शनिवार, 19 मई 2012

कुत्ते की दूम...


छत्तीसगढ़ में राहुल गांधी आये अपनों से मिले और चले गये। तीन दिनों के जद्दोजहद के बाद कांग्रेस किस तरह से सत्ता हासिल करेगी यह तो वहीं जाने लेकिन इन तीन दिनों का आखिरी अध्याय कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं रहा। गुटबाजी और महत्वकांक्षी मेंं डूबे बड़े नेताओं ने एक दूसरे को निपटाने में कोई कमी नहीं की। अध्यक्ष अपनी चाल चल रहे थे तो नेता प्रतिपक्ष अपनी चाल,विद्याचरण शुक्ला की अपनी पीड़ा तो मोतीलाल वोरा का अपना मजा। और पार्टी के आम कार्यकर्ताओं की पीड़ा से किसी को कोई लेना-देना नहीं रहा। पहले दो दिन अपने को आपस में बांधने की कोशिश तीसरे दिन जिस तरह से सामने आई वह कांग्र्रेस के लिए अच्छे संकेत कतई नहीं कहा जा सकता। मैक्लाड की इस्तीफे की कहानी छोड़ भी दे तो जिस तरह से गुटबाजी दिखाई दी है उस पर राहूल गांधी भी क्या कर पायेंगे यह तो वही जाने। लेकिन यह तय है कि अजीत जोगी,विद्याचरण शुक्ला,नंदकुमार पटेल और रविन्द्र चौबे में सामनजस्य बिठाने में प्रभारी महासचिव बीके हरिप्रसाद कमजोर साबित हो चुके है और उन्होंने अपनी कमजोरी को ढांकने जिस तरह से राहुल गांधी को मीडिया से दूर रखा यह निहायत गैर राजनीतिक फैसला रहा। भले ही इस फैसले पर प्रदेशाध्यक्ष और नेताप्रतिपक्ष की सहमती रही हो लेकिन राहुुल गांधी को वास्तविक्ता से दूर रखना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा साबित होगा।
बकौल राहुल,गुटबाजी छोड़ दो,कांग्रेस अपनी करतूतों से हारती है और पैसे वालों के सामने मेहनत टिकती है, जैसी बातें किसी नौटंकी से कम नहीं है। हालांकि गुटबाजी का प्रशिक्षण कार्यक्रम के पहले दिन से ही दिखने लगा था जब हरिप्रसाद व नंदकुमार पटेल अपनी चला रहे थे और अजीत जोगी अपनी चाल चल रहे थे। वीसी,नेताम,कर्मा और न जाने कितने लोग तब मन ही मन सोच रहे होंगे कि आने दो चुनाव बताते है। लगभग यही सोच अजीत जोगी की भी रही हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ये सच है कि नंदकुमार पटेल के अध्यक्ष बनने के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस की सक्रियता बढ़ी है लेकिन वे उस घेरे को नहीं तोड़ पा रहे है जो कांग्रेस की हार की वजह मानी जाती है। पैसों का खेल अब भी भारी दिख रहा है और चंदा दबाने वालों को बांटने की जिम्मेदारी देने से क्या हश्र हो रहा है यह सबके सामने है। कार्यकर्ताओं ने राहुल के सामने जिस तरह से पदाधिकारियों को लेकर आक्रोश दिखाया है वह आगे भी मायने रखेगी। कुल मिलाकर राहुल गांधी के दौरे ने कांग्रेस की आपस खींचतान को उजागर किया ही है भाजपा को खुश होने का मौका भी दे दिया है।
                            

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