गुरुवार, 5 नवंबर 2026

स्मृति ईरानी के व्यवहार को लेकर उठते सवाल

स्मृति ईरानी के व्यवहार को लेकर उठते सवाल 


 क्या छत्तीसगढ़ के नेता सिर्फ दिल्ली दरबार की जी-हुज़ूरी करने के लिए बचे हैं? क्या हमारे सूबे में बाहर से आए किसी नेता को इतना हक मिल जाता है कि वो हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधियों का, हमारे जन-प्रतिनिधियों का सरेआम अपमान कर दे?

पिछले दिनों में छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में जो कुछ हुआ है, उसने राज्य के स्वाभिमान पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। भाजपा की एक बड़ी केंद्रीय नेता... अपने वही जाने-पहचाने 'तीखे तेवरों' के साथ दो दिन के दौरे पर छत्तीसगढ़ आईं।

लेकिन ये कोई सामान्य दौरा नहीं था यह दौरा था - तिरस्कार का! अपमान का! और घमंड के सरेआम प्रदर्शन का!

सोचिए... जो नेता स्वागत में मुस्कुराते हुए फूल देने आ रहे थे, उनका गुलदस्ता तक स्वीकार नहीं किया गया! जिस छत्तीसगढ़िया संस्कृति में 'गमछा' पहनाकर सम्मान देना परंपरा है, उस गमछे को ओढ़ने से इनकार कर दिया गया! हद तो तब हो गई जब स्वागत करने खड़े एक स्थानीय नेता को कैमरे के सामने डांटते हुए कह दिया गया— "अरे भाई! पहले अपना चश्मा उतारो!"

आज के इस रिपोर्ट में हम बात करेंगे— इस दो दिवसीय दौरे की पूरी इनसाइड स्टोरी की! बैठक के भीतर बंद कमरों में जो अपमान की पटकथा लिखी गई उसकी! और साथ ही याद दिलाएंगे कि कैसे गोवा से लेकर दिल्ली तक, विवादों से इस नेता का पुराना नाता रहा है।

चलिए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर इन दो दिनों में हुआ क्या!

जैसे ही प्रभारी महोदया का विमान रायपुर एयरपोर्ट पर लैंड हुआ, कार्यकर्ताओं में उत्साह था। ढोल-नगाड़े थे, फूलों के गुलदस्ते थे, छत्तीसगढ़ी परंपरा के मुताबिक गमछा ओढ़ाकर स्वागत करने की तैयारी थी।

लेकिन जैसे ही नेताजी गाड़ी से उतरीं... नजारा ही बदल गया!

  1. पहला वाक्या: गुलदस्ते का अपमान कार्यकर्ता बड़ी उम्मीद और सम्मान के साथ फूलों का गुलदस्ता आगे बढ़ाते हैं... लेकिन नेताजी का हाथ आगे नहीं बढ़ता! वे रुखाई से फूल लेने से इनकार कर देती हैं। गुलदस्ता वही हवा में लटका रह जाता है और कार्यकर्ता का चेहरा उतर जाता है।
  2. दूसरा वाक्या: गमछे से परहेज छत्तीसगढ़ में गमछा सिर्फ कपड़े का टुकड़ा नहीं है दोस्तों, यह हमारी माटी की अस्मिता है, अतिथि देवो भव: का प्रतीक है। लेकिन जब स्थानीय नेता गमछा ओढ़ाने लगे, तो उन्होंने साफ मना कर दिया!
  3. तीसरा वाक्या: "चश्मा उतारो!" सबसे शर्मनाक बात तो तब हुई जब स्वागत लाइन में खड़े एक वरिष्ठ कार्यकर्ता/नेता की तरफ इशारा करके बड़े कड़क अंदाज़ में कहा गया— "सामने खड़े हो तो चश्मा उतारकर बात करो!" सोचिए, सरेआम सैकड़ों कैमरों और कार्यकर्ताओं के सामने इस तरह डांटना... क्या यह नेता का व्यवहार है या किसी तानाशाह का आदेश?


इसके बाद जब गाड़ियों का काफिला प्रदेश कार्यालय पहुंचा, तो वहां कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि शायद अब मिज़ाज ठीक होगा। लेकिन असली क्लास तो बंद कमरों की बैठकों में लगनी बाकी थी!

बंद कमरे की बैठकें - समीक्षा या स्वाभिमान का हनन?


के अंदर जो हुआ, वो सुनकर आप हैरान रह जाएंगे!

जब प्रदेश स्तर के बड़े-बड़े नेता, मंत्री और पदाधिकारी टेबल के चारों तरफ बैठे थे, तो उम्मीद थी कि सरकार और संगठन के कामकाज पर स्वस्थ चर्चा होगी। लेकिन गूंज रही थी तो सिर्फ एक ही आवाज़— डांट-फटकार और झिड़की!

  • "तुम लोग काम क्या कर रहे हो?"
  • "संगठन ऐसे चलता है क्या?"
  • "समीक्षा रिपोर्ट कहां है?"

