
छत्तीसगढ ही नहीं पूरा देश बस्तर में जवानों की मौत से स्तब्ध है। कांग्रेस और भाजपा नक्सली समस्या को लेकर एक दूसरे का मुंह नोच रहे हैं और आम आदमी तमाशाबीन है। वह जानना चाहता है कि आखिर यह सब क्यों हो रहा है। सरकार क्या कर रही है। उसे इस बात से भी मतलब नहीं है कि नक्सली समस्या का मामला केन्द्र का है या राज्य का। पिछले 6 सालों से डा. रमन सिंह मुख्यमंत्री है और उन्होंने इस समस्या को हल करने क्या कदम उठाये हैं।
राजनैतिक बयानबाजी या गलतियां एक दूसरे पर थोपने की राजनीति से आम लोगों को कोई लेना देना नहीं है। हर बार शहीद होते जवानों के लिए मोमबत्तियां जलाने का सिलसिला कब खत्म होगा। क्या सलवा जुडूम ही इस समस्या से छुटकारे का उपाय है नहीं तो फिर सरकार ने इसे प्रश्रय क्यों दिया। जवानों की बलि और आदिवासियों को भेड़ बकरी की तरह काटे जाने का यह सिलसिला चलता रहेगा। यदि पिछली कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों को नहीं छेड़ने की गलती की है तो फिर 6 सालों में भाजपा शासनकाल ने क्या किया। क्या यह सच नहीं है कि छत्तीसगढ में नक्सलियों ने समनान्तर सरकार चला रखी है जहां सिर्फ उनका कानून चलता है और आदिवासी भेड़ बकरी की तरह कभी पुलिस तो कभी नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं।
यदि नक्सलियों से भिड़ने केन्द्र सरकार सुविधाएं नहीं दे रही है तब राज्य सरकार क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रह सकती है। मंत्रियों और अधिकारियों पर हो रहे खर्चों में कटौती कर धन का उपयोग नक्सली समस्या को दूर करने में लगाने की बजाय 18 हजार रुपए वेतन बढ़ाने वाली सरकार के पास इस बात का जवाब है कि सुविधा के नाम पर वह केन्द्र को ही क्यों कोसते रही है। छत्तीसगढ में कानून व्यवस्था की स्थिति किसी से छिपी नहीं है और न ही भ्रष्टाचार ही किसी से छिपा है दोषारोपण की लड़ाई में माहिर लोग यह समझ लें कि यह समस्या अब विकराल रुप धारण कर चुका है इसके लिए बाकी निर्माण कार्य रोक कर भी लड़ाई लड़ी जा सकती है।
हर बात के लिए मीडिया पर दोषारोपण करने वाले डा. रमन सिंह ने पत्रकार विनोद दुआ के सवाल पर चुप्पी साध ली तो इसका मतलब साफ है कि कानून व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ चुकी है। खुद डा. रमन सिंह के जिले के कलेक्टर को दलाल और एसपी को निकम्मा कहने वाले गृहमंत्री ने विधानसभा में यह बात स्वीकारा है कि थाने वाले दारू वालों की बात ज्यादा सुनते हैं उनकी नहीं। इस स्वीकारोक्ति के बाद भी कोई मुख्यमंत्री यह कहे कि प्रदेश की कानून व्यवस्था नियंत्रण में है तो आम लोग इसे मजाक ही समझेंगे। मुख्यमंत्री अपने दावे में यह कहते नहीं थकते कि उन्होंने दंतेवाड़ा से लेकर सुदूर बस्तर में पचासों सभा ली है और कभी कुछ नहीं हुआ। लेकिन यह कहते हुए वे भूल जाते हैं कि ऐसी सभाओं की तैयारी हफ्ते भर पहले से होती है और वे सुरक्षा जवानों से घिरे भाषण देते हैं। शायद इसलिए विनोद दुआ ने उन्हें बीच में रोक दिया और पूछा था आप महात्मा गांधी नहीं हो जो अत्याचारी अंग्रेजों के सामने लाठी टेककर पहुंच जाते थे।
बस्तर में गांव के गांव उजड़ रहे हैं लोग शिविर में रहने मजबूर है इसके बाद भी हर शहादत के बाद यह कहा जाना कि अब मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा मजाक नहीं तो और क्या है।
कुछ सवाल सीधे मुख्यमंत्री से-
0 छत्तीसगढ क़ो नक्सलियों से मुक्त करने कब और कैसे लड़ाई की जाएगी।
0 क्या केन्द्र पैसा नहीं देगा तो वे पैसे का इंतजाम कैसे करेंगे।
0 सरकारी सुविधाओं में कब तक विस्तार कर अपनी जेबें गरम की जाती रहेगी।
0 नई राजधानी किसके लिए बनाई जा रही है।
0 मीडिया में छापी जा रही भ्रष्टाचार की खबरों पर वे क्या करते हैं।
0 भ्रष्ट नेताओं को मंत्रिमंडल से कबर हटायेंगे।
0 भ्रष्ट अधिकारियों की छुट्टी कब होगी।इसके अलावा भी कई सवाल है जो समय-समय पर सीधे मुख्यमंत्री से पूछे जाएंगे चाहे मुख्यमंत्री कोई भी हो?
