गुरुवार, 31 मई 2012

आदिवासी वोट बैंक...



छत्तीसगढ़ में इन दिनों राजनैतिक दलों  2013 में होने वाली विधानसभा के लिए तैयारी शुरू कर दी है। छत्तीसगढ़ के 90 विधानसभा में से 35 विधानसभा आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है और कांग्रेस-भाजपा ही नहीं नवगठित स्वाभिमान मंच की नजर भी इन 35 सीटों पर है। ये सीटें ही छत्तीसगढ़ में सत्ता तय करती है। पिछले दो चुनावों में आदिवासियों ने भाजपा पर भरोसा किया था।
आजादी के 6-7 दशक बाद भी आदिवासियों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। इन्हें वोट बैंक ही समझा गया। विकास के नाम पर लालीपॉप थमाया गया और इसका दुष्परिणाम यह है कि आदिवासी ईलाका नक्सलियों का गढ़ बन गया है। पिछले दो चुनावों में आदिवासियों की बदौलत सत्ता हासिल करने वाली डॉ रमन सिंह की सरकार ने भी सात-आठ सालों में कुछ खास नहीं किया। योजनाएं तो बनी लेकिन मूलभूत जरूरतों को नजर अंदाज किया गया। यही वजह है कि आदिवासी क्षेत्रों में लोग ईलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। पीने तक का साफ पानी नहीं मिलने से यहां स्वास्थ्य पर भी बुरा असर हुआ है और शिक्षा के नाम पर केवल ढकोसला किया गया। मौलिक अधिकार से वंचित आदिवासियों के सामने सबसे दिक्कत यह है कि वे किनका भरोसा करें।
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की स्थिति तो और भी खराब है। नक्सलियों और पुलिस के बीच उनका जीना दूभर हो गया है। इधर कुआं उधर खाई की स्थिति से वे उबर ही नहीं पा रहे हैं। पांच सौ से अधिक गांव उजड़ गए और राहत शिविर में उन्हें रहना पड़ रहा है।
भाजपा 3 जून से आदिवासी क्षेत्रों में सम्मेलन बुला रही है और इन सम्मेलनों को मुख्यमंत्री रमन सिंह भी संबोधित करेंगे। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए है अपनी मांगो को लेकर आने वाले आदिवासियों की राजधानी में जमकर पिटाई हुई है। ऐसे में भाजपा को डर है कि आदिवासी वोट यदि खिसक गया तो उनकी सरकार बननी मुश्किल हो जायेगी। इसलिए दुबारा सत्ता हासिल करने आदिवासी क्षेत्रों में सम्मेलन बुलाए जा रहे हैं। लेकिन जिस तरह से आदिवासी क्षेत्रों से खबर आ रही है वह भाजपा के लिए ठीक नहीं है। अपनी पिटाई को आदिवासी अब तक भूले नहीं है और उनकी नाराजगी सम्मेलनों में भी दिख सकती है ऐसे में सरकार को इस बात के लिए पहले से तैयार रहना होगा। सिर्फ वोट के लिए राजनीति व सम्मेलन उचित नहीं है।

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