मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

मिडिया पर मिडिया का प्रकाशन शीघ्र

मिडिया पर मिडिया का प्रकाशन  शीघ्र
मैं और मेरा प्रेस क्लब की अपार सफलता और रिकार्ड तोड़ बिक्री के बाद मेरी दूसरी पुस्तक मिडिया पर मिडिया तैयार है। ..... कवर पेज बन गया है। ....... शीघ्र छपने जा रहा है
आपका प्यार फिर चाहिए।

गुरुवार, 12 मई 2016

स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...

स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/

शनिवार, 7 मई 2016

जो घर फूंके अपना के चले हमारे साथ...


कबीरदास की यह पंक्ति कभी मीडिया के लिए उदाहरण हुआ करती थी। आलोचना तब भी बर्दाश्त के बाहर की बात थी। परन्तु समय बदला तो मीडिया का रुख भी बदल गया। बाजार वाद में कबीर की यह पंक्ति कहीं खो गई। अखबार कमाई का जरिया बनने लगा और 90 के दशक के बाद इस पेशे में दो तरह के लोग आने लगे। एक वे जो इस पैसे के बाजारीकरण से प्रभावित हुए और व्यवसाय के रुप में इसे देखते थे। दूसरे उस तरह के लोग अखबार या चैनल लांच करने लगे जो गलत सलत ढंग से अनाप शनाप पैसा कमाये और अपने धंधे को संरक्षण देने का उद्देश्य लेकर आये।
छत्तीसगढ़ में भी दूसरे किस्म के लोगों की संख्या अधिक रही जो गलत सलत कामों से पैसा कमाकर अखबार खोलने लगे और शासन प्रशासन में रुतबा बनाने की कोशिश में लग गये। इसमें एक नाम बालकृष्ण अग्रवाल का प्रमुखता से लिया जा सकता है। हालांकि अपने अखबारों को नामचीन पत्रकारों को नौकरी पर रखने के बावजूद ऐसे लोगों के मंसूबों को जनमानस ने कभी तवज्जों नहीं दी परन्तु ऐसे लोगों को मंत्री व प्रशासनिक स्तर पर तवज्जों जरुर मिली।
अभी भी ऐसे लोग अपने कुकर्म छुपाने अखबार का सहारा ले रहे हैं परन्तु जनमानस अच्छे कर्मों को जानते हुए उनके अखबार को तवज्जों नहीं देते। सुबह शाम हो या दोपहर हो या मैग्जिन इस तरह के लोगों को नेताओं और अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। ये लोग पत्रकारों को अपने निजी फायदे के लिए शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल करना जानते है।
इस कड़ी में अब एक और नाम उभर कर सामने आया है। डाक्टरी के पेशे में नाम कमा चुके इस शख्स को पता नहीं कैसे अखबार खोलने की चूल लग गई है। इसे चूल किसने लगाया यह तो वही बता पायेंगे परन्तु अखबार के रुतबे से प्रभावित इस डाक्टर ने अखबार तो शुरु कर रहा है परन्तु इसकी दिक्कतों से वह अनजान है। अखबार खोलना कभी उस कहानी की तरह है जिसमें दुश्मनी भुनाना हो तो किसी को ट्रक खरीदने की सलाह दे दो। जिस तरह से ट्रक खरीदने वाला डीजल पम्प, मिस्त्री से लेकर ड्राइवर तक से त्रस्त रहता है और कर्ज में डूबता चला जाता है ठीक उसी तरह दैनिक अखबार चलाने वाला यदि आज के समय में सौ करोड़ से कम का आसामी है तो उसे कर्ज के जाल में फंसने से कोई रोक नहीं सकता। थोड़े से ऊंच नीच मं वह शासन-प्रशासन के कोपभाजन का शिकार भी होता है। फिर पत्रकारों को काम पर खना वैसे ही कठिन काम है। और यदि सर्कुलेशन कम हुआ तो फिर उसे जनसंपर्क विभाग भी आंख दिखाकर पसीना छुड़ा सकता है।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

