मंगलवार, 18 मई 2010

नक्सली नहीं ये आतंकवादी है सेना ही एकमात्र विकल्प

6 माह के बाद फिर बैठे सरकार
छत्तीसगढ़ में 50 हजार से अधिक लोग शिविर में रह रहे हैं। आम लोगों को भेड़ बकरियों की तरह काटे जा रहे हैं लगभग पांच सौ गांव उजड़ गए और इसके बाद भी नक्सलियों को आतंकवादी नहीं कहना राजनेताओं की भयंकर भूल है। अब तो इन आतंकवादियों के खिलाफ सेना ही विकल्प है और इस देश हित के लिए रमन सरकार को 6 माह के लिए हट जाना चाहिए ताकि केन्द्र सरकार राष्ट्रपति शासन लागू कर इन आतंकवादियों कि नेस्तनाबूत कर सके इसके बाद पुन: रमन सरकार को गद्दी सौंप दें।
यह कहना है आम लोगों का। बुलंद छत्तीसगढ़ द्वारा पूरे प्रदेश में कराए गए इस सर्वे के नतीजे स्पष्ट है कि आम लोग क्या चाहते हैं। पूरे प्रदेश में लगभग 17 हजार लोगों से हुई बातचीत में यह बात तो सामने आई ही साथ ही लोगों में इस मामले में की जा रही राजनीति को लेकर बेहद गुस्सा है और वे इस काम में जितनी जल्दी हो सके सैनिक कार्रवाई चाहते हैं।
पिछले 5 साल में जिस पैमाने पर पुलिस कर्मी मारे गए है वह साबित करता है कि अगर सरकार ने इस मामले की गंभीरता को कार्यरुप में नहीं बदला तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह होगी और यदि शहरी क्षेत्रों तक इन कथित नक्सलियों की पहुंच हो गई तो स्थिति की भयावकता का अंदाजा लगाना मुश्किल है।
जल संसाधन जमीन जैसे प्रभावी नारे को लेकर नक्सलवाड़ी से शुरु हुए आंदोलन आज की स्थिति में विशुध्द रुप से आतंकवाद का रुप ले चुकी है। जिसका मुकाबला करने में राय सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है और जब कोई राय सरकार ऐेसे मामले में फेल हो जाए तो उसे बने रहने का अधिकार किस तरह से है यह समझ से परे है। इस तरह के विचार के बीच बस्तर-सरगुजा, नांदगांव जैसे जिलों के लोगों ने तो सरकार तक भंग कर सैनिकों को उतारने की पहल की है।
नक्सली नहीं आतंकवाद हैं !
बुलंद छत्तीसगढ़ के द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में मुख्यत: दस सवाल पूछे गए थे जिनमें 99 प्रतिशत लोगों ने नक्सली आंदोलन को आंदोलन मानने से ही इंकार कर दिया। उनका कहना था कि ये नक्सली नहीं हैं बल्कि नक्सली की आड़ में आतंकवादी हैं जिनका एक मात्र उद्देश्य खून करना और पैसा इकट्ठा करना है।
बातचीत नहीं कार्रवाई हो
इसी तरह हमारा दूसरा सवाल था कि क्या इनसे बात की जानी चाहिए इस पर भी आम लोगों की तीखी प्रतिक्रिया थी उनका मानना है कि बंदूक पकड़कर बातें नहीं की जा सकती। बातचीत में समय नहीं गंवाना चाहिए बल्कि सीधी कार्रवाई की जरूरत है।
सकरार पूरी तरह फेल
जिस प्रदेश में साढ़े पांच सौ गांव उजड़ गए हो और पचास हजार से अधिक लोग शिविरों में रहने मजबूरर हो और आए दिन कत्लेआम मचा हो वहां की सरकार को सक्षम मानना सबसे बड़ी भूल होगी। सरकार भले ही दावा करता रहे लेकिन आंकड़े झूठ नहीं बोलते। कई लोगों ने तो यहां तक कहा कि यदि डॉ. रमन सिंह सरकार इस प्रदेश के हिंचचिंतक हैं तो वे स्वयं आगे आकर 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन की पहल कर सेना की मांग करे और फिर इस समस्या के हल होते ही पुन: सत्ता में बैठ जाए।
राजनीति न हो...
इस मामले में राजनीति से आम लोग बेहद दुखी हैं उनका कहना है कि हर हादसे के बाद कांग्रेसी-भाजपाई राजनीति करते नहीं थकते। गड़े मुर्दे उखाड़ने की बजाय आतंक के खिलाफ सभी जुट जाए।
आतंकवादी कार्रवाई को
कायरना कहना गलत
सर्वे में कथित नक्सलियों द्वारा सीआरपीएफ या पुलिस पर हमले को कायरना कहने पर भी लोगों को आपत्ति है और इसे अपनी कमजोरी छुपाने का बयान माना जा रहा है। लोगों का कहना है कि हर हादसे के बाद सत्ता दल घटना को कायरना करार देते हैं जबकि वे दमदारी से हत्या पर हत्या कर आतंक मचा रहे हैं और सरकार कायर की तरह सिर्फ बयानबाजी कर रही है।
इसी तरह सर्वे में आदिवासियों की परम्परा, खान-पान, रहन-सहन को लेकर भी सवाल पूछे गए और ऐसे सवालों पर लोगों ने उनकी बेहतर जिन्दगी के लिए उपाय करने की बात कही। शिविर की बजाय गांव बसाने की वकालत की गई। सड़कों का जाल के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी की वकालत की गई।

2 टिप्‍पणियां:

  1. राज्‍य और केन्‍द्र शासन में वैचारिक मतैक्‍य व इच्‍छा शक्ति जब तक नही होगी बेकसूर मरते रहेंगें.

    सामयिक लेखन के लिए धन्‍यवाद कौशल भाई.

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  2. तिवारी जी
    लोकतंत्र में सेना का इस्तेमाल सबसे अंतिम विकल्प होना चाहिये हम पहले ही कई राज्य सेना के हवाले किये बैठे है ! कल को शेष राज्य भी करना पड़े तो ?
    मूल कारणों को मिटाये बिना सारे उपचार अस्थाई साबित हुआ करते हैं !

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