रविवार, 5 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ में 'काले हीरे' पर माफिया का पहरा, सत्ता के गठजोड़ से बर्बाद हो रहे उद्योग


 छत्तीसगढ़ में 'काले हीरे' पर माफिया का पहरा, सत्ता के गठजोड़ से बर्बाद हो रहे उद्योग 


 छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी भले ही बदल जाती हो, लेकिन सूबे के खनिज संसाधनों पर कुंडली मारकर बैठे माफियाओं का खेल नहीं बदलता। रेत और आयरन ओर के बाद अब राज्य में कोल माफिया का आतंक इस कदर हावी हो चुका है कि स्थानीय उद्योगों का दम टूटने लगा है। खदानों से लेकर धर्मकांटों और सड़कों से लेकर मंत्रालय के गलियारों तक फैले इस सिंडिकेट ने न सिर्फ राज्य के राजस्व को भारी चूना लगाया है, बल्कि छत्तीसगढ़ की औद्योगिक साख को भी दांव पर लगा दिया है।

### खेल नंबर 1: बिना परमिट अवैध उत्खनन और कागजी हेरफेर

कोल माफिया का पहला खेल सीधे खदानों से शुरू होता है। सूत्रों के मुताबिक, अधिकारियों और ट्रांसपोर्टरों की मिलीभगत से उच्च गुणवत्ता (हाई ग्रेड) वाले कोयले का बिना परमिट के अवैध उत्खनन किया जाता है। इसके बाद, इस कीमती कोयले को माफिया के गुप्त ठिकानों पर ले जाकर कम गुणवत्ता (लो ग्रेड) वाले कोयले के साथ मिक्स कर दिया जाता है। कागजों पर इसे 'उच्च गुणवत्ता' का दिखाकर भारी कीमतों पर फैक्ट्रियों को बेच दिया जाता है। यह सिर्फ कोयले की चोरी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उद्योगों के साथ बड़ी धोखाधड़ी है।

### खेल नंबर 2: रास्ते में कोयला गायब, ट्रकों में भरी जा रही गिट्टी-भूसा

जो कोयला वैध परमिट के साथ खदानों से ट्रकों में लोड होकर निकलता है, वह भी सुरक्षित फैक्ट्रियों तक नहीं पहुंच पाता। रास्ते में बने अवैध डिपो पर इन ट्रकों को रोका जाता है और उसमें से असली कोयला उतार लिया जाता है। फैक्ट्री पहुंचने पर वजन में कोई कमी न दिखे, इसके लिए कोयले की जगह ट्रक में गिट्टी, पत्थर, भूसा और स्लैग जैसी सामग्रियां मिला दी जाती हैं। धर्मकांटे (वेब्रिज) पर बैठे लोगों की मिलीभगत से इस मिलावटी माल की तौल करा दी जाती है और वही कचरा फैक्ट्रियों के हवाले कर दिया जाता है।

### मशीनें हो रहीं खराब, बर्बादी की कगार पर फैक्ट्री मालिक

इस मिलावटी और घटिया कोयले की मार सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ के स्पंज आयरन, पावर प्लांट और अन्य बड़े उद्योगों पर पड़ रही है। घटिया कोयले और उसमें मौजूद पत्थरों के कारण फैक्ट्रियों का न सिर्फ उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बल्कि करोड़ों रुपये की महंगी मशीनें और फर्नेस (भट्टियां) भी जाम होकर खराब हो रही हैं।

उद्योगपतियों का कहना है कि वे दोहरा नुकसान झेल रहे हैं—एक तो महंगे दाम पर घटिया माल मिल रहा है, और दूसरा मशीनों के मेंटेनेंस का भारी खर्च उठाना पड़ रहा है।

