शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

₹2,500 करोड़ का सिकासार टेंडर विवाद

  ₹2,500 करोड़ का सिकासार टेंडर विवाद: बड़ा सवाल या सिर्फ प्रशासनिक फैसला?



जब 2,500 करोड़ रुपये का सरकारी प्रोजेक्ट सामने आता है, तो वह सिर्फ सीमेंट, गिट्टी या पाइपलाइन का मामला नहीं रहता... वह जनता के टैक्स के पैसे का मामला होता है!

छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में इन दिनों ₹2,524 करोड़ से ज़्यादा का एक टेंडर सुर्खियों में है। सिकासार से कोडर जलाशय लिंक नहर परियोजना!

मई में टेंडर निकलता है, जून में प्रक्रिया आगे बढ़ती है और जुलाई के आखिरी हफ्ते में 'दिलीप बिल्डकॉन' यानी DBL को L-1 बिडर घोषित कर दिया जाता है।

पहली नज़र में यह एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया दिखती है। लेकिन जब इस पूरे मामले के पन्नों को पलटते हैं, तो कई ऐसे सवाल खड़े होते हैं जिन्हें लेकर अब राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में सरकार को घेरा जा रहा है!

क्या इस मेगा टेंडर में नियमों के खेल हुए? क्या शुद्धि-पत्र (Corrigendum) का इस्तेमाल प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए हुआ या किसी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए? और सबसे बड़ा सवाल—जब विरोधी ठेकेदारों ने समय बढ़ाने की मांग की, तो सरकार ने इतनी जल्दीबाज़ी क्यों दिखाई?

आज के इस वीडियो में हम इस 2,500 करोड़ रुपये के टेंडर खेल की पूरी इनसाइड स्टोरी आपके सामने रखेंगे!"


"सबसे पहले आसान भाषा में समझिए कि यह प्रोजेक्ट क्या है।

पैरी परियोजना के तहत सिकासार जलाशय से कोडर जलाशय तक एक बड़ी लिंक नहर और पाइपलाइन बिछाई जानी है।

  • लागत: ₹2,524.32 करोड़ (बिना GST के)।
  • समय सीमा: 30 महीने।
  • काम: पाइपलाइन बिछाना, टेस्टिंग, कमीशनिंग और अगले 5 साल तक इसका मेंटेनेंस (O&M)।

यह प्रोजेक्ट छत्तीसगढ़ के एक बड़े हिस्से के किसानों और सिंचाई व्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि प्रोजेक्ट की ज़रूरत है।

लेकिन सवाल प्रोजेक्ट की नीयत पर नहीं, टेंडर की प्रक्रिया पर उठ रहे हैं!"

विवाद की असली जड़ - 'शुद्धि-पत्र' का खेल 

"अब आते हैं विवाद की असली क्रोनोलॉजी पर।

मई 2026 में टेंडर जारी होता है। 15 जून तक बोली लगाने की तारीख तय की जाती है। लेकिन इस बीच जल संसाधन विभाग की तरफ से जारी होते हैं कई 'शुद्धि-पत्र' यानी Corrigendum!

अब आप पूछेंगे कि Corrigendum क्या होता है? साधारण शब्दों में, जब टेंडर की शर्तों या नियमों में कोई बदलाव या संशोधन करना होता है, तो विभाग शुद्धि-पत्र जारी करता है।

लेकिन आरोप क्या हैं? आरोप यह लग रहे हैं कि प्री-बिड मीटिंग के बाद पात्रता (Eligibility) और तकनीकी शर्तों में ऐसे संशोधन किए गए, जिससे कई स्थानीय और मंझे हुए ठेकेदारों के समीकरण बिगड़ गए।

जब नियमों में बदलाव हुआ, तो बोली लगाने वाली कंपनियों ने मांग की कि उन्हें नए नियमों के अनुसार कागजात तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय (Extension of time) दिया जाए।

लेकिन आरोप है कि समय बढ़ाने की मांग को नज़रअंदाज़ कर दिया गया!

यहाँ सवाल उठता है—इतने बड़े ₹2,500 करोड़ के प्रोजेक्ट में आखिर इतनी हड़बड़ी क्यों? अगर शर्तें बदली गईं, तो प्रतिस्पर्धा (Competition) को बढ़ाने के लिए extra time देने में क्या हर्ज था?"

कोर्ट की दहलीज तक पहुँचा मामला

"बात सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही। मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय तक पहुँचा। M/s Shiv Shakti Construction Company जैसी संस्थाओं ने इस प्रक्रिया को चुनौती दी।

अदालत में सरकार और विभाग का अपना तर्क था। सरकार ने कहा कि शुद्धि-पत्र जारी करना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है और प्रोजेक्ट की जनहित में urgency को देखते हुए टेंडर समय पर पूरा कराना ज़रूरी था।

कानूनी तौर पर कोर्ट ने माना कि प्रक्रियात्मक संशोधनों में कोई सीधी अवैधता नहीं है, इसलिए टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ी।

लेकिन दोस्तों, 'कानूनी रूप से सही होना' और 'प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता होना'—इन दोनों बातों में बहुत फर्क होता है!

जनता का सवाल कानून की बारीकियों से परे यह है कि क्या ₹2,500 करोड़ का काम ऐसा माहौल बनाकर दिया गया जहाँ सिर्फ गिनी-चुनी बड़ी जॉइंट वेंचर कंपनियां ही रेस में टिक सकें?"


"25 जून को टेक्निकल और फाइनेंशियल बिड खुलती हैं। और 27-28 जुलाई के आसपास विभाग आखिरकार दिलीप बिल्डकॉन (DBL) के जॉइंट वेंचर को L-1 बिडर घोषित कर देता है।

28 जुलाई को कंपनी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) को आधिकारिक जानकारी देती है कि उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार से ₹2,524 करोड़ का यह मेगा प्रोजेक्ट मिल चुका है।

अब जरा पूरे चक्र को देखिए: मई में टेंडर → जून में संशोधन और आपत्तियां → जुलाई के अंत में L-1 का ऐलान!

जब विपक्ष इस मामले में सरकार की पारदर्शी कार्यशैली पर सवाल उठाता है, तो सरकार का 

जवाब होता है 'सब नियम के तहत हुआ है'। लेकिन विपक्ष का कहना है कि नियमों को इस तरह मोड़ा गया कि मनचाही कंपनी फिट बैठ जाए!"


"आज छत्तीसगढ़ की जनता

 और करदाता के तौर पर हमें सरकार और प्रशासन से 3 सीधे सवाल पूछने होंगे:

  1. पहला सवाल: यदि टेंडर में संशोधन किए गए, तो अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियों को तैयारी का पूरा समय देने से मना क्यों किया गया?
  2. दूसरा सवाल: क्या इतने बड़े टेंडर में प्रतिस्पर्धा सीमित होने से राज्य के खजाने को नुकसान नहीं होता?
  3. तीसरा और सबसे अहम सवाल: जल संसाधन विभाग में बड़े टेंडरों को लेकर बार-बार उठने वाले विवादों पर सरकार की चुप्पी का क्या मतलब निकाला जाए?

विकास होना चाहिए, सिकासार का पानी कोडर तक पहुँचना चाहिए, इसमें किसी को एतराज नहीं है। लेकिन विकास का रास्ता पारदर्शिता से होकर जाना चाहिए, न कि संदिग्ध प्रक्रियाओं से!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें