बुधवार, 14 जुलाई 2010

रामकृष्ण मठ का यह कैसा खेल सत्ताधीशों से बढ़ाओ मेल


पद की चापलूसी या पैसे का लालच
यह राजनीति की गंदी तस्वीर है या मठाधीशों का कुत्सित चेहरा। यह तो जनता ही तय करेगी। लेकिन अब तक निर्विवाद रहे रामकृष्ण मठ के नागपुर मठ ने ऐसा कुछ कर दिया है जिससे मठ के क्रियाकलापों पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है और इसे लेकर मठ के प्रति श्रध्दा व उनके कार्यों पर नमन करने वालों के दिलों पर ठेंस पहुंची है। दरअसल मठ ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के माता-पिता की तस्वीर 'विवेकानंद राष्ट्र को आह्वान' नामक किताब पर छाप दी है।
धर्मग्रंथों के अपमान और हिन्दूत्व की रक्षा के नाम पर इस देश में जिस तरह का बवाल मचा है। वह अंयंत्र कहीं नहीं है। हिन्दूत्व की परिभाषा सब अपने-अपने ढंग से देने लगे हैं और धर्म का दुरूपयोग भी अपने स्वार्थ के लिए करने लगे हैं। इस देश में हिन्दुत्व की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी हो या शिवसेना सभी ने धर्म को अपने हिसाब से परिभाषित करने की कोशिश की है।
'समरथ को नहीं दोष गोसाई' की तर्ज पर चाहे वह किसी भी धर्म के हो पैसे व पद वालों ने धर्म का सबसे यादा अपमान किया है। यहां तक कि विभिन्न सरकारों ने भी अपने हिसाब से इसका दुरूपयोग किया। इस सबके बावजूद इस देश में अभी भी ऐसा संस्थाएं है जो राष्ट्र निर्माण की दिशा में धर्म क्षेत्र में काम कर रही हैं उनमें से एक है रामकृष्ण मठ या रामकृष्ण मिशन। शुध्द रुप से राष्ट्रीय निर्माण में लगे इस संस्था के खिलाफ आज तक किसी ने भी उंगली उठाने की हिम्मत इसलिए नहीं कि क्योंकि इस मठ या मिशन ने नि:स्वार्थ रूप से राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
लेकिन लगता है पैसे व राजनीति ने इस संस्था को भी उसी राह पर खड़ा कर दिया है जो सिर्फ धर्म की आड़ में नाम पैसा सबकुछ बना लेना चाहता है। ऐसा ही मामला सामने आया है जो रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा माई और विवेकानंद के आदर्शों को चाक-चाक करने वाला है। रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित विवेकानंद राष्ट्र को आह्वान शीर्षक वाली इस किताब के जैसे ही पन्ने पलटे जाएंगे स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह और आखरी पृष्ठ पर स्व. श्रीमती सुधा देवी सिंह की तस्वीर छापी गई है। 12 रुपए कीमत वाली इस किताब को बकायदा बेची भी जा रही है।
रामकृष्ण मठ नागपुर द्वारा किस तरह की पुस्तक बेची जानी है यह तो मठ को तय करना है और वह इसके लिए स्वतंत्र भी है। लेकिन सवाल यह है कि मठ के द्वारा सिर्फ इसी तस्वीर वाली किताबें क्यों बेची जा रही है? इसके पीछे उनका उद्देश्य क्या है? सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि जो तस्वीरें छपी हैं वे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के माता-पिता की है। ऐसे में मठ पर यह आरोप लगना स्वाभाविक है कि मठ के द्वारा अनाप-शनाप पैसा लेकर लोगों के दिलों में बैठे मठ के प्रति विश्वास को भुनाना है या सत्ता प्रमुख को खुश करना है।
इस संबंध में जब हमने रायपुर स्थित विवेकानंद आश्रम से संपर्क किया तो वे कुछ भी कहने से बचते रहे वहीें नागपुर मठ के पदाधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका। बहरहाल रामकृष्ण मठ नागपुर के इस कारनामें का असली मकसद तो पदाधिकारी ही जाने लेकिन उनके इस कृत्य ने रामकृष्ण संस्थान पर श्रध्दा रखने वालों के दिलों में न केवल ठेस पहुंचाई है बल्कि यह सवाल भी खड़े किए है कि यहां बैठे पदाधिकारी क्या करने वाले हैं जिसका जवाब देर सबेर उन्हें देना ही होगा।
इसी किताब का अंश
जिसकी अवहेलना हुई
'ऊंचे पद वालों यया धानिकों पर भरोसा न करना। उनमें जीवनी शक्ति नहीं है वे तो जीते हुए मुर्दे के समान है। भरोसा तुम लोगों पर है, गरीब, पद मर्यादा रहित किन्तु विश्वासी तुम्ही लोगों पर। ईश्वर पर भरोसा रखो। किसी चालबाजी की आवश्यकता नहीं, उससे कुछ भी नहीं होता.... अपना सारा जीवन इस तीस करोड़ लोगों के उध्दार के लिए अर्पण कर देने का व्रत लो जो दिनों दिन डूबते जा रहे हैं। पेज नं.-52 (पन्ना 1, 83-84)।'
0 इस समय हम पशुओं की अपेक्षा कोई अधिक नीति परायण नहीं है। केवल समाज के अनुशासन के भय से हम कुछ गड़बड़ नहीं करते। यह समाज आज कह दे कि चोरी करने से दण्ड नहीं मिलेगा, तो हम इसी समय दूसरे की सम्पत्ति लूटने को टूट पड़ेंगे। पुलिस हमें सच्चरित्र बनाती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लोप की आशंका ही हमें नीति परायण बनाती है और वस्तुस्थिति तो यह है कि हम पशुओं से कुछ अधिक ही उन्नत हैं। (पृष्ठ-42 (ज्ञा.यो. 275)
0 दुष्कर्म द्वारा हम केवल अपना ही नहीं वरन् दूसरों का भी अहित करते हैं और सत्कर्म द्वारा हम अपना तथा दूसरो का भी भला करते हैं.....। (पृष्ठ- 47 (क.यो.88)
0 इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जाएगी? दुनिया बच्चों का खिलवाड़ नहीं है.....। (पृष्ठ 53 (पन्ना 1, 177-178)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें