बुधवार, 1 जुलाई 2026

आधा दर्जन IPS-अफ़सरों पर गिरफ्तारी की तलवार!

 ED की ₹1700 करोड़ की चोट के बाद अब CBI पर दबाव, पूर्व CM भूपेश बघेल और आधा दर्जन IPS-अफ़सरों पर गिरफ्तारी की तलवार!



भिलाई से लेकर दुबई तक अरबों रुपयों का साम्राज्य खड़ा करने वाले 'महादेव ऑनलाइन सट्टा ऐप' मामले में अब तक की सबसे बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दुबई की बुर्ज खलीफा की आलीशान संपत्तियों सहित करीब 1700 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति अटैच (कुर्क) किए जाने के बाद, अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) पर भी कड़ा एक्शन लेने का भारी दबाव बन गया है। सूत्रों का दावा है कि सीबीआई अब इस मामले में शामिल 'बड़े मगरमच्छों' पर शिकंजा कसने और उन्हें पूछताछ के बहाने बुलाकर सीधे गिरफ्तार करने की फुलप्रूफ प्लानिंग में जुट गई है।

बुर्ज खलीफा से लेकर दिल्ली तक जब्ती, कुल आंकड़ा ₹4336 करोड़ पार

बुधवार को ईडी द्वारा जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, रायपुर क्षेत्रीय कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए दुबई के प्राइम लोकेशन पर मौजूद 18 और दिल्ली की 2 अचल संपत्तियों को कुर्क किया है। इसमें दुनिया की सबसे ऊंची इमारत 'बुर्ज खलीफा' के लग्जरी अपार्टमेंट, दुबई हिल्स स्टेट के विला और कई हाई-एंड फ्लैट्स शामिल हैं, जिनकी बाजार कीमत करीब 1700 करोड़ रुपये आंकी गई है। इस ताजी कार्रवाई के बाद महादेव ऐप मामले में अब तक कुल फ्रीज और कुर्क की गई चल-अचल संपत्ति का आंकड़ा चौंकाने वाले ₹4,336 करोड़ के पार पहुंच चुका है।

आरोपी नंबर-6 पूर्व CM भूपेश बघेल और IPS लॉबी राडार पर

महादेव सट्टा ऐप को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण देने के आरोपों को लेकर सीबीआई की चार्जशीट में बड़े खुलासे हुए हैं। सीबीआई की एफआईआर में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को 'आरोपी नंबर-6' बनाया गया है। इसके अलावा प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक रसूखदार पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सीबीआई के सीधे राडार पर हैं।

इनमें आईपीएल स्तर के अधिकारी और अन्य बड़े नाम शामिल हैं:

 आनंद छाबड़ा (प्रशासनिक/पुलिस अधिकारी)

 अभिषेक पल्लव (प्रशासनिक/पुलिस अधिकारी)

 प्रशांत अग्रवाल

 आरिफ शेख

 संजय ध्रुव (राज्य प्रशासनिक सेवा)

 चंद्रभूषण वर्मा (जमानत पर बाहर एएसआई)

सीबीआई की जांच के मुताबिक, ये तमाम अधिकारी महादेव सट्टा ऐप को बेखौफ चलाने और प्रोटेक्शन देने के एवज में हर महीने ₹10 लाख से लेकर ₹20 लाख तक की मोटी प्रोटेक्शन मनी वसूलते थे। इन सभी के खिलाफ धारा 120B और 420 के तहत केस दर्ज किया जा चुका है और कभी भी इनकी गिरफ्तारी की जा सकती है।

एक तरफ जांच का शिकंजा, दूसरी तरफ अफ़सरों को प्रमोशन का 'इनाम'?

