सोमवार, 9 अप्रैल 2012

फिर निलंबन क्यों किया...


छत्तीसगढ़ सरकार ने राजस्व मंगल में हुए घपलेबाजी के लिए दोषी मानते हुए आईएएस राधाकृष्णन् को निलंबित किया था ओर पांच महीने बाद ही इस अधिकारी का निलंबन समाप्त कर दिया। इस आईएएस अधिकारी को सरकार ने जिस वजह से निलंबित कर रखा था वह स्थिति अभी भी वैसे की वैसी है। घपलेबाजी में सिर से पांव तक डूबी सरकार के पास किसी भी बात का जवाब नहीं है। बगैर कार्रवाई के अधिकारी मजे से काम कर रहे हैं।
दरअसल सरकार ने अपनी यह नीति बना रखी है कि घपलेबाजी में नाम कमाओं महत्वपूर्ण पद पाओं। राजस्व मंडल के जिस घोटाले के लिए आईएएस राधाकृष्णन् को निलंबित किया गया था वह  मामला बेहद गंभीर है। आदिवासियों की जमीन को बेचे जाने के इस मामले पर जब हल्ला हुआ तो आईएएस राधाकृष्णन् को निलंबित कर दिया गया और जब माहौल शांत हो गया तो निलंबन वापस।
सरकार का यह खेल आश्चर्यजनक ही नहीं दुर्भाग्यजनक है। जांच के नाम  पर कभी वह अधिकारियों को बचा ले जाता है तो कभी ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया जाता है। विवादास्पद अधिकारियों की फेहरिश्त लंबी होते जा रही है और सरकार कार्रवाई की बजाय लीपापोती में मशगुल है। रोगदा बांध के आरोपी जाय आम्मेन का मामला हो या मनोज डे से लेकर बाबूलाल अग्रवाल का मामला हो। बगैर जांच रिपोर्ट के महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से नवाजा जाना कितना उचित है और इसका क्या अर्थ लगाया जायेगा इससे सरकार को कोई मतलब नहीं है।
छत्तीसगढ़ में जमीनों के घोटाले की स्थिति गंभीर है। उद्योगों से लेकर बिल्डर जमीन हडऩे में लगे हैं ऐसे में सरकार को इस पर गंभीरता से कार्रवाई करनी चाहिए। अदिवासियों की जमीन हस्तांतरण का मामला तो और भी गंभीर है। भोले-भाले आदिवासियों से कौडिय़ों के मोल जमीन खरीदकर लूटने का सिलसिला थम नहीं रहा है और उपर से सरकार कार्रवाई की बजाय आरोपियों को संरक्षण देने में लगी है।
आईएएस अधिकारी के निलंबन समाप्ति से कई सवाल खड़े हो गये हैं। कि आखिर सरकार को निलंबन समाप्त करने की इतनी हड़बड़ी क्यों है? जबकि अभी तक इस मामले में पूरी तरह से न जांच हुई न कार्रवाई। बाबूलाल अग्रवाल का निलंबन भी ऐसे ही हड़बड़ी में किया गया था।

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