### पुलिस और खनिज विभाग की रहस्यमयी चुप्पी, कैमरे के सामने आने से डरते हैं उद्योगपति

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे खेल की लिखित शिकायतें स्थानीय थानों से लेकर खनिज विभाग (माइनिंग) तक की जा चुकी हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर ढाक के तीन पात हैं। पुलिस इस मामले को माइनिंग विभाग का बताकर पल्ला झाड़ लेती है, तो खनिज विभाग के अधिकारी इस ओर आंखें मूंदे बैठे हैं। दबाव बढ़ने पर कभी-कभार दिखावे के लिए एकाध ट्रक पर कार्रवाई कर दी जाती है, लेकिन मुख्य सरगना हमेशा महफूज रहते हैं।

दबंगों और सत्ता के रसूखदारों के खौफ का आलम यह है कि कोई भी फैक्ट्री मालिक कैमरे या ऑन-रिकॉर्ड सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। उन्हें डर है कि यदि उन्होंने इस सिंडिकेट के खिलाफ आवाज उठाई, तो उनके उद्योगों को पूरी तरह से ठप कर दिया जाएगा या उनके हितों पर कुठाराघात होगा।

### सरकारें बदलीं, नहीं बदला सिंडिकेट

कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा बेल्ट में कोयला चोरी का यह साम्राज्य कोई नया नहीं है। पिछली भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में भी कोरबा और आस-पास के क्षेत्रों से कोल माफिया के आतंक की खबरें लगातार सुर्खियां बनती थीं। सत्ता बदली और नई सरकार आई, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं हुआ। बल्कि अब यह अवैध कारोबार और ज्यादा संगठित रूप ले चुका है।

करोड़ों-अरबों रुपये के इस काले खेल का एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों तक पहुंच रहा है, जिसके दम पर यह माफिया तंत्र बेखौफ काम कर रहा है। यदि समय रहते इस गठजोड़ को नहीं तोड़ा गया, तो छत्तीसगढ़ का औद्योगिक ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगा।

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शनिवार, 4 जुलाई 2026

खाद्य विभाग के दो दर्जन अफसर जाएँगे जेल

 गरीबों के निवाले पर डकैती, विधानसभा जांच समिति की रिपोर्ट में सनसनीखेज खुलासे!


216 करोड़ के पीडीएस घोटाले में मंत्रालय से लेकर जिलों तक बैठे दो दर्जन से अधिक अफसरों पर गिरेगी गाज; FIR और जेल भेजने की सिफारिश

 

छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए बहुचर्चित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) घोटाले को लेकर विधानसभा की पांच सदस्यीय विशेष जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया है। सूत्रों से मिली बेहद चौंकाने वाली जानकारी के मुताबिक, इस जांच रिपोर्ट में मंत्रालय से लेकर खाद्य विभाग के शीर्ष और मैदानी स्तर के दो दर्जन से अधिक अधिकारियों (IAS से लेकर जिला खाद्य अधिकारियों तक) की सीधी संलिप्तता पाई गई है। समिति ने न केवल इन भ्रष्ट अफसरों को चिन्हित किया है, बल्कि उनके खिलाफ तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज कर जेल भेजने की सख्त सिफारिश भी कर दी है। आगामी मानसून सत्र में इस रिपोर्ट के सदन के पटल पर रखे जाते ही प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक दीर्घाओं में बड़ा भूचाल आना तय माना जा रहा है।

600 करोड़ का आरोप, सरकार ने माना 216 करोड़ का घपला

चुनाव से पूर्व वर्तमान सत्ताधारी दल ने इस घोटाले को करीब 600 करोड़ रुपये का बताते हुए सड़क से लेकर सदन तक बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। सत्ता परिवर्तन के बाद जब इस मामले में सुगबुगाहट तेज हुई, तो विधानसभा के भीतर खुद सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी ही सरकार के खाद्य मंत्री दयालदास बघेल को कटघरे में खड़ा कर दिया था। भारी हंगामे और तीखे सवालों के बाद खाद्य मंत्री ने सदन में स्वीकार किया कि प्रारंभिक जांच के अनुसार यह घोटाला 216 करोड़ रुपये का है। इसी के बाद मामले की तह तक जाने के लिए अजय चंद्राकर और पुन्नूलाल मोहिले जैसे वरिष्ठ विधायकों की सदस्यता वाली एक उच्च स्तरीय 5 सदस्यीय विधानसभा जांच समिति का गठन किया गया था।