सवाल पूछना गलत नहीं है दोस्तों। संगठन में अनुशासन ज़रूरी है। लेकिन सवाल पूछने का अंदाज़ और नीयत क्या थी? प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो बैठक में किसी भी स्थानीय नेता को अपनी बात रखने का ढंग से मौका तक नहीं दिया गया। जो बोलने उठा, उसे बिठा दिया गया। जो रिपोर्ट दिखाने लगा, उसे कागज़ की कमियां बताकर खारिज कर दिया गया।

छत्तीसगढ़ के वो नेता, जिन्होंने सालों-साल माटी में पसीना बहाकर, संघर्ष करके पार्टी को खड़ा किया... वो उस कमरे में चुपचाप सिर झुकाए डांट सुनते रहे!

सवाल यह है: क्या छत्तीसगढ़ के स्थानीय नेताओं की कोई इज्जत नहीं है? क्या दिल्ली से आया कोई भी प्रतिनिधि हमारे नेताओं को इस तरह बेइज्जत करके चला जाएगा और सब खामोश रहेंगे?

विवादों से पुराना नाता - गोवा से दिल्ली तक का ट्रैक रिकॉर्ड

जो लोग इस नेता के इस व्यवहार से हैरान हैं, मैं उन्हें बता दूं... यह कोई पहली बार नहीं है! इनका विवादों और तीखे तेवरों से बहुत पुराना नाता रहा है।

आइए थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं।

आपको याद होगा गोवा का वो दौर! गोवा में जब ये ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं, तब भी वहां के स्थानीय कैडर और पार्टी के पुराने नेताओं के साथ इनका भारी टकराव हुआ था। गोवा के स्थानीय नेताओं का आरोप था कि बाहरी नेतृत्व उनके स्वाभिमान को कुचल रहा है। वहां भी 'हाईकमान कल्चर' का ऐसा प्रदर्शन किया गया कि कई पुराने कार्यकर्ता किनारे कर दिए गए या बगावत पर उतर आए।

गोवा ही नहीं, केंद्र और संगठन के अन्य मामलों में भी— चाहे वो टीवी डिबेट्स हों, सार्वजनिक मंच हों या आंतरिक बैठकें— इनका रवैया हमेशा से 'माय वे या हाईवे' (My way or the highway) वाला रहा है।

यानी: "मैं जो कहूं वही सही, बाकी सब बेवकूफ!"

और आज वही 'गोवा मॉडल ऑफ इंसल्ट' छत्तीसगढ़ में लागू करने की कोशिश की जा रही है!

छत्तीसगढ़ियों का अपमान - आखिर कब तक?

अब आते हैं सबसे बड़े और कड़वे सवाल पर!

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया... यह सिर्फ एक कहावत नहीं है। यह इस प्रदेश का चरित्र है। यहां के लोग सीधे, सरल और मेहमाननवाज़ होते हैं। लेकिन इस सरलता का मतलब यह कतई नहीं है कि आप हमारी सरलता को हमारी कमजोरी समझ लें!

ज़रा सोचिए:

  • जब आप एक छत्तीसगढ़िया नेता को सरेआम चश्मा उतारने को कहते हैं, तो आप सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं, उसके पीछे खड़े हज़ारों कार्यकर्ताओं का अपमान करते हैं!
  • जब आप हमारे प्रेम से दिए गए फूलों और गमछे को ठुकराते हैं, तो आप छत्तीसगढ़ की परंपरा और सम्मान का अपमान करते हैं!
  • जब आप बंद कमरे में जनप्रतिनिधियों को स्कूली बच्चों की तरह डांटते हैं, तो आप उस जनता का अपमान करते हैं जिसने उन्हें चुनकर भेजा है!

छत्तीसगढ़ बीजेपी के नेताओं से भी मेरा एक सवाल है— "आख़िर आपकी खामोशी की वजह क्या है?" सत्ता और संगठन के पद इतने बड़े हो गए कि अपने ही स्वाभिमान की बलि चढ़ा दी जाए? क्या दिल्ली के सामने इतना डर है कि कोई एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा?

अगर आज आपने इस अपमान को चुपचाप सह लिया, तो कल कोई भी बाहर से आकर आपको ऐसे ही जलील करेगा!

राजनीति अपनी जगह है, पार्टियां अपनी जगह हैं। लेकिन राजनीति से ऊपर होता है— राज्य का सम्मान और कार्यकर्ताओं का आत्मसम्मान!

दो दिनों का यह दौरा खत्म हो गया। गाड़ियां रायपुर से दिल्ली उड़ गईं। लेकिन पीछे छोड़ गईं कई कड़वे सवाल, सहमे हुए कार्यकर्ता और एक दबा हुआ गुस्सा!

क्या इस तीखे तेवर से संगठन मजबूत होगा? या फिर यह गुस्सा चुनाव और आने वाले वक्त में पार्टी के लिए ही भारी पड़ने वाला है? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

लेकिन आपकी इस पर क्या राय है? क्या प्रभारी महोदया का यह रवैया सही था? क्या किसी नेता का इस तरह स्वागत ठुकराना और डांटना जायज है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखिए!


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