ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेसियों ने तिरंगे का अपमान पहली बार किया हो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मेहतर लाल साहू ने निधन पर भी इसी तरह का कृत्य किया गया था। तब पुलिस ने तत्परता दिखलाकर जुर्म दर्ज भी किया था। लेकिन इस बार प्रशासन ने कोई रूचि नहीं दिखाई उल्टे जब शहर के पुलिस कप्तान ही यह कहने लगे हो कि शिकायत मिलेगी तभी जुर्म दर्ज होगा। शर्मनाक और हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? पुलिस की दोगलाई पहली बार उजागर नहीं हुई है। इससे पहले शहर के नामी हीरा ग्रुप के दीपावली में बांटे कार्पोरेट गिफ्ट में तो देश का नक्शा ही त्रुटिपूर्ण था तब भी शासन की ओर से कोई पहल नहीं हुई। धन बल और कुर्सी बल के आगे किस तरह से छत्तीसगढ़ का शासन बेबस है यह इस दो उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। ताजा मामला तो स्वामी भक्ति की पराकाष्ठा है। ऐसा नहीं है कि स्वामी भक्ति का उदाहरण सिर्फ कांग्रेस में ही है। भाजपा में भी स्वामी भक्ति दिखाने वालों की कमी नहीं है। राजनीतिक सुचिता, सादगी की वकालत करने वाले भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी के पुत्र की शादी का आयोजन लोकतंत्र में किस तरह से स्वीकार योग्य है यह तो भाजपा ही जाने लेकिन छत्तीसगढ़ की सरकार में बड़े-बड़े ओहदे में बैठे लोगों ने इस विवाह समारोह में जो स्वामी भक्ति दिखाई वह आम लोगों में शर्मनाक ढंग से चर्चा में है।
दरअसल सत्ता और धन ने राजनैति· दलों से जुड़े लोगों को इस हद तक पागल कर दिया है कि उनके लिए नैतिकता छूत हो गई है। विवादों में रहना उनके लिए शगल है और हर हाल में मीडिया में बने रहने की भूख ने अच्छे-बुरे का लिहाज ही छोड़ दिया है। प्रशासन भी इस हद तक अपनी जमीर बेचने में लगा है जैसे उसके लिए नौकरी ही सब कुछ है लेकिन जो लोग इसकी परवाह नहीं करते वे समझ लें कि इस देश के लोगों ने देर से ही सही लालू-पासवान या मुलायम-वीसी शुक्ल या अजीत जोगी तक को असहाय कर दिया है। नैतिकता अब भी है और इसकी परवाह नहीं करने वालों को धूल में मिलना ही होता है।