'वसूली एजेंट' के जरिए चलता था सिंडिकेट, नियमों की उड़ी धज्जियां

सूत्रों के अनुसार, जांच समिति के सामने यह तथ्य भी आया है कि इस पूरे खेल को अंजाम देने के लिए पूर्ववर्ती कार्यकाल में एक विशेष 'वसूली एजेंट' सक्रिय था। इसी एजेंट और विभागीय अफसरों के गठजोड़ से यह तय होता था कि किस राशन दुकान को निलंबित करना है और किस चहेती समिति या सोसाइटी को उसका अतिरिक्त प्रभार सौंपना है।

नियमों के मुताबिक एक सोसाइटी को सीमित दुकानें ही दी जा सकती हैं, लेकिन दुर्ग सहित कई जिलों में विभागीय सांठगांठ के चलते एक-एक सोसाइटी को दर्जन भर से अधिक दुकानों का प्रभार सौंपकर मलाई काटी जा रही थी। वहीं सरगुजा संभाग से भी बेहद गंभीर शिकायतें मिली हैं, जहां आदिवासियों के नाम पर आरक्षित राशन दुकानों को नियमों को ताक पर रखकर गैर-आदिवासियों को आवंटित कर दिया गया।

करप्ट अफसर अब भी मलाईदार पदों पर, मानसून सत्र में बढ़ेगी खाद्य मंत्री की परीक्षा

इस पूरे मामले का सबसे स्याह पहलू यह है कि जिन अधिकारियों पर इस 216 करोड़ रुपये की 'डकैती' में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं, वे आज भी मंत्रालय और विभाग के बेहद महत्वपूर्ण व मलाईदार पदों पर जमे हुए हैं। जांच में 'जायसवाल' सरनेम वाले एक प्रभावशाली अधिकारी सहित कई विभागीय चेहरों की भूमिका को पूरी तरह बेनकाब किया गया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या वर्तमान विष्णुदेव साय सरकार और खाद्य मंत्री दयालदास बघेल अपनी ही समिति की इस सिफारिश पर कड़ा एक्शन लेते हुए इन रसूखदार अफसरों को जेल का रास्ता दिखाएंगे? या फिर अतीत के अन्य मामलों (जैसे रमन शासनकाल के दौरान 'मडूम बांध' को अनुपयोगी बताकर एक निजी पावर कंपनी को बेचने और बाद में उस कंपनी द्वारा उसे आगे बेचने के खेल) की तरह इस बेहद संवेदनशील जांच रिपोर्ट को भी ठंडे बस्ते में या लीपापोती की भेंट चढ़ा दिया जाएगा? प्रदेश के लाखों गरीब परिवारों की निगाहें अब आगामी मानसून सत्र और सरकार के फैसले पर टिकी हैं।

इस खोजी रिपोर्ट के अगले अंक में हम विधानसभा समिति द्वारा चिन्हित किए गए उन दो दर्जन अफसरों के नामों का सिलसिलेवार खुलासा करेंगे जिनकी वजह से गरीबों के थाली का चावल बाजार में बिका।

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

राष्ट्रवाद के मुखौटे में ज़मीन का खेल? एक छत्तीसगढ़िया डॉक्टर की बेबसी की कहानी

 राष्ट्रवाद के मुखौटे में ज़मीन का खेल? एक छत्तीसगढ़िया डॉक्टर की बेबसी की कहानी


सत्ता
का दम और बेदम होता कानून: जब अपनी ही ज़मीन के लिए 'अपराधी' बन गया एक नागरिक

 स्वदेशी का नारा, ज़मीन पर कब्ज़ा और बेबस प्रशासन: रायपुर से ग्राउंड रिपोर्ट


क्या सत्ता और रसूख का नशा इस कदर हावी हो सकता है कि कानून की धज्जियां उड़ाते हुए किसी आम नागरिक की पुश्तैनी ज़मीन पर ही कब्ज़ा कर लिया जाए? क्या धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाले संगठन धरातल पर सादगी का चोला उतारकर भू-माफिया जैसा बर्ताव करने लगे हैं? ये सवाल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के न्यू शांति नगर से उठ रहे हैं, जहाँ एक पढ़ा-लिखा छत्तीसगढ़िया युवक अपनी ही खरीदी हुई ज़मीन पर एक ईंट रखने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।

