पेंड्रावन बांध पर क्यों मंडरा रहा है फिर से खतरा?
रायपुर ज़िले से लगा हुआ ब्रिटिश ज़माने का पेंड्रावन जलाशय कोई आम तालाब नहीं है। यह इलाक़े के 20 से ज़्यादा गांवों के हज़ारों किसानों और ग्रामीणों की 'जीवनदायिनी' है। इसी पानी से खेती होती है, मछली पालन होता है, और पूरे क्षेत्र का भूजल स्तर (Groundwater level) रिचार्ज होता है।
लेकिन इस सरकार की नज़र इस पर क्यों गड़ी हुई है? क्योंकि इस बांध के कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्र) में कीमती खनिज छिपे हैं!
और सरकार ने क्या किया? हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश की आड़ लेकर, जल संसाधन विभाग ने चुपचाप तरीके से खनन कंपनी को वहां सर्वे और एक्सप्लोरेशन (अन्वेषण) की अनुमति दे दी!
(थोड़े तीखे तेवर में) ज़रा याद कीजिए, साल 2017 में भी यही हरकत की गई थी। तब 'नवभारत' अखबार ने इस खुलासे को छापा था, और जनता के भारी विरोध के बाद सरकार को घुटने टेकने पड़े थे। विधानसभा के बजट सत्र में तत्कालीन मंत्री को खुद खड़े होकर वह एनओसी (NOC) रद्द करनी पड़ी थी। आईआईटी रुड़की और डैम सेफ्टी बोर्ड ने साफ कहा था कि अगर यहां माइनिंग हुई, तो पेंड्रावन बांध का अस्तित्व ही नक्शे से मिट जाएगा!
लेकिन जब नीयत में ही खोट हो, तो सरकारें बाज कहां आती हैं? मौका मिलते ही फिर से गुपचुप तरीके से रास्ता निकाल लिया गया। अब वहां के 20 गांवों के किसान फिर से सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
नवा रायपुर का सेंध जलाशय — इको-टूरिज्म या पर्यावरण का कत्ल?
अब आते हैं दूसरे मामले पर—नवा रायपुर का सेंध जलाशय!
यहां सरकार का खेल थोड़ा आधुनिक और शातिर है। यहां सीधे खनन नहीं, बल्कि 'सौंदर्यीकरण और पर्यटन' के नाम पर खेल खेला जा रहा है। नवा रायपुर विकास प्राधिकरण (NRDA) ने क्या किया? सेंध और झांझ जलाशयों को 'इको-टूरिज्म' और 'वाटर स्पोर्ट्स' के नाम पर आम जनता से छिन्न-भिन्न कर दिया।
जलाशय के पानी को पाटा गया, उसके प्राकृतिक किनारों को तोड़ा गया और वहां 40 करोड़ रुपये से ज़्यादा के पक्के कंक्रीट पाथवे, रिटेनिंग वॉल और दुकानें खड़ी कर दी गईं! जिस आद्रभूमि (Wetland) को आपको बचाना चाहिए था, वहां कंक्रीट का जंगल बना दिया गया।
छत्तीसगढ़ राज्य वेटलैंड अथॉरिटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में साफ कहा कि यह सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (Environment Protection Act) का खुला उल्लंघन है! अथॉरिटी ने तो रायपुर कलेक्टर को यह तक निर्देश दिए कि इन नियमों को तोड़ने वालों के खिलाफ कोर्ट में फौजदारी मुकदमा दर्ज कराया जाए, जिसमें 5 साल तक की जेल हो सकती है।
लेकिन मजाल है कि प्रशासन के कान पर जूं रेंगे! नेशनल ग्रीन हरित अधिकरण (NGT) के सख्त निर्देशों को ताक पर रखकर, आज भी वहां पानी के स्रोतों को दरकिनार करके नए-नए टेंडर निकाले जा रहे हैं और व्यावसायिक leases बांटी जा रही हैं।
बीजेपी की नीति — "एक-एक करके बेच दो सब कुछ!"
इन दोनों मामलों को एक साथ जोड़कर देखिए। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह एक सोची-समझी नीति है!
आज सत्ता में बैठी सरकार की आर्थिक और पर्यावरण नीतियां पूरी तरह से जनता विरोधी हो चुकी हैं। इनका फॉर्मूला बिल्कुल साफ है:
- पहले किसी बड़े प्रोजेक्ट, पर्यटन या विकास का मुखौटा सामने लाओ।
- उसके बाद प्राकृतिक जल स्रोतों, जंगलों और कैचमेंट एरिया को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाओ।
- और अंत में, उस पूरी संपदा को किसी निजी कंपनी या चहेते ठेकेदारों को लीज पर सौंप दो!
चाहे हसदेव के जंगलों को काटना हो, चाहे पेंड्रावन के कैचमेंट में माइनिंग की छूट देनी हो, या फिर सेंध जलाशय को कंक्रीट में बदलकर व्यावसायिक बनाना हो—मकसद सिर्फ एक है: प्रकृति को उजाड़ो, और पूंजीपतियों की तिजोरी भरो!
सरकार 'सबका विकास' का नारा ज़रूर देती है, लेकिन असलियत यह है कि विकास सिर्फ उन मुट्ठीभर कंपनियों का हो रहा है जो आपकी सांसें और पानी तक खरीदने की ताकत रखती हैं।
पेंड्रावन के ग्रामीणों ने 'पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति' के बैनर तले एक बार फिर आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। पर्यावरणप्रेमी लगातार आवाज़ उठा रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक आम जनता को अपनी ही ज़मीन, अपना ही पानी और अपनी ही आबोहवा बचाने के लिए सड़कों पर संघर्ष करना पड़ेगा? क्या सरकार का एकमात्र काम देश के प्राकृतिक संसाधनों को कंपनियों के हाथों गिरवी रखना रह गया है?
इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या विकास के नाम पर हमारे तालाबों और बांधों को नष्ट करना सही है? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर बताएं।
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