राजनैतिक बयानबाजी या गलतियां एक दूसरे पर थोपने की राजनीति से आम लोगों को कोई लेना देना नहीं है। हर बार शहीद होते जवानों के लिए मोमबत्तियां जलाने का सिलसिला कब खत्म होगा। क्या सलवा जुडूम ही इस समस्या से छुटकारे का उपाय है नहीं तो फिर सरकार ने इसे प्रश्रय क्यों दिया। जवानों की बलि और आदिवासियों को भेड़ बकरी की तरह काटे जाने का यह सिलसिला चलता रहेगा। यदि पिछली कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों को नहीं छेड़ने की गलती की है तो फिर 6 सालों में भाजपा शासनकाल ने क्या किया। क्या यह सच नहीं है कि छत्तीसगढ में नक्सलियों ने समनान्तर सरकार चला रखी है जहां सिर्फ उनका कानून चलता है और आदिवासी भेड़ बकरी की तरह कभी पुलिस तो कभी नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं।
यदि नक्सलियों से भिड़ने केन्द्र सरकार सुविधाएं नहीं दे रही है तब राज्य सरकार क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रह सकती है। मंत्रियों और अधिकारियों पर हो रहे खर्चों में कटौती कर धन का उपयोग नक्सली समस्या को दूर करने में लगाने की बजाय 18 हजार रुपए वेतन बढ़ाने वाली सरकार के पास इस बात का जवाब है कि सुविधा के नाम पर वह केन्द्र को ही क्यों कोसते रही है। छत्तीसगढ में कानून व्यवस्था की स्थिति किसी से छिपी नहीं है और न ही भ्रष्टाचार ही किसी से छिपा है दोषारोपण की लड़ाई में माहिर लोग यह समझ लें कि यह समस्या अब विकराल रुप धारण कर चुका है इसके लिए बाकी निर्माण कार्य रोक कर भी लड़ाई लड़ी जा सकती है।
हर बात के लिए मीडिया पर दोषारोपण करने वाले डा. रमन सिंह ने पत्रकार विनोद दुआ के सवाल पर चुप्पी साध ली तो इसका मतलब साफ है कि कानून व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ चुकी है। खुद डा. रमन सिंह के जिले के कलेक्टर को दलाल और एसपी को निकम्मा कहने वाले गृहमंत्री ने विधानसभा में यह बात स्वीकारा है कि थाने वाले दारू वालों की बात ज्यादा सुनते हैं उनकी नहीं। इस स्वीकारोक्ति के बाद भी कोई मुख्यमंत्री यह कहे कि प्रदेश की कानून व्यवस्था नियंत्रण में है तो आम लोग इसे मजाक ही समझेंगे। मुख्यमंत्री अपने दावे में यह कहते नहीं थकते कि उन्होंने दंतेवाड़ा से लेकर सुदूर बस्तर में पचासों सभा ली है और कभी कुछ नहीं हुआ। लेकिन यह कहते हुए वे भूल जाते हैं कि ऐसी सभाओं की तैयारी हफ्ते भर पहले से होती है और वे सुरक्षा जवानों से घिरे भाषण देते हैं। शायद इसलिए विनोद दुआ ने उन्हें बीच में रोक दिया और पूछा था आप महात्मा गांधी नहीं हो जो अत्याचारी अंग्रेजों के सामने लाठी टेककर पहुंच जाते थे।
बस्तर में गांव के गांव उजड़ रहे हैं लोग शिविर में रहने मजबूर है इसके बाद भी हर शहादत के बाद यह कहा जाना कि अब मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा मजाक नहीं तो और क्या है।
कुछ सवाल सीधे मुख्यमंत्री से-
0 छत्तीसगढ क़ो नक्सलियों से मुक्त करने कब और कैसे लड़ाई की जाएगी।
0 क्या केन्द्र पैसा नहीं देगा तो वे पैसे का इंतजाम कैसे करेंगे।
0 सरकारी सुविधाओं में कब तक विस्तार कर अपनी जेबें गरम की जाती रहेगी।
0 नई राजधानी किसके लिए बनाई जा रही है।
0 मीडिया में छापी जा रही भ्रष्टाचार की खबरों पर वे क्या करते हैं।
0 भ्रष्ट नेताओं को मंत्रिमंडल से कबर हटायेंगे।
0 भ्रष्ट अधिकारियों की छुट्टी कब होगी।इसके अलावा भी कई सवाल है जो समय-समय पर सीधे मुख्यमंत्री से पूछे जाएंगे चाहे मुख्यमंत्री कोई भी हो?