मुख्य मामला: पुश्तैनी ज़मीन और 'स्वदेशी' की नज़र

मामला जांजगीर-चांपा के निवासी डॉ. अजय देवांगन का है। [02:52] उनके पिता ने साल 1995 (सन सतानवे) में रायपुर के न्यू शांति नगर में एक डाइवर्टेड (विपत्तित) प्लॉट खरीदा था। [02:59] पिता का ट्रांसफर होने के कारण वे उस समय वहां निर्माण नहीं करा सके। लेकिन जब यह ज़मीन डॉ. अजय देवांगन के संरक्षण में आई, तो उन्होंने पिछले तीन साल में करीब 5 से 6 बार अपनी ज़मीन की बाउंड्री वॉल कराने का प्रयास किया। [03:10]

विडंबना देखिए, डॉ. देवांगन की इस ज़मीन के ठीक बगल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अनुसांगिक संगठन 'स्वदेशी जागरण मंच' का कार्यालय 'स्वदेशी भवन' स्थित है। [03:28] डॉ. देवांगन का आरोप है कि जब भी वे अपनी ज़मीन पर काम शुरू कराने आते हैं, स्वदेशी भवन के कर्मचारी शुभ्रराज चाकी और अन्य लोग कभी पुलिस भेजकर, तो कभी धमकियां देकर काम रुकवा देते हैं। [03:37]

आरोप: 'ओने-पौने दाम में बेचो, नहीं तो...'

डॉ. देवांगन का कहना है कि उनकी मूल ज़मीन में से लगभग 800 स्क्वायर फीट का हिस्सा कम हो चुका है, जिसे कथित तौर पर बगल के निर्माण द्वारा दबा लिया गया है। [05:07] इतना ही नहीं, पीड़ित का आरोप है कि उन्हें अलग-अलग नंबरों से फोन पर धमकियां दी जा रही हैं कि 'इस ज़मीन पर मत घुसना, यह हमारी है।' [04:27] डॉक्टर ने बातचीत में खुलासा किया कि उन्हें यह तक कहा गया—"ज़मीन हमारे कब्ज़े में है, तुम्हें इसे ओने-पौने (चना-मुर्मुरा) के भाव में हमें ही बेचना पड़ेगा।" [06:24]

मददगार की भूमिका में छत्तीसगढ़ क्रांति सेना

जब शासन-प्रशासन से हताश होकर पीड़ित डॉक्टर ने 'छत्तीसगढ़ क्रांति सेना' से संपर्क किया, तब जाकर इस मामले में स्थानीय स्तर पर हलचल मची। [07:29] क्रांति सेना के हस्तक्षेप के बाद पीड़ित अपनी ही ज़मीन पर बाउंड्री करा पाए और वहां ताला लगवाया गया। [08:46] क्रांति सेना के पदाधिकारियों का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में बाहर से आने वाले कुछ लोग रसूख और संगठनों का नाम लेकर स्थानीय छत्तीसगढ़िया लोगों की ज़मीनों को निशाना बना रहे हैं। [09:25]

प्रशासनिक रवैये पर सुलगते सवाल

इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू प्रशासनिक रवैया है। आरोप है कि छुट्टी के दिन (ईद/बकरीद जैसी राजपत्रित छुट्टी) भी तहसीलदार और पुलिस अमला स्वदेशी भवन के इशारे पर मौके पर पहुंच जाता है। [08:53] जब पीड़ित अपनी ही ज़मीन पर अवैध ढांचा हटवाने के लिए जेसीबी (JCB) चलाता है, तो रसूखदारों के दबाव में उस पर 'ध्वनि प्रदूषण' का मामला दर्ज कर उसे थाने में दो-दो घंटे बैठाया जाता है। [03:51], [05:38]