इस पूरे मामले में एक तीखा और गंभीर विरोधाभास भी सामने आया है। एक तरफ जहां मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और 'अपराधियों को उल्टा लटकाकर सीधा करने' की हुंकार भरती है, वहीं दूसरी तरफ महादेव सट्टा ऐप के आरोपी घेरे में आए आनंद छाबड़ा और लोहारीडीह कांड के बाद हटाए गए अभिषेक पल्लव जैसे अधिकारियों को वेतन वृद्धि और प्रमोशन का 'इनाम' दिए जाने की खबरें हैं। सरकार की इस कथनी और करनी को लेकर अब सियासी गलियारों में तीखे सवाल उठने लगे हैं।

सिंडिकेट का नया पैंतरा: बैन के बावजूद बदले डोमेन, विपक्ष ने घेरा

हंगामा मचने और महादेव ऐप पर प्रतिबंध की बातों के बीच सट्टा सिंडिकेट ने 'गोल्ड 365', 'टाइगर एक्सचेंज' और 'लेजर 247' जैसे नए डोमेन बनाकर इस अवैध खेल को बदस्तूर जारी रखा। इधर विपक्ष (कांग्रेस) ने केंद्र सरकार पर इस ऐप को पूरी तरह बैन न करने का आरोप लगाते हुए पलटवार किया है कि महादेव ऐप का पैसा अब सत्ताधारी दल के एक बेहद प्रभावशाली नेता तक पहुंच रहा है, जिसके चलते मुख्य आरोपियों (सौरभ चंद्राकर और रवि उत्पल) को अभी भी राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है।

फिलहाल, ईडी की इस बड़ी चोट के बाद अब गेंद सीबीआई के पाले में है। देखना यह होगा कि धीमी रफ्तार से चल रही यह जांच कब अंजाम तक पहुंचती है, क्योंकि जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि 'डिलेड जस्टिस इज नो जस्टिस' (देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता)।

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मंगलवार, 30 जून 2026

छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन की कीमत पर भरी जा रही है सत्ता की तिजोरी?

 कॉरपोरेट चंदे का 'खेला': क्या छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन की कीमत पर भरी जा रही है सत्ता की तिजोरी?

 


ADR की रिपोर्ट का बड़ा खुलासा— राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को पछाड़कर बीजेपी के लिए 'दुधारू गाय' बना छोटा सा छत्तीसगढ़; कॉरपोरेट मेहरबानी और आदिवासियों की बेबसी के बीच का कड़वा सच।


जब देश के गृह मंत्री अमित शाह ने रायगढ़ विधानसभा क्षेत्र की एक चुनावी सभा में गरजते हुए कहा था कि "ओपी चौधरी को विधायक बनाओ, इन्हें बड़ा आदमी बनाने की जिम्मेदारी मेरी है," तब शायद ही किसी ने सोचा था कि इस 'बड़ा आदमी' बनाने के खेल के पीछे छत्तीसगढ़ के संसाधनों की इतनी बड़ी बिसात बिछाई जा रही है। आज यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या छत्तीसगढ़ के राजनेता बड़े आदमी बन पाए या नहीं, यह तो जांच का विषय है, लेकिन छत्तीसगढ़ के आसरे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) देश की सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी जरूर बन गई है ।

एडीआर (ADR) की रिपोर्ट और चंदे का चौंकाने वाला गणित

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की हालिया रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। विधानसभा चुनावों के दौरान चंदा उगाहने के मामले में भाजपा ने विपक्षी दलों को कोसों पीछे छोड़ दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य माना जाता है, लेकिन चंदे के मामले में इसने मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य को भी पीछे छोड़ दिया है ।

आंकड़ों की बाजीगरी को समझें तो:

 छत्तीसगढ़: भाजपा को यहाँ से कुल 76 करोड़ 29 लाख रुपये का चंदा मिला है, जबकि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को मात्र 27 लाख रुपये ही नसीब हुए ।

 मध्य प्रदेश: भाजपा को 54 करोड़ 3 लाख रुपये मिले, जबकि कांग्रेस को 1 करोड़ 34 लाख रुपये मिले।

 राजस्थान: भाजपा को 87 करोड़ 51 लाख रुपये का चंदा मिला ।

छत्तीसगढ़ से मिले कुल 76 करोड़ से अधिक के चंदे में से लगभग 70 करोड़ रुपये सीधे कॉरपोरेट घरानों की जेब से आए हैं । अब सबसे बड़ा और तीखा सवाल यही उठता है कि क्या सत्ता के दम पर कॉरपोरेट घरानों से यह 'उगाही' की जा रही है? आखिर एक छोटे से राज्य से कॉरपोरेट घराने सत्तारूढ़ दल पर इतने मेहरबान क्यों हैं?