मुकाबले से भागना



कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के चेहरे में भीषण गर्मी की परेशानी साफ झलकने लगी। इधर उधर देखते, कसमसाते हुए अंतत: उन्होंने दीक्षांत समारोह में पहनाये गाउन को उतार ही दिया। बगल में बैठे प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की मुस्कान का अर्थ क्या था यह तो वही जाने परन्तु गृहमंत्री राजनाथ सिंह की परेशानी उनके चेहरे से साफ झलकने लगा था।
विगत सालों में रायपुर के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। हर आदमी परेशान है। गांव-बस्तियों से विकास के नाम पर पेड़ों की बलि चढ़ाई जा रही है। गर्मी की बढ़ती अकुलाहट से आदमी का दिमाग अब एसी-कूलर से निकलकर जंगल की तरफ भागने लगा है। पेड़ लगाओं, पानी बचाओं की चिल्ल पौ शुरु हो गई है। राउण्ड टेबल कांफ्रेंस में बोतल बंद पानी के साथ गर्मी प्रदूषण से निजात की योजनाएं बनाई जाने लगी। एक वर्ग है इस देश में जो सिर्फ सीख देता है और एक वर्ग विपक्ष है जो केवल आलोचना करता है। सत्ता के बाहर कुछ सत्ता में आते ही कुछ। बेचारी जनता के पास तो गाउन उतारने तक का अधिकार नहीं है।
वेद कहता है - या मृध, तेन व्यक्तेन भुंजीथा। लालच मत करो और धन का त्यागपूर्वक भोग करो। परन्तु उत्तर आधुनिकता के  इस सोपान पर खड़े सत्ताधारी को इस गुढ़ वाक्य से क्या लेना देना। उसे तो हर हाल में सुविधा चाहिए। सुविधा इस कदर हावी हो गया है कि वह कठिन परिस्थितियों में विचलित हो जाता है। सीधा मुकाबले से दूर भागता है। दुश्मन के प्रत्यक्ष वार को भी वह छद्य वार के रुप में देखता है। पाकिस्तान लगातार इस देश को अस्थिर करने की कोशिश में लगा है। आतंकवाद और घुसपैठ के चलते आम आदमी की सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह है। कहां-कब किस तरह से आम लोगों की जिन्दगी के परखच्चे उड़ा दिये जाएंगे कोई नहीं जानता। सीमा पर नियंत्रण रेखा के पास सीज फायर का लगातार उल्लंघन हो रहा है। पाक के चौतरफा वार से भले ही हम घबराते नहीं है परन्तु सीधी कार्रवाई से हमारे हाथ-पांव फूल जाते है। देश हमारा, शिकार हम हो रहे हैं फिर मुकाबले की बजाय विश्व बिरादरी को गाउन की परेशानी को दिखाने की कवायद कितनी जायज है।
दीक्षांत समारोह में  और भी लोग मौजूद थे जो गाउन पहने थे। गर्मी उन्हें भी लग रही थी। परन्तु गृहमंत्री राजनाथ सिंह ही गर्मी नहीं सह पाये जबकि राजनाथ सिंह की परेशानी देख मुख्यमंत्री रमन सिंह मुस्कुराते रहे। उनके मुस्कान का क्या अर्थ है। क्या वे इस असहज होते माहौल को सहज कर रहे थे या राजनाथ की गर्मी तक नहीं सहपाने का अर्थ ढूंढ रहे थे।
दोनों ही बातों का अपना अर्थ है। त्याग से भोग करने में मानव मजबूत होता है समाज में समता और समन्वय स्थापित होता है जबकि भोग से भोग आदमी को सुविधा भोगी ही नहीं बनाता बल्कि मुकाबले के लिए भीतर से मन को खोखला कर देता है। राष्ट्र का अहित तो होता ही है। आदमी स्वयं को दिलों दिमाग से कमजोर कर लेता है। वह तब दुश्मन से सीधे मुकाबले से परहेज करता है। सुविधा छिन जाने के भय से ही वह मुकाबले से दूरी बना लेता है।
परन्तु आम आदमी इस विषम परिस्थिति को हंस कर झेल लेता है उसके पास छिन जाने का भय नहीं है। उसे तो हर हाल में संघर्ष करना है। वह जानता है सोना तपकर ही खरा होता है। गाउन की परेशआनी समय आने पर उतर ही जायेगा। इसी विश्वास में वह गर्मी को भी हंसकर सह लेता है।