यह स्थिति रायपुर में 'पुलिस कमिश्नर प्रणाली' लागू होने के बाद की है। [02:35] ऐसे में पत्रिका के माध्यम से यह बड़ा सवाल उठता है कि क्या कमिश्नरेट प्रणाली आम जनता की सुरक्षा के लिए है या फिर रसूखदारों के अवैधानिक कामों को संरक्षण देने के लिए? [10:12]

निष्कर्ष (Conclusion):

कल तक जो संगठन विपक्ष में रहते हुए सादगी, स्वदेशी और संस्कारों की दुहाई देते थे, सत्ता के नजदीक आते ही उनके इस रूप को देखकर आम जनता हैरान है। एक तरफ जहां भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक डॉक्टर अपनी वैध ज़मीन के कागज़ात जेब में लेकर इंसाफ की भीख मांग रहा है। यह कहानी सिर्फ एक ज़मीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि रसूख बनाम न्याय की उस जंग की है जिसमें कानून और निष्पक्षता दांव पर लगी है।

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https://youtu.be/ovGJnVXqN_0?si=DDtlMdu6SA3-tE3x


गुरुवार, 2 जुलाई 2026

'अंतरराष्ट्रीय' बहाने और तमनार के जलते सवाल!

 छत्तीसगढ़ को राख, महाराष्ट्र को चकाचौंध: एनजीटी के 'अंतरराष्ट्रीय' बहाने और तमनार के जलते सवाल!

गारे पेलमा सेक्टर-2 कोयला खदान को हरी झंडी मिलने से रायगढ़ के 14 आदिवासी गाँव विनाश के कगार पर। 2024 में जनसुनवाई को 'धांधली' बताने वाली एनजीटी ने अब रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी संकट का हवाला देकर आदिवासियों के वजूद का ही गला घोंट दिया। क्या कॉर्पोरेट मित्रों के दबाव के आगे बौनी हो गई 'डबल इंजन' सरकार?



जिस जमीन, महुआ के पेड़ों और पुरखों के जंगलों को बचाने के लिए रायगढ़ के तमनार क्षेत्र के आदिवासी सालों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे, उसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के एक ही फैसले ने उजाड़ कर रख दिया है। यह सिर्फ एक सरकारी मंजूरी नहीं है, बल्कि उन हजारों आदिवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का कत्ल है, जो संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA) कानून को अपनी ढाल मानते आए हैं।

तमनार और रायगढ़ की माटी आज अपनों के छल पर रो रही है, लेकिन सत्ता के गलियारों और उद्योगपतियों के वातानुकूलित दफ्तरों में जश्न का माहौल है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या एनजीटी ने यह हरी झंडी पर्यावरण संरक्षण के नियमों के तहत दी है, या फिर यह देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने 'अडानी समूह' के सीधे दबाव का नतीजा है?

पर्दे के पीछे का खेल: सीधे अडानी को नहीं, वाया महाराष्ट्र रूट!

गारे पेलमा सेक्टर-2 (Gare Palma Sector-2) नाम की इस विशालकाय कोयला खदान की क्षमता हर साल 23.6 मिलियन टन कोयला उत्पादन की है। सरकार और कॉरपोरेट तंत्र का खेल इतना शातिर है कि बदनामी से बचने के लिए राज्य और केंद्र सरकार ने यह खदान सीधे अडानी समूह को आवंटित नहीं की।

रणनीति के तहत, पहले यह खदान 'महाराष्ट्र राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी' (Mahagenco) को सौंपी गई। फिर, महाराष्ट्र की इस सरकारी कंपनी ने बेहद सफाई से खनन और विकास (MDO) का ठेका देश के प्रधानमंत्री के सबसे करीबी मित्र कहे जाने वाले अडानी समूह को सौंप दिया। यानी छत्तीसगढ़ की छाती चीरकर कोयला निकाला जाएगा, उजाला महाराष्ट्र के शहरों और सड़कों पर चमकेगा, और छत्तीसगढ़ के हिस्से आएगी सिर्फ राख, प्रदूषण, बीमारी और विस्थापन का दंश।