'चंदा दो, धंधा लो'— क्या दांव पर है छत्तीसगढ़ के संसाधन?

छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए एक लंबा और दमनकारी दौर चल रहा है। हसदेव से लेकर बस्तर तक आदिवासियों का आंदोलन जारी है। राजनीतिक गलियारों और जमीन पर यह सीधा आरोप लग रहा है कि छत्तीसगढ़ को कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेचा जा रहा है । यह चर्चा आम है कि सूबे में मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक का चयन इस तरह किया गया है कि वे दिल्ली दरबार के इशारों पर काम कर सकें, जिसके चलते सूबे में कॉरपोरेट घरानों की मनमानी एंट्री हुई है ।

यूं तो देश में केवल 'अडानी' का नाम ही सबसे ज्यादा गूंजता है क्योंकि वे हर राज्य और हर बड़े ठेके में मौजूद हैं। लेकिन खेल सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। बस्तर में खदानों की नीलामी से लेकर कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा जैसे समृद्ध क्षेत्रों में अडानी के साथ-साथ कई अन्य कॉरपोरेट घरानों को मनमर्जी के मौके दिए जा रहे हैं । एडीआर के ये आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि छत्तीसगढ़ में एक नया समीकरण काम कर रहा है— "चंदा दो और छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधन ले जाओ" ।

संगीनों के साए में विकास या विनाश? रायगढ़ का वो वायरल सच

इस कॉरपोरेट मेहरबानी की सबसे डरावनी और दर्दनाक तस्वीर इन दिनों रायगढ़ के जेजामूड़ा से सामने आई है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है । जेजामूड़ा में अडानी की रेल लाइन बिछाने के काम को शुरू करने के लिए भारी पुलिस बल और कॉरपोरेट बाउंसरों की फौज तैनात की गई । संगीनों के साए में, पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में ग्रामीणों की आवाज को दबाया गया ।

इस पूरी बर्बरता के बीच एक आदिवासी महिला की बेबसी और चीख देश के लोकतंत्र के मुंह पर करारा तमाचा है। उस महिला के पति को पुलिस ने सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया ताकि कॉरपोरेट का काम बिना किसी बाधा के चल सके । रोती-बिलखती उस महिला ने कैमरे के सामने जो कहा, वह छत्तीसगढ़ की नियति बन चुका है:

"मेरे पतिदेव को पहले छोड़ दो, फिर अपना काम करवाते रहना। हम अपनी जमीन फ्री में दान दे देंगे, हम एक रुपया भी पैसा नहीं लेंगे, बस मेरे पतिदेव को छोड़ दो..."

"

यह बयान साबित करता है कि आज छत्तीसगढ़ का आम नागरिक, किसान और आदिवासी कॉरपोरेट और सत्ता के गठजोड़ के सामने कितना लाचार और असहाय हो चुका है। पुलिस और प्रशासन जनता की रक्षा करने के बजाय कॉरपोरेट के 'एजेंट' की भूमिका में नजर आ रहे हैं

निष्कर्ष: क्या यही है नए छत्तीसगढ़ की परिभाषा?