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

आतंकवादी से खतरनाक है सड़कें

आतंकवादी से खतरनाक है सड़कें
आतंकी सड़कों में पहचान की जद्दोजहद 
एक शेर है ---
घर से निकलो तो पता जेब में रखकर निकलो।
हादसे चेहरों की पहचान मिटा देते हैं ।।
पहचान मिटने के गुनहगार तो हम सब हैं। सच को मानने  का हौसला किसी के पास नहीं है।  विकास की राह में कुछ ऐसा घालमेल हुआ है कि खिड़कियों को हमने खोलना बंद कर दिया है। रेल और हवाई जहाज और ६-८ लेन की सड़कों को देख हमने दुनिया नाप लेने का मन बना लिया है।  परन्तु इन्ही  सड़कों में अपनी पहचान गंवा रहे लोगों की तरफ मुंह मोड़ लिया है।  चाँद और मंगल तक के सफर में हमने खूब सीने  चौड़े किये हैं , परन्तु इसके प्रभाव की तहजीब हम आज भी नहीं सीख पा  रहे हैं।
विकास की हमने नई परिभाषाएँ गढ़  ली है।  एक तरफ पुराने को ढहाया जा रहा है,और दूसरी तरफ नए के जोश से हमारे होश गायब है। नई रफ़्तार के वाहनों का रेलमपेल हमने  सड़कों पर तो उतार दी , सड़के भी चौड़ी कर दी , परन्तु इस रफ़्तार में पहचान खोने का भान ही नहीं रहा। हमने इस सवाल का उत्तर जानने की कोशिश ही नहीं की, कि रफ़्तार में पहचान कैसे बनाए रखे।  चौड़ी सड़के , तेज रफ़्तार के इस विकास में हमें स्वयं की पहचान बनाए रखना कितना जरूरी है।  यदि स्वयं की पहचान कायम नहीं रख पाए तो इन चौड़ी  सड़कों का औचित्य ही क्या रह पाएगा।
नियम-कानून इसलिए बनाए जाते है,ताकि सब कुछ व्यवस्थित चले। समाज सुखी व् आनंद से रहे , हमने हजारों साल पहले एक यात्रा शुरू की थी। बच्चा पहले माडी के बल चलता है,फिर वह खड़ा होकर चलने की कोशिश करता है। इस कोशिश में वह माँ की ऊँगली का सहारा लेता है,फिर धीरे-धीरे वह चलता है,दौड़ता है। कुछ बड़े और कुछ स्वयं के तजुर्बों से वह सीखता है। वह दौड़ता है,परन्तु कितने लोग पूरा जीवन अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाते।
यही हल इन दिनों विकास की आंधी में अपने को घालमेल कर लेने वालों का है। रफ़्तार वाली गाड़ियां लेकर वे  सड़कों पर निकल जाते हैं , उन्हें लगता है,हैंडल उसके हाथ में है,ब्रेक पांव में है। तब खतरा किस बात का। वे खतरों को जानना ही नहीं चाहते। वे मोटर यान अधिनियम के जरूरी मापदंडों को समझना ही नहीं चाहते। मोटर साइकल वालों को हेलमेट व्यर्थ का बोझ और चार पहिया वालों को सीट बेल्ट बेवजह का बंधन लगता है। परन्तु वे भूल जाते हैं कि  सिर्फ इस बोझ और बंधन की वजह से सड़क दुर्घटना में २० से २५ फीसदी कमी आ सकती है , किसी अनहोनी में उनकी पहचान कायम रह सकती है।
पुरे देश में रफ़्तार की वजह से मरने वालों की संख्या हर साल लाख से उप्र है। छत्तीसगढ़ में ही यह आंकड़ें हर साल चार हजार से ऊपर पहुंच रही है। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2014 में बारह हजार से अधिक लोग मारे गए,जबकि इतने ही लोग अपाहिज  हो  गए।   सिर्फ  सड़के चौड़ी हो जाने से या रफ़्तार कम हो जाने  से दुर्घटनाएं नहीं टलती , इसके लिए जरूरी है , मोटर यान अधिनियमों का पालन करना। हम हर बात पर सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकते। हेलमेट पहनना जरूरी है,यह स्वयं को समझना होगा। सीट बेल्ट बांधना है,यह स्वयं की तहजीब में शामिल होना चाहिए।
हम जिस तरह से नौकरी के लिए तयशुदा समय में पहुंचते हैं,उसी तरह से हमे अपनी सुरक्छा का तहजीब धर्म और कर्तव्य की तरह निभाना पड़ेगा। सामान्य तहजीब नहीं सिखने वालों की वजह से उनका परिवार तबाह हुआ है। कोई अपाहिज होकर बोझ बन रहा है , तो कोई किसी बच्चे को अनाथ और महिला को विधवा होने का संताप दे रहा है।  संवेदना मशीनों के बीच खड़ी होकर फुर्र हो रही है। हम चीटीं का पेट नहीं बना सकते ,हम खरगोश के कान नहीं गढ़ सकते,तो फिर स्वयं को इस तरह मौत के मुंह में डालने की अनजानी कोशिश क्यों करनी चाहिए। जब हमने स्वयं को बनाया ही नहीं तो फिर मिटाने के लिए क्यों तुले हैं। हमने नक्सली हमले और आतंकी हमले में मरने वालों के आंकड़े इकठ्ठे किये। इस पर बवाल भी मचाया पर क्या किसी ने सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों  को जानने की कोशिश  की। सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या किसी भी नक्सली और आतंकी हमले से  आहत लोगों की संख्या से  अधिक है। हमने अपने इन करतूतों पर कभी बवाल नहीं मचाया। मोटर यान अधिनियम की अनदेखी ने सड़क को आतंकी के रूप में खड़ा कर दिया है,परन्तु इसकी चिंता कंही दिखाई नहीं देती।
यह सच है  कि मृत्यु अवश्वम्भावी है पर  तरह स्वयं होकर मृत्यु का आव्हान करना कितना तर्क संगत है। विश्व का सारा चिंतन मनन इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि मानव और मानवता से बड़ा कुछ नहीं है , फिर जो नियम बने हैं उसे हमारे द्वारा चुनी सरकारों ने ही बनाए हैं,तब भला इन नियमों के साथ चलने में असुविधा कैसी ? चलो हेलमेट के बोझ और सीट बेल्ट के बंधन  अंगीकार कर अपनी पहचान बचा लो। सड़कों को आतंकवादी बनने से रोक लो।