विनाश के कगार पर खड़े वो 14 गाँव: जहाँ पसरेगा अंधेरा

इस खदान को हरी झंडी मिलने का सीधा मतलब है तमनार क्षेत्र के 14 आदिवासी गाँवों का नक्शे से पूरी तरह मिट जाना। सरकारी आंकड़ों में इन गाँवों में 10,679 परिवार दर्ज हैं, लेकिन जमीनी हकीकत पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि यहाँ प्रभावित परिवारों की वास्तविक संख्या 15,000 से भी अधिक है। इन गाँवों की आने वाली नस्लें अब अपनी जमीन पर कभी कदम नहीं रख पाएंगी:

झीली, रामपुर, कुंजमेरा, गारे, सरईटोला, मुड़ागाँव, रौंदापाली, पाटा, चितवाही, ढोला, नारा, ढोलनारा, जिंगाबहाड़, डोलेसरा, मालूमरा और सरसमल।

इन गाँवों में रहने वाले हजारों आदिवासियों के बच्चों की किलकारियां अब कॉर्पोरेट मशीनों के शोर में दफन होने जा रही हैं।

एनजीटी का अजूबा तर्क: तमनार के जंगल कटने से थमेगा वैश्विक संकट?

एनजीटी (NGT) के जस्टिस शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने जो फैसला सुनाया है, वह पर्यावरण इतिहास के सबसे हास्यास्पद और डराने वाले बहानों में गिना जाएगा। अपने आदेश में ट्रिब्यूनल ने तर्क दिया है कि:

"वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी देशों (ईरान-अमेरिका) के बीच वैश्विक तनाव चल रहा है।"

"इस वैश्विक संकट के कारण आने वाले दिनों में देश में ऊर्जा सुरक्षा का भारी संकट सकता है।"

लिहाजा, राष्ट्रीय और वैश्विक महत्व को देखते हुए स्थानीय पर्यावरण और नियमों की कुछ अनदेखी की जा सकती है!"

अखबार का तीखा सवाल: रूस और यूक्रेन की लड़ाई की कीमत छत्तीसगढ़ का आदिवासी अपनी जमीन और फेफड़े देकर क्यों चुकाए? क्या पर्यावरण अदालत का काम पर्यावरण बचाना है या युद्ध का बहाना बनाकर जंगलों को काटने का रास्ता साफ करना?

2024 में 'धांधली' तो 2026 में 'सच्ची' कैसे हो गई जनसुनवाई?

इतिहास गवाह है कि इसी गारे पेलमा सेक्टर-2 के खिलाफ जब 2024 में गाँव वालों ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था, तब कोर्ट ने माना था कि खदान के लिए की गई पर्यावरणीय जनसुनवाई में भारी धांधली हुई थी। पर्यावरण नियमों को ताक पर रखा गया था।

मात्र दो सालों के भीतर ऐसा क्या बदल गया? क्या पर्यावरण सुधर गया या फिर राज्य में बैठी 'डबल इंजन' सरकार का दबाव बढ़ गया? जानकारों का कहना है कि सूबे के कद्दावर नौकरशाह से नेता बने वित्त मंत्री और रायगढ़ के स्थानीय रसूखदारों ने परदे के पीछे ऐसा चक्रव्यूह रचा, जिसने आदिवासियों की आवाज को दिल्ली के ट्रिब्यूनल तक पहुँचने ही नहीं दिया।

उबल रहा है जन-आक्रोश: नेताओं के खिलाफ तीखी भाषा और आक्रोश

इस फैसले के बाद से पूरे तमनार क्षेत्र में तनाव और दहशत का माहौल है। बस्तर से लेकर सरगुजा और रायगढ़ तक, आदिवासियों का गुस्सा फूट पड़ा है। आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि सरकार जनप्रितिनिधियों को बंधक बनाकर उद्योगपतियों की दलाली कर रही है।