एडीआर की इस रिपोर्ट ने उस पर्दे को हटा दिया है जिसके पीछे विकास का ढोंग रचा जा रहा था। जब कॉरपोरेट की थैलियों से करोड़ों रुपये सत्ताधारी दल की तिजोरियों में पहुंचते हैं, तो नीतियां जनता के हित में नहीं, बल्कि उन थैलियों को भरने वालों के हित में बनती हैं।

सवाल अनुत्तरित है: क्या आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ के बचे-खुचे प्राकृतिक संसाधनों को भी इसी तरह कॉरपोरेट के हवाले कर दिया जाएगा? और क्या छत्तीसगढ़ की जनता को अपनी ही जमीन पर बंधक बनकर रहना होगा? चंदे की यह सियासत छत्तीसगढ़ को विकास की ओर ले जा रही है या विनाश की ओर, इसका फैसला आने वाला वक्त और प्रदेश की जागरूक जनता ही करेगी।

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सोमवार, 29 जून 2026

सीजी के अफसरों में 'रेंटल किंग' बनने होड़

 सीजी के अफसरों में 'रेंटल किंग' बनने होड़ 

साहबों की 'सफेद कमाई' का काला सच: आईएएस, आईपीएस और आईएफएस की घोषित संपत्तियों के पीछे का पूरा खेल



रायपुर। जिनके हाथों में जिलों की कमान है, जिनके पास नीतियों को बदलने और मोड़ने की ताकत है, और जिनके एक दस्तखत से कॉरपोरेट जगत के फैसले तय होते हैं—वे साहबान आजकल एक नए धंधे के बेताज बादशाह बन चुके हैं। यह धंधा है 'रेंट' यानी किराएदारी का। छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली और गुरुग्राम के प्राइम लोकेशंस तक, नौकरशाही के रसूखदारों ने प्रॉपर्टी का ऐसा जाल बुना है कि आज वे 'रेंटल किंग' कहलाने लगे हैं।

यह कोई कोरी अफ़वाह या विरोधी दलों का आरोप नहीं है, बल्कि खुद इन आला अफसरों द्वारा सरकार को सौंपे गए अचल संपत्ति के ब्यौरे (IPR) की वो हकीकत है, जो चीख-चीखकर तंत्र की रीढ़ में समाई विलासिता को बयां कर रही है। सवाल सीधा है—क्या यह सिर्फ निवेश से होने वाली आय है, या फिर रसूख के दम पर काली कमाई को 'सफेद' करने की कोई सोची-समझी तरकीब?

आईएफएस (IFS) ने मारी बाजी: जब 'जंगल के रखवाले' बने जमीनों के सौदागर

आमतौर पर माना जाता था कि अकूत संपत्ति और जमीनों के मामले में आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों के बीच ही रेस चलती है। लेकिन हालिया आंकड़ों ने चौंका दिया है। इस बार वन सेवा के अफसरों (IFS) ने सबको पीछे छोड़ दिया है।

 तपेश कुमार झा: इन्हें किराए से हर महीने ₹60,000 की आय हो रही है।

 अनिल कुमार साहू: इनकी रेंटल इनकम ₹84,000 प्रति माह दर्ज है।

 प्रेम कुमार: ₹64,000 की कमाई सिर्फ किराए से कर रहे हैं।

 संजीता गुप्ता: इन्हें भी हर महीने ₹94,000 का भारी-भरकम किराया मिल रहा है।

 अरुण कुमार पांडे: ₹61,000 की रेंटल इनकम इनके खाते में जा रही है।

इनमें से कई अफसरों की प्रॉपर्टीज या तो प्राइम लोकेशंस पर हैं या फिर परिवार के सदस्यों के साथ 'साझेदारी' के खेल में उलझी हुई हैं। जंगल की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले इन साहबों के पास शहर के पॉश इलाकों में आलीशान बंगले और कमर्शियल स्पेस कहां से आए, इसका जवाब कानून के गलियारों में गुम है।

खाकी का 'खास' रेंट: करोड़ों के घोटाले के साए और लाखों का किराया

कानून व्यवस्था और जांच एजेंसियों का रसूख रखने वाले आईपीएस अधिकारियों की फेहरिस्त और भी ज्यादा चौंकाने वाली है। इनमें उन चेहरों के नाम भी शामिल हैं जो बड़े विवादों और घोटालों की जांच के दायरे में रहे हैं।

 दीपांशु खाबरा: कोयला घोटाले में ईडी (ED) की पूछताछ का सामना कर चुके इस चर्चित चेहरे की सालाना या मासिक रेंटल इनकम के आंकड़े दंग करने वाले हैं। इन्हें किराए से ₹18 लाख की मोटी रकम मिल रही है।

