सोमवार, 29 नवंबर 2010

जय बोलों बेईमान की...

सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार के वकील ने जिस बेहूदे ढंग से कहा कि किसी की नियुक्ति में ईमानदारी अंतिम योगय्ता है तो फिर नियुक्ति के लिए लोग नहीं मिलेंगे।
यह कथन उन लोगों के गाल पर तमाचा है जो लोग ईमानदारी को ही सर्वोपरि समझते हैं? और यदि सरकार को ही सर्वोपरि समझते हैं? और सरकार के वकील इस तरह की बात करें तो फिर यह अराजकता के सिवाय कुछ नहीं है। फिर काहे की सरकार, काहे की न्याय व्यवस्था और काहे का कानून?
केंद्र सरकार में जरा भी नैतिकता है तो उन्हें ऐसे वकीलों का लाइसेंस जब्त कर लेना चाहिए जो इस तरह की बात करता हो? सरकार और उसमें बैठे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह दुनिया तभी कायम है जब ईमानदारी जिन्दा है।
ईमानदारी आम लोगों में अधिक है। नेता और अधिकारी भ्रष्ट हो चुके हैं और पदों में बेईमानों को बिठाया जा रहा है तो इसके लिए ईमानदारी को गाली देना कहां तक उचित है। बेईमान इसलिए बढ़े हैं क्योंकि हमारी व्यस्वथा ही ऐसी है।
एक जमाना था जब नैतिकता लोगों के रग-रग में बसी थी। छोटी सी भी खबर से नौकरी तक चली जाती थी। अब नौकरी का डर नहीं है, क्यों? इसलिए क्योंकि जनता ने जिस पर भरोसा किया व भी वेतनभोगी हो गए! उन्हें भी जनसेवा की आड़ में वेतनभत्ता और राजसी एय्याशी चाहिए?
छत्तीसगढ़ में ही डा. रमन सिंह ने क्या कभी मंत्रालय में घूम कर देखा है कि दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कक्ष का द्वार को या भीतर के राजसी ढाढ को? ऐसे कैसे अनुमति दी जा सकती है?
क्या अखबारों में छप रहे भ्रष्टाचार की खबरों को सरकार ने संज्ञान में लेकर किसी तरह की कार्रवाई की। क्या किसी घोटाले में सचिव और मंत्रियों को जिम्मेदार ठहराया गया? बेशर्मी यहां है! और बेशर्मी तो तब बढ़ जाती है जब किसी मंत्री के गोंदिया में रहने वाले साले की संपत्ति 7 सालों में 70 गुणा बढ़ जाती है और इस पर भी कार्रवाई नहीं होती? बेशर्मा तब और बढ़ जाती है जब मंत्री बनते ही भाई संस्कृति विभाग में दलाली करने लगता है। अपने भाई को दलाल कहते सुनने के बाद भी शर्म नहीं आये तो इसे क्या कहा जा सकता है।
केंद्र सरकार के वकील को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों ने ईमानदारी नहीं बरती होती तो आज वे वकील नहीं होते? ईमानदारी आज भी जिन्दा है तो सरकारें जिंदा हैं।
ये अलग बात है कि वेतन भोगी लोगोंमें बेईमानी यादा है इसकी वजह व्यवस्था का दोष है। पकड़े जाने के बाद भी नौकरी पर आंच नहीं आने की जटिलता से बेईमानों के हौसले बुलंद है।
छत्तीसगढ़ में ही आईएएस बाबूलाल अग्रवाल का क्या हुआ? मालिक मकबूजा कांड में वेतनवृध्दि प्रमोशन रुकने के बाद नारायण सिंह का क्या हुआ? ऐसे लोगों को प्रमोशन देने की कोशिश पर सरकार की चुप्पी क्या बेईमानों के हौसले नहीं बढ़ाती है। परिवहन इंस्पेक्टर विनय कुमार अनंत हो या डॉ. आदिले? सरकार प्रमाणित होने के बाद भी नौकरी से क्यों नहीं निकाल देती। यदि बेईमानों में खौफ नहीं होगा तो कैसे ईमानदार लोग सामने आयेंगे?
ऐसा नहीं है कि ईमानदार लोग आगे नहीं आते। ऐसे कई मामलों में वेतनभोगियों में भी हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी ईमानदारी में गुजार दी। अब तो यह जुमला भी सुनने को मिल जाता है कि ईमानदार वही है जिन्हें मौका नहीं मिला। इन सबसे बावजूद अब भी ईमानदारी कायम है और दुनिया भी!

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