सोमवार, 4 अप्रैल 2016

नवरात्रि की ज्योति

नवरात्रि की ज्योति
त्यौहार सावन में बहते झरने की तरह जीवन में प्रवाह पैदा करता है। वह सूरज की चमक पैदा करता है तो चाँद की शीतलता को अंगीकार करता है।  इससे हमारी आस्थाओं की फसले पुष्ट होती है।  हरी होती है,और एक सुगंध फैलाती है,जो मानव को मानव बना रहने का रास्ता होता है।  भारतीय जीवन ने इस गहरी पैठ को समझा है। ज्ञान और कर्म के इस अद्भुत मेल का नाम ही तो त्यौहार है। समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को खुशियां मनाने का हक है,और त्यौहार के माध्यम से वह मंदिरों के चौखट तक आकर सब संग साथ खड़े होते है।  जात -पात  के बंधन से परे नवरात्रि की ज्योति सबको समान रूप से ऊष्मा , ऊर्जा प्रदान करती है।
फाल्गुन के उत्साह व् रंग में सराबोर पकृति मदमस्त होकर झूमती है तब भाषा बोली का भेद मीट जाता है।  स्वयं के भीतर के विकास को रंगो से साथ धोने का कर्म पूरा एक पक्छ चलता है।  होलिकोत्सव  से रंगपंचमी बीच  कितने  विकारों में रंगो की खूबसूरती चढ़ जाती है। फिर इन्हे उतारने में समय तो लगता ही है। चैत्र के पहले पक्छ में रंगो के साथ विकार भी उतरने लगता है। समय का यह अद्भुत संयोग है।कृष्ण व शुक्ल पक्छ का यह मेल जीवन  में सुख - दुःख  की तरह आता जाता है। समय के चक्र से कौन अपने को बचा सका है।
लहलहाते खेत देख पकृति भी आन्दित है,किसान आन्दित है,पूरा घर अभिलाषा करता है कि फसल अच्छे से पके,पेड़ों का हरापन और बिज का प्राण बचा रहे।  जीव   और जीवन को पोषण देने वाली वसुधा मुस्कुराती रहे।  पर रक्तबीज,महिषासुर ऐसा कंहा होने देना चाहते है वे तो स्वयं की सत्ता स्थापना में सब कुछ तहस -नहस कर देना चाहते है। वसुधा का हरापन छीन लेना चाहते है। मानव-मानव को वे राकछस बना देना चाहते है। रक्तबीज के पास वरदानी शक्ति है। शक्ति हर कोई कंहा संभाल पाता है। फिर शक्ति का अर्जन स्वयं की सत्ता स्थापना के लिए किया गया हो तब भला मर्यादा नैतिकता की उम्मीद कैसे की जा सकती है।  रक्तबीज अपनी शक्ति से वसुधा का प्राणशक्ति मिटा देना चाहता है। परन्तु प्राणशक्ति , वसुधा का आधार है। देवो के देव महादेव यह सब कैसे देख सकते थे,वे शव हो जाते हैं,शिव का ई निकलकर शक्ति-पूंज बन जाता है। ई नौ रूपों में जयन्ती,मंगला,भद्र-काली,कपालिनी,दुर्गा,छमा,शिवा,धात्री,स्वाहा ,स्वधा,वसुधा की प्राणशक्ति और आसुरी शक्ति  के बीच खड़ी  हो जाती है। सूर्य,चन्द्र,ग्रह , नछत्र , जल,वायु,अग्नि,आकाश,पेड़-पौधे,पशु-पकछि,मानव की यात्रा निर्बाध चलती है। यात्रा हमारे जीवन का आधार है। इसमें निरंतरता बनी रहे। सभ्यता,संस्कृति और चिंतन की धाराओं में मनुष्य डुबकी लगाता  रहे। उषा मनुष्य का अभिषेक करती है। भाषा- बोली,खान-पान के भीतर का असली स्वाद प्राणशक्ति की तरह संचारित होता रहे।