 विवेकानंद: इनका साम्राज्य छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है। बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में फैली संपत्तियों से इन्हें ₹2 लाख 40 हजार का किराया मिल रहा है।

 पवन देव: इन्हें हर महीने ₹1,74,000 का किराया मिलता है।

 अरुण देव गौतम: ₹1,90,000 की रेंटल इनकम के साथ यह भी इस रेस में काफी आगे हैं।

 प्रदीप गुप्ता: इनका नेटवर्क उत्तर प्रदेश (UP) तक फैला हुआ है, जहां की संपत्तियों से इन्हें ₹60,000 का किराया मिल रहा है।

कुर्सी का 'कलेक्शन': आईएएस बिरादरी के वीआईपी रेंटर्स

नीति निर्माताओं और मंत्रालय में बैठने वाले आईएएस अफसरों की सूची भी कम दिलचस्प नहीं है। इनकी प्रॉपर्टी रायपुर के शंकर नगर, टैगोर नगर, समता कॉलोनी, चौबे कॉलोनी, छेरीखेड़ी और नया रायपुर जैसे उन इलाकों में हैं जहां आम आदमी जमीन की कीमत सुनकर ही पीछे हट जाता है।

 मनोज पिंगवा: कृषि भूमि के साथ-साथ कई फ्लैट्स के मालिक पिंगवा साहब को किराए से ₹1,800,000 (18 लाख) की भारी-भरकम रकम मिल रही है।

 गौरव द्विवेदी: इनकी रेंटल आय ₹36,000 घोषित है।

 विकासशील: उत्तराखंड से लेकर रायपुर तक फैले इनके प्रॉपर्टी एम्पायर से इन्हें ₹71,000 का रेंट मिल रहा है।

 रेणू पिल्ले: नया रायपुर के प्राइम फ्लैट्स से इन्हें ₹68,000 का किराया आ रहा है।

 रिचा शर्मा: छत्तीसगढ़ कैडर की इस अफसर की प्रॉपर्टी दिल्ली से सटे गुरुग्राम (गुड़गांव) में है, जहां से इन्हें भारी किराया मिल रहा है।

खोजी पड़ताल: रसूख और कॉरपोरेट का 'नेक्सस'

आखिर इन संपत्तियों का इतना ज्यादा और मनमाना किराया दे कौन रहा है? जब इस सच की तह तक जाने की कोशिश की गई, तो जो खेल सामने आया वह बेहद गंभीर है।

अधिकांश प्रभावशाली अधिकारियों ने अपनी संपत्तियां, बंगले और कमर्शियल स्पेस आम किरायेदारों को नहीं, बल्कि देश के बड़े कॉरपोरेट घरानों और निजी कंपनियों को किराए पर दे रखे हैं।

राजधानी रायपुर का 'मॉल श्री विहार' इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। एक दौर में मॉल श्री विहार के कई आलीशान बंगले असल में छत्तीसगढ़ के बड़े कॉरपोरेट घरानों के 'गेस्ट हाउस' या 'रेस्ट हाउस' बने हुए थे। कंपनियां इन प्रभावशाली अफसरों को खुश रखने के लिए बाजार दर से कहीं ज्यादा किराया चुकाती हैं। यह सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) का मामला है। जिस कंपनी के प्रोजेक्ट्स को क्लीयरेंस अफसरों की कलम से मिलना है, वही कंपनी साहब के बंगले का लाखों का किराया दे रही है—इसे आप क्या कहेंगे?

तीखे सवाल: क्या यह 'काली कमाई' का नया लॉन्ड्री सिस्टम है?

साल 2014 के बाद से इन अफसरों की प्राइम लोकेशंस पर संपत्तियों की बाढ़ सी आ गई है। घोषित संपत्ति तो सिर्फ 'टिप ऑफ द आइसबर्ग' (बर्फ का सिरा) है, असली खेल बेनामी संपत्तियों और करीबियों के नाम पर खरीदी गई जमीनों का है।

1. बाजार मूल्य का खेल: क्या इन संपत्तियों का वास्तविक किराया उतना ही है जितना दिखाया जा रहा है, या फिर कैश में ली गई घूस को 'रेंट' दिखाकर बैंक खातों में वैध किया जा रहा है?

