रविवार, 18 अप्रैल 2010

शहादत पर राजनीति

प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह ने बस्तर की घटना पर सीधे सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर प्रहार कर यह बताने की कोशिश की है कि नक्सलियों की शहादत से उन्हें कोई लेना देना नहीं है। इस पर कांग्रेस से केवल पूर्व मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने ही प्रतिक्रिया व्यक्त की जबकि लग रहा था कि डॉ. रमन सिंह के इस बयान से कांग्रेसी तिलमिला जाएंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ तो इसके पीछे कांग्रेस नेताओं का बिक जाने की चर्चा है। शहादत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए लेकिन छत्तीसगढ में राय बनने के बाद कांग्रेस और भाजपा में राजनीतिक फायदे की लड़ाई लड़ी जाती है उन्हें इस बात से कतई कोई मतलब नहीं है कि यहां कोई क्या कर रहा है।
यही वजह है कि जोगी शासन काल में असली मुद्दों को छोड़ भाजपा ने जोगी के घोटाले की बारात तो निकाली लेकिन सत्ता में आते ही कुछ नहीं किया। नई राजधानी का विरोध तो किया लेकिन सत्ता में आते ही राजधानी बनाने में लग गए। कांग्रेस भी यहां जो कुछ कर रही है वह सिर्फ अपने राजनैतिक लाभ के लिए कर रही है। क्या कांग्रेसी सिर्फ इसलिए डॉ. रमन के खिलाफ कुछ नहीं कहते क्योंकि वे नाराज हो जाएंगे यदि यह आम चर्चा सच है तो मिल बैठकर लुटने की ऐसी अंधेरगर्दी कहीं नहीं हो सकती। प्रदेश के कांग्रेसी इन दिनों डॉ. रमन सरकार को बर्खास्त करने की मांग पर अड़ी हुई है वह भी तब जब बस्तर नरसंहार के बाद उनके केन्द्रीय गृहमंत्री ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है। कांग्रेस तब क्यों खामोश रही जब डॉ. रमन सरकार बाल्को हादसे पर वेदांता के अनिल अग्रवाल को बचा रही थी या कमलेश्वर अग्रवाल और डॉ. खेमका को मंडी समिति की जमीन कौड़ी के मोल दे रही थी या पुष्प स्टील को खदान दे रही थी या गृहमंत्री ननकीराम कंवर का कानून व्यवस्था पर दलाल-निकम्मा का तोहमत लगा रहे थे। दो-दो मंत्री के रहते राजधानी में लगातार बिगड़ती कानून व्यवस्था पर कांग्रेसी चुप क्यों रहते हैं। पर्यटन में करोड़ों अरबों के घपले और पीडब्ल्यूडी मंत्री पर कमीशनखोरी की चर्चा हो या मंडी कर्मचारी के आत्महत्या का मामला हो। यह सच है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति दयनीय है। राजधानी में अपराध के ग्राफ बढ़े हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों की मनमानी ने आम लोगों का जीना दूभर कर दिया है।
सचिव से लेकर मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं। संविदा नियुक्ति के नाम पर नेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदारों को ढूंसा जा रहा है। तब भी कांग्रेसियों ने मुद्दा नहीं बनाया तब भला बस्तर नरसंहार को लेकर वह किस मुंह से डा. रमन के बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं। इस मांग पर डा. रमन को भी सोनिया- राहुल का नाम नहीं घसीटना चाहिए लेकिन वे जानते हैं कि उनकी कोप से कांग्रेसी घबराते हैं इसलिए वे कुछ नहीं कहेंगे। वास्तव में बस्तर में जो कुछ हुआ उसके बाद राजनीति नहीं होनी चाहिए।

1 टिप्पणी:

  1. व्यवस्था की कमियों का खामियाजा सदैव आम आदमी भुगतता है।
    जिनको राजनीति करनी है, वे तो कर ही रहे हैं। बाकी की अपनी-अपनी रोजी-रोटी है।
    अच्छा लेख है। बधाई।

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