शनिवार, 5 मई 2012

बदलती सोच...


एक समय था जब मोहल्ले में किसी की अर्थी उठती थी तो उस मोहल्ले के विवाह समारोह में भी इसका असर होता था। लेकिन अब समय बदल गया है तभी तो कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन की रिहाई पर आतिशबाजी हुई और मिठाईयां बांटी गई। लेकिन उन शहीद हुए दो गार्डों की याद किसी ने नहीं की जिनकी तेरहवीं भी पूरी नहीं हो पाई थी।
 मरने वाले तो मर गये उनके लिए अपनी खुशियां क्यों छोड़े की तर्ज पर जिस तरह से खुशियां मनाई गई वह कितना उचित है यह विवाद का विषय है। लेकिन भारतीय परंपरा की दुहाई देने वाले भी जब इस तरह की खुशियां में शामिल हो जाये तब यह मान लेना चाहिए कि यहां अब भी बड़े छोटे का भेद कायम है? कलेक्टर बड़े लोग होते है,वे जिले के राजा होते है और सिपाही, उनकी क्या हैसियत होती है? उनके लिए कोई अपना आंसु बहाकर अपना समय क्यों खराब करे। जो जिन्दा है उन्हीं से तो काम पड़ता है। खुशियां मनाने वालों को इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी सुहाग उजड़ गई और किसने अपना बेटा खो दिया।
मुझे राजकपुर की श्री 420 फिल्म का वह सीन आज भी याद है। जब बम्बई पहुंचने पर राजकपुर केले के छिलके पर पैर आ जाने पर गिर जाता है तब एक डायलॉग सामने आता है यह बाम्बे है यहां गिरने वालों को कोई उठाता नहीं है लोग हंसते है।
एलेक्स पाल मेनन की रिहाई निश्चित रुप से सुकून देने वाली खबर है लेकिन उनका क्या जिन्हें नक्सलियों ने मार डाला। एलेक्स पाल एक अच्छे कलेक्टर होंगे लेकिन क्या बाकि कलेक्टर बेकार है। क्या बाकी कलेक्टरों को गरीबों से कोई मतलब नहीं है या क्या आईएएस व आईपीएस केवल अमीरों के हितों के लिए काम करते है फिर यह अलग से तमगा क्यों?  क्या आईएएस-आईपीएस की नियुक्ति सरकार के जनकल्याणकारी योजनाओं को अमलीजामा पहनानो नहीं होती फिर एलेक्स इनसे अलग कैसे हो गये। समय ने देखा है कि कैसे गरीबों का मसीहा बनकर इसी प्रदेश में कितने आईएएस-आईपीएस ने करोड़ो रुपये कमायें है। और यह भी देखा है कि हम लोगों ने अपने पाप धोने अस्पताल से लेकर दूसरे धर्मार्थ कामों मे अपना योगदान दिया है। इसमें उन लोगों की गलती मै नहीं देखता जिन्होंंने कलेक्टर की रिहाई पर आतिशबाजी की। दरअसल अब दुनिया बदल रही हैै। रिश्ते टूट रहे है। तत्कालिन लाभ प्राथमिकता हो चुकी है तब उन शहीद हुए दो गार्डों की तेरहवी से ज्यादा कलेक्टटर की रिहाई मायने रखती है।

                                       

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