2. कॉरपोरेट मेहरबानी क्यों?: बड़ी कंपनियां इन अफसरों की ही संपत्तियों को महंगे दामों पर किराए पर लेने के लिए इतनी आतुर क्यों रहती हैं? क्या यह सीधे तौर पर प्रशासनिक संरक्षण की कीमत है?

3. सरकार की चुप्पी: रेंटल किंग बन चुके इन नौकरशाहों पर सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती? क्या कोई ऐसा कड़ा कानून आएगा जो अफसरों के कॉरपोरेट डीलिंग्स और बेनामी किरायों पर नकेल कस सके?

निष्कर्ष:

जनता टैक्स देती है ताकि व्यवस्था सुचारू रूप से चले, लेकिन व्यवस्था चलाने वाले खुद 'जमींदार' और 'रेंटल किंग' बनकर बैठ गए हैं। जब तक इन घोषित किरायों और इन्हें देने वाली कंपनियों के संबंधों की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तब तक 'सफेद' कागजों के पीछे छिपा 'काला सच' कभी बाहर नहीं आएगा।

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रविवार, 28 जून 2026

जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे रसूखदारों पर किसका वरदहस्त?

 जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे रसूखदारों पर किसका वरदहस्त?


 मेडिकल घोटाला: ईओडब्ल्यू के पूरक चालान ने खोले राज, लेकिन 'अदृश्य शक्ति' के दबाव में 'बड़ी मछलियों' को बचाने का खेल जारी!


छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के बीच, जनता की जिंदगी और सेहत से खिलवाड़ करने वाले करोड़ों रुपये के छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन (CGMSC) घोटाले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा विशेष न्यायालय में पेश किए गए पूरक चालान के बाद पूरे प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक ही चर्चा है—आखिर भ्रष्टाचारियों और रसूखदार अधिकारियों को बचाने के लिए कौन सी 'अदृश्य शक्ति' सरकार और जांच एजेंसियों पर दबाव बना रही है? विधानसभा में जिन नामों की गूंज उठी थी, वे अचानक चालान की फाइलों से गायब कैसे हो गए?

₹50 करोड़ की सरकारी क्षति और 'पूल टेंडरिंग' का खेल

ईओडब्ल्यू (EOW) के आधिकारिक बयानों और जांच में यह तथ्य सामने आया है कि राज्य की गरीब और आम जनता को मुफ्त डायग्नोस्टिक जांच (हमार लैब योजना) उपलब्ध कराने के नाम पर भारी जालसाजी की गई। जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) के लिए खरीदे जाने वाले मेडिकल उपकरणों, रीएजेंट्स और कंज्यूम बेस की खरीदी में नियमों को ताक पर रख दिया गया।

जांच के अनुसार, 'पूल टेंडरिंग' के जरिए साठगांठ करके मोक्षित कॉरपोरेशन जैसी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। तय एमआरपी (MRP) दरों से कई गुना अधिक कीमत पर मेडिकल उपकरण खरीदे गए, जिससे सरकारी खजाने को सीधे तौर पर ₹50 करोड़ से अधिक का चूना लगा। ईओडब्ल्यू ने अपनी विवेचना में इसे एक गहरी आपराधिक साजिश और षड्यंत्र का हिस्सा माना है।

छोटे मोहरों पर गिरी गाज, असली 'मगरमच्छ' अब भी आजाद?

