या इस माटी में जन्म लेना कोई गुनाह है?
नहीं साथियों, यह अपमान सिर्फ छत्तीसगढ़ महतारी का नहीं है, यह हमारे उन पूर्वजों के बलिदान का अपमान है, जिन्होंने लाठी-गोलियां खाकर इस छत्तीसगढ़ का निर्माण किया था।"
छत्तीसगढ़ियों के साथ अन्याय - रोजगार से लेकर हक तक
"और अब बात करते हैं सबसे बड़े नासूर की— छत्तीसगढ़िया समाज के साथ हो रहा अन्याय!
चाहे रोजगार की बात हो, चाहे माटी के संसाधनों की, चाहे उद्योग-धंधों में स्थानीय लोगों के हक की बात हो—हर जगह छत्तीसगढ़िया जनता के साथ ठगी हो रही है।
बाहर से आकर लोग हमारी नौकरियां खा रहे हैं, हमारी माटी के खनिजों को लूट रहे हैं, और हमारे युवा रोजगार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
जब हम अपना हक मांगते हैं, तो हमारी आवाज को दबा दिया जाता है। हमारे सीधे-स्वभाव और भोलेपन को बाहरी लोगों ने हमारी कमजोरी समझ लिया है।
पर वे भूल गए हैं कि छत्तीसगढ़िया जब तक शांत रहता है, तब तक शांत रहता है... लेकिन जब उसके सब्र का बांध टूटता है, तो बड़े-बड़े अहंकार के किले ढह जाते हैं!"
हाईकोर्ट का आदेश
अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, सूरज की एक किरण उसे चीरकर बाहर आती ही है।
और वही सूरज की किरण न्याय की एक बहुत बड़ी उम्मीद बनकर आई है— माननीय हाईकोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश!
न्यायपालिका ने यह साबित कर दिया है कि कानून की नजर में हर कोई बराबर है और गलत करने वालों को उनकी सजा मिलकर ही रहेगी। हाईकोर्ट का यह आदेश छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और यहां के नागरिकों के अधिकारों के पक्ष में एक मजबूत ढाल बनकर उभरा है।
यह आदेश इस बात की गवाही देता है कि अन्याय का अंधेरा चाहे कितना भी लंबा हो, जीत आखिरकार सत्य और न्याय की ही होती है।
अब हम सभी छत्तीसगढ़िया बंधुओं की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। हमारा समय आ गया है कि हम अपनी भाषा 'छत्तीसगढ़ी' को गर्व के साथ बोलें, अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाएं, और छत्तीसगढ़ महतारी के सिर को कभी झुकने न दें।
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