खल्लारी,डोंगदगड , मैहर की ओर चलने वाली गाड़ियां खचाखच भर जाती है। नौ दिन भीड़ अनुशासन के वृत्त में गम हो जाता है। भीड़ का यह अनुशासन ही भारत की पहचान है। व्यक्ति के दायरे से बाहर आकर समाज का नया  व्यक्तित्व रचने का यह अद्भुत संयोग नवरात्रि लेकर आता है।
विकास और भौतिकता की आज के इस अंधी दौड़ के बीच भी यदि परकोटे में चिड़िया के लिए पानी व् दाना रखा जाता है,तो इसका मतलब रक्तबीज या महिषासुर नहीं मनुष्य का मनुष्य होने का भाव है। बिटियाँ  रंगोली बनाती है।  माँ चौका पुरती है। लकीरे शुरू होती है,रंगोली सज जाती है,रंगोली की शुरुवात किस लकीर से हुई कोई नहीं बता सकता।  रंग भरते चला जाता है। खूबसूरती धरती में आकृति लेकर मन मस्तिष्क तक समा जाता है। चौक-कलश को आमंत्रण देते हुए  ज्योति प्रज्वलित हो जाती है। जीवन की राह रोशन हो जाती है। रोशनी भ्रम मिटा देता है,भेद मिटा देता है,ज्योति लोगो के भीतर तक प्रकाश बन जाता है।
देवी मंदिरों तक पुरे नौ दिन भीड़ ही भीड़ है। भीड़ में चेहरे गुम है। दोनों हाथ की हथेलिया आपस में स्वतः मिल जाती है , श्रद्धा से सर झुक जाता है। सबके मस्तिष्क में चेतना एक सी हो जाती है। आदमी मैं से बाहर निकल जाता है। हम के भाव जुड़ जाते है। जिस तरह से जड़ , तना , पत्ती पुल मिलकर वृक्छ के रूप में अपनी पहचान बन जाते है वैसे ही श्रद्धा नमन दया धर्म मिलकर व्यक्ति को महामानव बना देता है।
गुलाब को देखकर जीवन के खाद-पानी का अनुभव नहीं किया जा सकता। हमारी दृष्टि गुलाब की सुंदरता और खुशबू  में अटक कर रह जाती है परन्तु मंदिर के भीतर हम गुलाब के खाद-पानी तक की सोचते है। चिड़ियों को उसके घोसले के लिए तिनका मिलता रहे,धान के दाने  में दूध भरता रहे।  समूह मन की प्रार्थना ही हमारे जीवन का आधार है।  छोटे से छोटे जीव मात्र की अस्तित्व को लेकर हमारी  चिंता ही हमारे जीवन के हरेपन का आधार है।
रंगोली से लेकर कलश की स्थापना फिर ज्योति का प्रकाश ही हमारे जीवन में उत्साह बनाए रखता है। लोग अब भी प्रकाश की ओर दौड़ रहे हैं। व्यक्ति ने रौशनी के लिए कितने  शॉर्टकट निकाल लिए है। बल्ब से एल ई डी के सफर में पूरी दुनिया रोशन तो हो गई पर क्या इन सबमे हमारे भीतर का अँधेरा मिट पाया? काले -गोरे ,धर्म-जाति  का अंधकार मिट पाया। पहले स्वयं को रोशन कर सबमे रौशनी भरने का रास्ता हम आज भी नहीं तलाश पाए है। रास्ता सामने है पर हम उस रास्ते   देखना ही नहीं चाहते। ज्योति कलश की स्थापना मनुष्य के भीतर प्रकाश भरने का रास्ता है।

