छत्तीसगढ़ में 'काले हीरे' पर माफिया का पहरा, सत्ता के गठजोड़ से बर्बाद हो रहे उद्योग
छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी भले ही बदल जाती हो, लेकिन सूबे के खनिज संसाधनों पर कुंडली मारकर बैठे माफियाओं का खेल नहीं बदलता। रेत और आयरन ओर के बाद अब राज्य में कोल माफिया का आतंक इस कदर हावी हो चुका है कि स्थानीय उद्योगों का दम टूटने लगा है। खदानों से लेकर धर्मकांटों और सड़कों से लेकर मंत्रालय के गलियारों तक फैले इस सिंडिकेट ने न सिर्फ राज्य के राजस्व को भारी चूना लगाया है, बल्कि छत्तीसगढ़ की औद्योगिक साख को भी दांव पर लगा दिया है।
### खेल नंबर 1: बिना परमिट अवैध उत्खनन और कागजी हेरफेर
कोल माफिया का पहला खेल सीधे खदानों से शुरू होता है। सूत्रों के मुताबिक, अधिकारियों और ट्रांसपोर्टरों की मिलीभगत से उच्च गुणवत्ता (हाई ग्रेड) वाले कोयले का बिना परमिट के अवैध उत्खनन किया जाता है। इसके बाद, इस कीमती कोयले को माफिया के गुप्त ठिकानों पर ले जाकर कम गुणवत्ता (लो ग्रेड) वाले कोयले के साथ मिक्स कर दिया जाता है। कागजों पर इसे 'उच्च गुणवत्ता' का दिखाकर भारी कीमतों पर फैक्ट्रियों को बेच दिया जाता है। यह सिर्फ कोयले की चोरी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उद्योगों के साथ बड़ी धोखाधड़ी है।
### खेल नंबर 2: रास्ते में कोयला गायब, ट्रकों में भरी जा रही गिट्टी-भूसा
जो कोयला वैध परमिट के साथ खदानों से ट्रकों में लोड होकर निकलता है, वह भी सुरक्षित फैक्ट्रियों तक नहीं पहुंच पाता। रास्ते में बने अवैध डिपो पर इन ट्रकों को रोका जाता है और उसमें से असली कोयला उतार लिया जाता है। फैक्ट्री पहुंचने पर वजन में कोई कमी न दिखे, इसके लिए कोयले की जगह ट्रक में गिट्टी, पत्थर, भूसा और स्लैग जैसी सामग्रियां मिला दी जाती हैं। धर्मकांटे (वेब्रिज) पर बैठे लोगों की मिलीभगत से इस मिलावटी माल की तौल करा दी जाती है और वही कचरा फैक्ट्रियों के हवाले कर दिया जाता है।
### मशीनें हो रहीं खराब, बर्बादी की कगार पर फैक्ट्री मालिक
इस मिलावटी और घटिया कोयले की मार सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ के स्पंज आयरन, पावर प्लांट और अन्य बड़े उद्योगों पर पड़ रही है। घटिया कोयले और उसमें मौजूद पत्थरों के कारण फैक्ट्रियों का न सिर्फ उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बल्कि करोड़ों रुपये की महंगी मशीनें और फर्नेस (भट्टियां) भी जाम होकर खराब हो रही हैं।
उद्योगपतियों का कहना है कि वे दोहरा नुकसान झेल रहे हैं—एक तो महंगे दाम पर घटिया माल मिल रहा है, और दूसरा मशीनों के मेंटेनेंस का भारी खर्च उठाना पड़ रहा है।
### पुलिस और खनिज विभाग की रहस्यमयी चुप्पी, कैमरे के सामने आने से डरते हैं उद्योगपति
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे खेल की लिखित शिकायतें स्थानीय थानों से लेकर खनिज विभाग (माइनिंग) तक की जा चुकी हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर ढाक के तीन पात हैं। पुलिस इस मामले को माइनिंग विभाग का बताकर पल्ला झाड़ लेती है, तो खनिज विभाग के अधिकारी इस ओर आंखें मूंदे बैठे हैं। दबाव बढ़ने पर कभी-कभार दिखावे के लिए एकाध ट्रक पर कार्रवाई कर दी जाती है, लेकिन मुख्य सरगना हमेशा महफूज रहते हैं।
दबंगों और सत्ता के रसूखदारों के खौफ का आलम यह है कि कोई भी फैक्ट्री मालिक कैमरे या ऑन-रिकॉर्ड सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। उन्हें डर है कि यदि उन्होंने इस सिंडिकेट के खिलाफ आवाज उठाई, तो उनके उद्योगों को पूरी तरह से ठप कर दिया जाएगा या उनके हितों पर कुठाराघात होगा।
### सरकारें बदलीं, नहीं बदला सिंडिकेट
कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा बेल्ट में कोयला चोरी का यह साम्राज्य कोई नया नहीं है। पिछली भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में भी कोरबा और आस-पास के क्षेत्रों से कोल माफिया के आतंक की खबरें लगातार सुर्खियां बनती थीं। सत्ता बदली और नई सरकार आई, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं हुआ। बल्कि अब यह अवैध कारोबार और ज्यादा संगठित रूप ले चुका है।
करोड़ों-अरबों रुपये के इस काले खेल का एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों तक पहुंच रहा है, जिसके दम पर यह माफिया तंत्र बेखौफ काम कर रहा है। यदि समय रहते इस गठजोड़ को नहीं तोड़ा गया, तो छत्तीसगढ़ का औद्योगिक ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगा।