हाल ही में प्रभावित क्षेत्रों में जाने से विपक्ष के जनप्रतिनिधियों और आदिवासी नेताओं को पुलिस बल का दुरुपयोग करके रोका गया। आंदोलन की अगुवाई कर रहे स्थानीय नेताओं का कहना है, "छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भले ही आदिवासी चेहरा (विष्णुदेव साय) हों, लेकिन पूरी कमान उद्योगपतियों के इशारे पर काम करने वाले चंद कद्दावर मंत्रियों और नौकरशाहों के हाथ में है। आदिवासियों के संवैधानिक और पेसा कानून के अधिकारों को पैरों तले रौंदा जा रहा है।"

तीखे सवाल, जिनका जवाब सरकार को देना होगा:

1. पेसा (PESA) और ग्राम सभा की 'ना' का क्या हुआ? जब आदिवासियों की ग्राम सभा ने इस खनन योजना को सिरे से खारिज कर दिया था, तो क्या दिल्ली और रायपुर की सरकारें ग्राम सभा से ऊपर हैं?

2. मुआवजा तो दे दोगे, पुरखों की पहचान कहाँ से लाओगे? आदिवासियों को कुछ लाख रुपए का मुआवजा देकर शहरों की झुग्गियों में धकेल दिया जाएगा। उनके जल, जंगल, जमीन और संस्कृति की भरपाई कौन सा कॉरपोरेट घराना करेगा?

3. छत्तीसगढ़ सिर्फ दोहन के लिए क्यों? हसदेव से लेकर तमनार तक, छत्तीसगढ़ के फेफड़ों (जंगलों) को काटा जा रहा है। क्या छत्तीसगढ़ की नियति सिर्फ देश को रोशन करना और खुद प्रदूषण के अंधेरे में डूब जाना है?

निष्कर्ष: अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है...

कोयला तो कुछ सालों में जलकर राख हो जाएगा और अडानी की तिजोरियां भर जाएंगी, लेकिन एक बार अगर तमनार का यह समृद्ध पर्यावरण और आदिवासियों का वजूद हाथ से निकल गया, तो उसे कोई वैज्ञानिक या सरकार दोबारा वापस नहीं ला पाएगी।

एनजीटी ने भले ही कागजों पर उद्योगपतियों के लिए रास्ते साफ कर दिए हों, लेकिन तमनार की धरती पर आदिवासियों की 'ग्राम सभा' अभी भी जिंदा है। जल-जंगल-जमीन की यह लड़ाई अब ट्रिब्यूनल के कमरों से निकलकर रायगढ़ की सड़कों और जंगलों में लड़ी जाएगी। सरकार को यह याद रखना होगा कि इतिहास में आदिवासियों ने कभी भी अपनी माटी का सौदा आसानी से नहीं होने दिया है।


बुधवार, 1 जुलाई 2026

आधा दर्जन IPS-अफ़सरों पर गिरफ्तारी की तलवार!

 ED की ₹1700 करोड़ की चोट के बाद अब CBI पर दबाव, पूर्व CM भूपेश बघेल और आधा दर्जन IPS-अफ़सरों पर गिरफ्तारी की तलवार!



भिलाई से लेकर दुबई तक अरबों रुपयों का साम्राज्य खड़ा करने वाले 'महादेव ऑनलाइन सट्टा ऐप' मामले में अब तक की सबसे बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दुबई की बुर्ज खलीफा की आलीशान संपत्तियों सहित करीब 1700 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति अटैच (कुर्क) किए जाने के बाद, अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) पर भी कड़ा एक्शन लेने का भारी दबाव बन गया है। सूत्रों का दावा है कि सीबीआई अब इस मामले में शामिल 'बड़े मगरमच्छों' पर शिकंजा कसने और उन्हें पूछताछ के बहाने बुलाकर सीधे गिरफ्तार करने की फुलप्रूफ प्लानिंग में जुट गई है।