मामले में अब तक 10 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है। हालिया पूरक चालान में अभिषेक कौशल (डायरेक्टर, रिकॉर्ड्स एंड मेडिकल सिस्टम प्रा. लि.), राकेश जैन (शारदा इंडस्ट्रीज), प्रिंस जैन (लायजनिंग एजेंट और शशांक चोपड़ा का सगा जीजा), और कुंजल शर्मा (मार्केटिंग हेड, डायसिस इंडिया प्रा. लि.) जैसे कारोबारियों और दलालों के नाम शामिल हैं। इसके अलावा पांच अधिकारियों—बसंत कौशिक, कमलकांत पाटनकर, डॉक्टर अनिल परसाई, रुद्र रावटिया और दीपक कुमार बांधे की गिरफ्तारियां भी दिखाई गई हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह पूरी कार्रवाई सिर्फ 'चेहरे देखकर' और छोटे मोहरों को फंसाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश है?

विधानसभा का वो वादा और गायब हुए बड़े नाम

विधानसभा के पटल पर सरकार के मंत्रियों ने खुद दावा किया था कि इस महाघोटाले में स्वास्थ्य विभाग के 14 बड़े अधिकारी आरोपी हैं और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जब ईओडब्ल्यू की अंतिम चार्जशीट और पूरक चालान सामने आया, तो स्वास्थ्य विभाग के उन शीर्ष नीति-निर्माताओं, सचिवों और अनुमोदन (Approval) देने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के नाम गायब मिले, जिनकी कलम के बिना यह घोटाला मुमकिन ही नहीं था।

सूत्रों और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि आईएएस अधिकारियों और शीर्ष प्रबंधन के कुछ चेहरों को बचाने के लिए जांच की दिशा को सीमित कर दिया गया है। जिन बड़े नामों को जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए था, वे आज भी रसूख के दम पर व्यवस्था के 'नाक के बाल' बने हुए हैं। जनता पूछ रही है कि क्या इन रसूखदारों से कोई गुप्त 'सेटिंग' हो चुकी है या फिर उन पर किसी भारी राजनीतिक संरक्षण का हाथ है?

इतिहास खुद को दोहरा रहा है: क्या सबक सीखेगी सरकार?

छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य और चिकित्सा विभाग में घोटालों का इतिहास पुराना है। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान भी गर्भाशय कांड, नसबंदी कांड और आंखफोड़वा कांड जैसे अमानवीय और शर्मनाक हादसे हो चुके हैं। उस दौर में हुए घोटालों और बदइंतजामी के कारण तत्कालीन सत्ता को जनता के भारी आक्रोश का सामना करना पड़ा था। क्या वर्तमान सरकार भी उसी ढर्रे पर चल रही है, जहां दो-तीन दर्जन से अधिक दवाइयों के सैंपल लगातार फेल हो रहे हैं और कार्रवाई के नाम पर केवल मामूली जुर्माना या ब्लैकलिस्टिंग का नाटक किया जा रहा है?

पीपीपी (PPP) मॉडल या भ्रष्टाचार का नया जरिया?

घोटाले की जड़ें केवल उपकरणों की खरीदी तक सीमित नहीं हैं। राज्य में 'पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप' (PPP) मॉडल के नाम पर जो नया खेल शुरू हुआ है, वह भी संदेह के घेरे में है। अस्पताल सरकार का, मशीनें सरकार की, जगह सरकार की, बिजली-पानी सरकार का और जांच की फीस का भुगतान भी सरकार करेगी—तो फिर लैब चलाने का ठेका किसी निजी कंपनी को क्यों सौंपा जा रहा है? क्या छत्तीसगढ़ में प्रशिक्षित पैथोलॉजी वर्कर्स या बेरोजगार युवाओं की कमी है? जानकारों का मानना है कि यह पीपीपी मॉडल कुछ और नहीं, बल्कि चहेती कंपनियों और अपने लोगों को उपकृत करने और भ्रष्टाचार की नई राहें खोलने की सोची-समझी रणनीति है।

अंतिम सवाल: क्या मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री इस बात का जवाब देंगे कि विधानसभा में किए गए दावों के बावजूद बड़े अधिकारियों पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया? क्या दिल्ली तक गूंजने वाले इस घोटाले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर ₹50 करोड़ का यह दवा-उपकरण घोटाला फाइलों के नीचे हमेशा के लिए दफन हो जाएगा?

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