एमओयू का खेल या सियासत का मेल? — छत्तीसगढ़ में विकास के दावों की सच्चाई
"जब भी देश में कोई नई सरकार बनती है, तो सबसे बड़ा शिगूफा किस चीज का छोड़ा जाता है? विकास का, बड़े-बड़े निवेश का, और विदेशी दौरों का!
नेताजी सूट-बूट पहनकर विदेशों में जाते हैं, कैमरा चमकता है, बड़े-बड़े उद्योगपतियों के साथ हाथ मिलाते हुए तस्वीरें छपती हैं, और फिर हवा में तैरते हुए करोड़ों-अरबों के 'एमओयू' (MoU) के आंकड़े देश के सामने परोस दिए जाते हैं।
लेकिन, जरा रुकिए! क्या आपने कभी सोचा है कि इन एमओयू और विदेशी दौरों का ज़मीनी सच क्या होता है? क्या कागजों पर साइन होने वाले ये हसीन वादे जमीन पर उतरते हैं, या फिर यह सिर्फ जनता की आँखों में धूल झोंकने का एक राजनीतिक खेल है?
आज हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ की—जहाँ खनिज संपदा कूट-कूट कर भरी है, लेकिन जहाँ की सियासत इन दिनों सिर्फ 'एमओयू-एमओयू' के खेल पर टिकी हुई है। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार के विदेशी दौरों, राज्यों के चक्करों और उन बड़े-बड़े निवेश दावों की आज हम ऐसी परतें उधेड़ेंगे, जो शायद मुख्यधारा की मीडिया में आपको देखने को न मिलें।
'एमओयू-एमओयू' का यह पुराना खेल क्या है?
"सबसे पहले यह समझते हैं कि यह 'एमओयू' यानी Memorandum of Understanding का खेल काम कैसे करता है।
पार्टी कोई भी हो, सरकार चाहे किसी की भी आए—पार्टियां बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह खेल कभी नहीं बदलता। पिछले कुछ दशकों में छत्तीसगढ़ में या देश के दूसरे राज्यों में जितने भी एमओयू साइन हुए हैं, अगर उन सबके कागजों को सच मान लिया जाए, तो अब तक आधा देश सिंगापुर और सिलिकॉन वैली बन जाना चाहिए था।
मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और बड़े-बड़े निगम अध्यक्ष तक सरकारी खर्च पर चार्टर्ड प्लेन या बिजनेस क्लास में बैठकर विदेशों के दौरे करते हैं। सिंगापुर, दुबई, अमेरिका और देश के बड़े महानगरों में इन्वेस्टर समिट के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं।
वहाँ जाकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं कि- 'फलाने देश से इतने हजार करोड़ का निवेश आ रहा है, लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा!'
लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब ये नेता वापस अपने राज्य लौटते हैं। जनता ताली बजाती है, मीडिया हेडलाइन छापता है, और कुछ महीनों बाद वो फाइलें सरकारी दफ्तरों की किसी धूल भरी अलमारी में हमेशा के लिए दफन हो जाती हैं। सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसों पर होने वाले इन दौरों का हिसाब कौन देगा?"
छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार और विदेशी-देशीय दौरे
"अब बात करते हैं मौजूदा छत्तीसगढ़ की—जहाँ विष्णुदेव साय के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही है।
हाल ही के दिनों में मुख्यमंत्री और उनका पूरा अमला विदेशी दौरों पर निकला। सिंगापुर जैसे देशों की यात्राएं हुईं, वहाँ इंटरनेशनल मंचों पर छत्तीसगढ़ में निवेश के बड़े-बड़े सपने दिखाए गए। राज्य सरकार ने दवा की कि हजारों-लाखों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव (Investment Proposals) मिल रहे हैं। कभी सिंगापुर के साथ स्किल डेवलपमेंट और डेटा सेंटर के नाम पर एमओयू होते हैं, तो कभी देश के दूसरे शहरों (जैसे हैदराबाद या दिल्ली) में उद्योगपतियों के साथ बैठकें करके हज़ारों करोड़ के करार किए जाते हैं।
सरकार का यह तर्क होता है कि इससे छत्तीसगढ़ के स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, खेत और खदान से निकलकर स्थानीय उत्पाद सीधे ग्लोबल मार्केट तक जाएंगे, और राज्य का तेजी से विकास होगा।
लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है, वो यह है कि—
- देश में और छत्तीसगढ़ प्रदेश में आखिर सरकार ने कितने उद्योगपतियों के साथ, किस-किस कार्य के लिए और किन-किन शर्तों पर एमओयू किए?
- उनमें से कितनी कंपनियों ने जमीन पर असल में काम शुरू किया?
- कितना वास्तविक निवेश (Actual Investment) जमीन पर उतरा?
- और सबसे अहम सवाल—कितने स्थानीय युवाओं को वास्तव में पक्का रोजगार मिला?"
जवाबदेही कहाँ है? 'श्वेत पत्र' (White Paper) की मांग क्यों जरूरी है?
"यहीं पर आकर जनता को बेवकूफ बनाने का यह खेल बेनकाब हो जाता है।
छत्तीसगढ़ की जनता आज यह पूछने के लिए मजबूर हो चुकी है कि जब सरकार कंपनियों के साथ एमओयू साइन करती है, तो उसके बाद उन कंपनियों को कितनी ज़मीन रियायती दरों पर मुहैया कराई जाती है? इन्वेस्टर समिट्स और इन विदेशी दौरों के आयोजन पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन उसका रिटर्न क्या है? इसका कोई पुख्ता डेटा सरकार सार्वजनिक क्यों नहीं करती?
यही कारण है कि अब यह मांग उठने लगी है कि विष्णुदेव साय सरकार को इस पूरे मामले पर एक 'श्वेत पत्र' (White Paper) जारी करना चाहिए।
श्वेत पत्र का मतलब होता है—एक ऐसा आधिकारिक दस्तावेज जिसमें सरकार पिछले सालों और अपने कार्यकाल के दौरान किए गए सभी एमओयू, उन पर खर्च हुए बजट, विदेशी दौरों के कुल खर्च, और जमीन पर उतरे प्रोजेक्ट्स का कच्चा-चिट्ठा साफ-साफ जनता के सामने रखे।
पार्टियां आती हैं और चली जाती हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की भोली-भाली जनता को सिर्फ कागजी विकास के सपने दिखाकर ठगा जाता है। अगर सरकार ने वाकई धरातल पर काम किया है, तो श्वेत पत्र जारी करने से डर क्यों?"
"साथियों, खेल बहुत साफ है। राजनीति में 'इन्वेस्टमेंट' शब्द एक ऐसा ब्रह्मास्त्र बन चुका है, जिसका इस्तेमाल करके जनता का ध्यान असली मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं—से भटका दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से मालामाल राज्य है, यहाँ के संसाधनों पर देश का हक है, लेकिन यहाँ के स्थानीय युवाओं को रोजगार के नाम पर आज भी दर-दर भटकना पड़ता है। विदेशी दौरों की चमक-धमक और एमओयू के इन भारी-भरकम आंकड़ों से छत्तीसगढ़ के गरीब का चूल्हा नहीं जलता।
अब समय आ गया है कि हम और आप सवाल पूछें। सिर्फ तालियां बजाने के बजाय आंकड़ों का हिसाब मांगें।
आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या छत्तीसगढ़ सरकार को वाकई अपने इन दौरों और एमओयू का पूरा हिसाब जनता को देते हुए श्वेत पत्र जारी करना चाहिए? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय जरूर बताएं।

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