बुधवार, 30 मार्च 2016

मन चंगा तो कठौती में गंगा

मन चंगा तो कठौती में गंगा
कहा गया है- मन चंगा तो कठौती में गंगा। बात बहुत सीधी है। अर्थ गहरा है। स्वास्थ अच्छा है तो सब अच्छा है। सूरज अपने समय पर उग रहा है।  वृक्छ वैसे ही ताजी हवा दे रही है।  गाय अब भी बछड़े को वैसे ही चाटती है।  कुत्ते वैसे ही दम हिलाते अपने मालिक के आगे -पीछे घूमता है।  शाम को अब भी  हवा मदमस्त कर देती है।  चिड़िया घोसले पर लौट आती है। प्रकृति अब भी अपने समय पर अडिग है।  मंदिर-मस्जिद में धर्म-कर्म का भी समय अब भी वैसा ही है।
विकास का हुंकार चहुंओर सुनाई पड़ता है। विकास के तमाम दावों के बाद भी बेहतर स्वास्थ के बिना काम नहीं चल सकता।  कम से कम मानव जीवन का तो अच्छे स्वास्थ के बिना सब कुछ बेमानी है।  अच्छा स्वास्थ केवल लम्बी उम्र जीने भर का माध्यम नहीं है। स्वास्थ मन मस्तिष्क में अच्छे विचार का भी घोतक है। अच्छे स्वास्थ का मतलब समृद्धि और खुशहाली है।  अच्छा स्वास्थ  यूँ ही नहीं बना रहता , इसके लिए संयमित जीवन और खान - पान में नियंत्रण जरुरी है।  जिस तरह से बादल का जमना,बरसना,मिटना धरती पर कई कई जन्मोत्सव का उद्गम है,वैसा ही स्वास्थ  अच्छा हमारी खुशहाली और विकास का जनक है।
यह बात उतनी ही सच है जितना जीवन में पानी की आवश्य्कता।  स्वास्थ और मन का बड़ा अद्भुत रिश्ता है।  इसके आपसी रिश्ते बहुत ही मुलायम और पुराने है।  परन्तु इस रिश्ते को हमने अपनी सुख-सुविधा की खातिर कुरेदना शुरू क्र दिया।  हवा में जहर तो घोला ही वृक्छो की बलि चढ़ाकर स्वयं के लिए कांक्रीट का जंगल लगाना शुरू क्र दिया।  तजि हवा के लिए बनी खिड़कियों पर एयरकंडीशन तो लगाया ही,कहना नाश्ता बनने को झंझट मान फ़ास्ट फ़ूड या रेडी टू ईट पर हमारी निर्भरता बढ़ते चली गई।
इसका सीधा असर हमारे स्वास्थ  पर दीखता है।  हर आदमी परेशान सा है।  हर चौथे पांचवे आदमी को शक्कर की बीमारी और हर दसवें आदमी को दमा -खांसी , एलर्जी और पता नहीं रोज नई नई बीमारियां होने लगी है।  आये दिन ख़बरें छप रही है।  विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे है।  यही हल रहा तो शहरी जीवन तबाह हो जायेगा।  नर्क बन जायेगा। शहरों से पेड़ों के डेरे उजड़ गए है।  एक जमाना था आदमी पौधों को आकांछाओं की तरह रोपता था, बेटो बेटी की तरह पलटा था।  पेड़ों में सावन के झूले बंधते थे , पेड़ों के नीचे खड़े होकर दो आँखे अपनों की बाट जोहता था।  पेड़ों के नीचे स्कूल लगते थे।  कथा होती थी।  पेड़ों के नीचे बैठकर गौतम बुद्ध हो गए महावीर हो गए।
सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था।  परन्तु अपने सुख-सुविधा की खातिर आदमी इतना स्वार्थी हो गया कि उसने पनि हवा में जहर घोलना शुरू कर  दिया।  हवा के व्यवहार को विकास के अंधानुकरण ने बदल दिया।  हवा में ऐसा रूखापन देखकर भी कोई भयभीत नहीं है तो फिर उसका भगवान ही मालिक है।
चार मंजिला भवन है।  सैकड़ों मरीज है।  व्यवस्था में लाइन लम्बी होते जा रही है।  जेब में पैसों की थैली समाये नहीं जा रही है।  पत्नी चिंतित है,बच्चे बिलख रहे है,और जिंदगी किरच किरच के चल रही है।  भवन की दीवारें शिलालेख नहीं है परन्तु माथे की परेशानी बता रही है कि कुछ भी अच्छा नहीं है।  अपनों को देखने वालों की भीड़ लगातार बढ़ रही है।  श्मशान की चित लगातार धधक रही है।  कब्रिस्तान में जगह कम पड़ने लगी है।  और हम अब भी पेड़ों की बलि लेने आमदा है।  खेती की जमीनों पर सीमेंट का प्लास्टर चढ़ाने तत्पर हैं।  अपने घरों की खिड़कियां खोलने तैयार नहीं है।
स्वास्थ इस युग का चिंतन और आवशयकता है।  आजादी के बाद न जाने कितनी सुबह आयी।  योजनाओं की रौशनी जलायी गयी।  एयरकंडीशन में बैठकर आदमी की बेहतरी की योजनाएं बनाई गई।  सबको शिक्छा सबको स्वास्थ के नारे बुलंद किये गये। परन्तु परिणाम और उपलब्धियों का कंही मेल ही नहीं हुआ।  अस्पताल में बेहतर ईलाज की कोशिश तो हुई परन्तु बीमार बनाने का उपक्रम भी तेज गति से चला।  आदमी अपने को खड़ा करने के फेर में   ऐसा  उलझने लगा कि कब उसके पैर से जमीन खिसक गई ,पता ही नहीं चला।  शहरी उद्यानों में सुबह शाम भीड़ तो बढ़ने लगी पर यंहा मनोरंजन की बजाय बीमार ज्यादा आने लगे। बच्चों की किलकारी कहीं गम होने लगी।  उद्यानों में चहल पहल तो बढ़ी पर इस कोने से उस कोने तक भागने वालों की तादात  ही ज्यादा होती है।  व्यक्ति स्वास्थ के महत्व को नहीं नकार सकता।  तन अच्छा तो मन अच्छा और मन अच्छा तो सब अच्छा के दर्शन को लेकर चलना ही होगा।
अब मुद्दा स्वस्थ रहने का है।  और जब तक विकास को स्वास्थ  से नहीं जोड़ा जायेगा तब तक न अस्पतालों की भीड़ ही कम होगी और न ही उद्यानों में भागमभाग ही कम होगी।  स्वास्थ की बेहतरी के लिए खेती की जमीनों को बचाना ही होगा।  पौधे रोपने ही होंगे।  उद्योगों में प्रदुषण नियंत्रण यंत्र लगने कड़े नियम बनाने होंगे। नाली के पानी को नदियों में गिरने से पहले साफ करना होगा।  समाज सेवी सस्थाएं दवाई , फल,बांटकर खुश हो लेती है।  युवा पीढ़ी शिक्छा की चादर ओढ़ कर मस्त है।  हम समझ लेते है कि स्वास्थ की सारी जिम्मेदारी सरकार की है।  परन्तु भागदौड़ की जिंदगी के बीच सिर्फ स्वयं की खुशहाली की सोच से आगे निकलना होगा। विकास की योजनाओं पर जन भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।  तभी मन चंगा तो कठौती में गंगा का उद्देश्य सफल हो पाएगा।