बुर्ज खलीफा से लेकर दिल्ली तक जब्ती, कुल आंकड़ा ₹4336 करोड़ पार

बुधवार को ईडी द्वारा जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, रायपुर क्षेत्रीय कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए दुबई के प्राइम लोकेशन पर मौजूद 18 और दिल्ली की 2 अचल संपत्तियों को कुर्क किया है। इसमें दुनिया की सबसे ऊंची इमारत 'बुर्ज खलीफा' के लग्जरी अपार्टमेंट, दुबई हिल्स स्टेट के विला और कई हाई-एंड फ्लैट्स शामिल हैं, जिनकी बाजार कीमत करीब 1700 करोड़ रुपये आंकी गई है। इस ताजी कार्रवाई के बाद महादेव ऐप मामले में अब तक कुल फ्रीज और कुर्क की गई चल-अचल संपत्ति का आंकड़ा चौंकाने वाले ₹4,336 करोड़ के पार पहुंच चुका है।

आरोपी नंबर-6 पूर्व CM भूपेश बघेल और IPS लॉबी राडार पर

महादेव सट्टा ऐप को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण देने के आरोपों को लेकर सीबीआई की चार्जशीट में बड़े खुलासे हुए हैं। सीबीआई की एफआईआर में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को 'आरोपी नंबर-6' बनाया गया है। इसके अलावा प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक रसूखदार पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सीबीआई के सीधे राडार पर हैं।

इनमें आईपीएल स्तर के अधिकारी और अन्य बड़े नाम शामिल हैं:

 आनंद छाबड़ा (प्रशासनिक/पुलिस अधिकारी)

 अभिषेक पल्लव (प्रशासनिक/पुलिस अधिकारी)

 प्रशांत अग्रवाल

 आरिफ शेख

 संजय ध्रुव (राज्य प्रशासनिक सेवा)

 चंद्रभूषण वर्मा (जमानत पर बाहर एएसआई)

सीबीआई की जांच के मुताबिक, ये तमाम अधिकारी महादेव सट्टा ऐप को बेखौफ चलाने और प्रोटेक्शन देने के एवज में हर महीने ₹10 लाख से लेकर ₹20 लाख तक की मोटी प्रोटेक्शन मनी वसूलते थे। इन सभी के खिलाफ धारा 120B और 420 के तहत केस दर्ज किया जा चुका है और कभी भी इनकी गिरफ्तारी की जा सकती है।

एक तरफ जांच का शिकंजा, दूसरी तरफ अफ़सरों को प्रमोशन का 'इनाम'?

इस पूरे मामले में एक तीखा और गंभीर विरोधाभास भी सामने आया है। एक तरफ जहां मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और 'अपराधियों को उल्टा लटकाकर सीधा करने' की हुंकार भरती है, वहीं दूसरी तरफ महादेव सट्टा ऐप के आरोपी घेरे में आए आनंद छाबड़ा और लोहारीडीह कांड के बाद हटाए गए अभिषेक पल्लव जैसे अधिकारियों को वेतन वृद्धि और प्रमोशन का 'इनाम' दिए जाने की खबरें हैं। सरकार की इस कथनी और करनी को लेकर अब सियासी गलियारों में तीखे सवाल उठने लगे हैं।

सिंडिकेट का नया पैंतरा: बैन के बावजूद बदले डोमेन, विपक्ष ने घेरा

हंगामा मचने और महादेव ऐप पर प्रतिबंध की बातों के बीच सट्टा सिंडिकेट ने 'गोल्ड 365', 'टाइगर एक्सचेंज' और 'लेजर 247' जैसे नए डोमेन बनाकर इस अवैध खेल को बदस्तूर जारी रखा। इधर विपक्ष (कांग्रेस) ने केंद्र सरकार पर इस ऐप को पूरी तरह बैन न करने का आरोप लगाते हुए पलटवार किया है कि महादेव ऐप का पैसा अब सत्ताधारी दल के एक बेहद प्रभावशाली नेता तक पहुंच रहा है, जिसके चलते मुख्य आरोपियों (सौरभ चंद्राकर और रवि उत्पल) को अभी भी राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है।

फिलहाल, ईडी की इस बड़ी चोट के बाद अब गेंद सीबीआई के पाले में है। देखना यह होगा कि धीमी रफ्तार से चल रही यह जांच कब अंजाम तक पहुंचती है, क्योंकि जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि 'डिलेड जस्टिस इज नो जस्टिस' (देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता)।

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