शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

करे कोई... भरे कोई...

पिछले दिनों कश्मीर में वहां के नेता उमर अब्दुल्ला पर भीड़ में एक युवक ने जूता फेंक दिया। युवक तो पकड़ा ही गया साथ ही दो डीएसपी स्तर के अधिकारी भी निलंबित कर दिए गए। खबर इतनी ही नहीं है। इसके पहले भी देश-दुनिया में इस तरह की घटनाएं हुई है जब आम लोगों में से किसी ने इस तरह की हरकत की है। कानून कभी किसी को ईजाजत नहीं देता कि वह अपने साथ हो रहे अन्याय पर किसी जनप्रतिनिधि (वेतन भोगी) से इस तरह की हरकत करे। भारत में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था है और अब तो गांव-गांव से नेता पैदा हो रहे है। राजनैतिक दलदल में वे स्वयं के लिए जुगाड़ में लगे हैं और आम आदमी लगातार नारकीय जीवन जीने मजबूर है। इसके बाद भी कोई जूता फेंक कर मार दे तो भी वह अपराध ही है।
छत्तीसगढ़ के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आधे राज्य में शासन नहीं है। ईमानदारी से सर्वे किया जाए तो यह स्थिति बढ़ ही सकती है। क्या सिर्फ दो रुपए किलो चावल या रोजगार गारंटी योजना से आम लोगों का भला हो सकता है? गांवों में शिक्षा नहीं है, स्वास्थ्य सुविधा नहीं है पीने और सिंचाई के पानी की सुविधा नहीं है और मुख्यमंत्री-मंत्री ही नहीं विधायक भी एयरकंडीशन में रह रहे हैं तब आम आदमी अपना गुस्सा कहां जाहिर करे।
हर बात में राजनीति ने आम लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य नया-नया बन है। आर्थिक रुप से पिछड़े इस राज्य के आम लोगों को मूलभूत सुविधा दिलाने की बजाय सरकार वल्र्ड रिकार्ड बनाने आमदा है कि उसकी राजधानी पूरी दुनिया में नए ढंग की सबसे खूबसूरत होगी? क्या इससे आम लोगों को मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी? बल्कि इन वेतनभोगी जनप्रतिनिधियों की एशगाह खूबसूरत हो जाएगी। किसानों को अपना गांव छोडऩा पड़ रहा है और वे नए सिरे से अपना जीवन शुरु करने मजबूर है। एक बसी-बसाई परिवार गांव को उजाडक़र कोई कैसे सुख से रह सकता है। इसकी कल्पना किसी ने की है।
गांधी के इस देश में सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा रही है। धर्म की रक्षा के लिए यहां राम-कृष्ण का जन्म हुआ है। प्रभु ईशु, पैगम्बर से लेकर गुरुनानक महावीर और शंकराचार्य को मानने वालों के अलावा पत्थर भी पूजे जाते हैं तब भला कोई अपने जनप्रतिनिधि पर जूता क्यों उछाल रहा है? सब तरफ अपनी सुविधा बढ़ाने में लगे नौकरशाह और राजनेताओं के लिए सिर्फ एक व्यक्ति का जूता फेंकना उदाहरण हो सकता है? जब तमाम लोग अपनी पीड़ा को व्यक्त करने लगेंगे तो क्या होगा? क्या इसकी कल्पना की गई है? यह हमारे धर्म में ही कहा गया है कि राजा परीक्षित चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी सर्पदंश के श्राप से नहीं बच सके थे। ऐसे में क्या आम लोगों के खून-पसीने की कमाई से मिलने वाले टैक्सों का हम अपने नही आम लोगों के हितों में कार्य करें।
समय किसी के लिए नहीं रुकता? और न ही पैसों से सुख ही खरीदा जा सकता है? इस सच्चाई के बाद भी पैसों के प्रति बढ़ती भूख का कारण विस्मयकारी है। लोकतंत्र के तीन स्तंभों पर यह जवाबदारी है कि वह आम लोगों के प्रति न्याय करें। लेकिन अपने हितों के लिए जिस तरह से नेता कभी एक हो जाते हैं या कभी लडऩे लगते है उससे तो आम लोगों का ही नुकसान होना है और ऐसे में आम लोग चुनाव तक इंतजार करने की बजाय पहले ही सडक़ पर आ गए तो आप नौकरशाहों को निलंबित करते रहो, लोगों को जेल में ढूंसते रहो क्या फर्क पड़ेगा? आखिर अंग्रेज भी राज्य करने यही रणनीति अपना रहे थे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. जूता उछाले जाने की घटना को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है। आजकल यह घटना बढ़ती जा रही है। लेकिन नेताओं को भी यह समझना होगा कि वो जनता के सेवक है मालिक नहीं। अगर वो खुद को मालिक समझने के भ्रम में रहे तो अभी तो जूते उछाले ही गए हैं कहीं पड़ने न लगें।

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