धर्म को अपने अनुसार चलाना चाहती है मोदी सरकार
ऐतिहासिक सत्य है कि जब जब राजा मजबूत रहा है तब तक उसने धर्म गुरुओं को अपने इशारे पर चलाने की कोशिश की है इतिहास इस तरह के उदाहरण से अटे पड़े हैं हम आपको सिर्फ एक उदाहरण बता देते हैं कि मुगल साम्राज्य अकबर जब ताकतवर हो गए तो उन्होंने मुस्लिम धर्म के किसी भी प्रवर्तक न मुल्ला किसी की नहीं सुनने लगे वे अपने हिसाब से सत्ता चलाने लगे थे और जब दबाव ज्यादा बढ़ने लगा तो उन्होंने दीन इलाही नाम का अपना एक नया धर्म ही शुरू कर दिया था
कहा जाता है कि कि वे हिंदू मुस्लिम नहीं करते थे क्योंकि वे मुसलमान भी नहीं रह गए थे दीन इलाही धर्म की स्थापना के बाद तब उनका रवैया क्या इतना भरोसेमंद था कि लोग उन पर विश्वास करते थे और उनके नौ रत्नों की कहानियां तो सबने सुनी है उनमें सभी तरह के लोग थे हिंदू हिंदुओं की संख्या भी ज्यादा थी लेकिन क्या इस दौर में हिंदू मुस्लिम करके सत्ता हासिल करने वाले अब धर्म गुरुओं पर ही प्रहार करने लगे क्या सिर्फ धर्म गुरुओं पर प्रहार इसलिए किया जा रहा है ताकि समूचे हिंदुत्व को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया जाए राजनीति में तो यह दिखाई दिया क्योंकि हिंदुत्व के सबसे बड़े झंडा बरदार रहे बाला साहब ठाकरे के सुपुत्र उद्धव ठाकरे जब भारतीय जनता पार्टी से अलग हो गए तो उन्हें तोड़ने की क्या-क्या कोशिश नहीं हुई यानी हिंदुत्व का झंडा हमारे पास ही है हम ही उठाएंगे कोई दूसरा हमसे बड़ा हिंदुत्व नहीं है और इस दौर में इसी तरीके का खेल भी खेला गया जिसने भी भाजपा की आलोचना की उसे सनातन विरोधी कहा गया जिसने भी मोदी की मनमानी पर प्रहार किया उसे भी हिंदू विरोधी करार दिया गया और यदि आपने कांग्रेस की सत्ता की तारीफ कर दी या कांग्रेस के साथ खड़े हैं तो आप हिंदू विरोधी करार दिए जाएंगे तमगे बांटे गए देशद्रोही के भी और हिंदुत्व के भी इस दौर में और यह उपाय अभी से शुरू नहीं हुआ है आरएसएस के साथ लगी विश्व हिंदू परिषद ने सबसे पहले साधु महात्माओं या धार्मिक लोगों पर डोरे डालना शुरू किया और राम मंदिर का आंदोलन इसका सहारा बना
हालांकि शंकराचार्य साफ कहते हैं कि हंगामा करने से या सड़क में हो हल्ला मचाने से राम मंदिर नहीं बना है या नहीं मिला है लोग ये कह रहे हैं कि हम राम को लाए उन लोगों से पूछिए कि आज राम अगर वहां पर बैठने के लिए अवसर बन रहा है तो ये कैसे बन रहा है यह सड़क पर चिलाने से बन रहा है कि न्यायालय के फैसले से बन रहा है राम मंदिर या अयोध्या जन्मभूमि तब मिला है जब न्यायालय में सबूत पेश किए गए शंकराचार्य ने पैरवी की वकीलों की फेहरिस्त लगी थी शंकराचार्य के साथ लगातार सबूत दे दिए जाने लगे और आप हैरान हो जाएंगे कि इस पूरी कानूनी प्रक्रिया से ना तो विश्व हिंदू परिषद प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा था या भारतीय जनता पार्टी के लोग ही जुड़े थे वे सब पर्दे के पीछे खड़े नजर आए तब ऐसी परिस्थिति में अब जब विवाद बढ़ता जा रहा है शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज ने कह दिया है कि राम मंदिर में जो प्राण प्रतिष्ठा हुई है वह उचित नहीं हुई है या धर्म के अनुसार नहीं हुई है और वे पूर्ण निर् निर्माण के बाद यानी मंदिर अभी अधूरा भी है 30 फीसद बना है पूर्ण निर्माण के बाद वे फिर से प्राण प्रतिष्ठा करेंगे यह बेहद ही विवादास्पद मामला हो जाता है और यदि यही बात कोई कांग्रेस या दूसरे विपक्षी दल के लोग कह देते कि वह भाजपा का इवेंट है फिर से प्राण प्रतिष्ठा समारोप की जाएगी तो अब तक वे सनातन विरोधी कहलाते लेकिन सवाल शंकराचार्य जी ने उठाया और शायद इसलिए उठाया है कि इस दौर में सब कुछ अपने में समेट लेने अपने को सबसे बड़ा हिंदुत्व का ठेकेदार बनाने मोनोपोली रखने और पूरा कब्जा जमाने की जो कोशिश हुई है उससे क्या शंकराचार्य का मन आहत हुआ विवाद तो उस दिन से शुरू हो गया था जब कांशी में कारी का निर्माण किया जा रहा था सैकड़ों की संख्या में मूर्तियां बुलडोजर की चपेट में आ गई थी एक मूर्ति के लिए क्या दसों मूर्तियों को किनारे किया जा सकता है यह पहला सवाल शंकराचार्य श्री अभ मुक्तेश्वरा नंद जी ने उठाया था और उसके बाद जब केवल इवेंट करने के लिए या राजनीति साधने के लिए प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन हुआ तब विवाद और बढ़ता चला गया तो क्या यह सारी लड़ाई सिर्फ हिंदुत्व का ठेकेदार बनने की है या वास्तव में यह कोई राजनीतिक खेल है सवाल आप कुछ भी कर सकते हैं क्योंकि इस दौर में जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर तमाम विपक्ष के लोगों को हिंदू विरोधी बताया गया वह भी कम हैरान करने वाली बात नहीं है हालाकि कि बहुत सारे भाजपाइयों के रिश्तेदार भी होंगे उन रिश्तेदारों के मन में क्या गुजर रहा होगा जो कांग्रेस में है
लेकिन राजनीति साधनी है और राजनीति गजब का खेल है मान सम्मान कुछ नहीं देखा जाता इसका उदाहरण नीतीश कुमार तो सबके सामने है ही है कि किस तरीके से अमित शाह ने दरवाजे बोने की बात कही थी और कुछ ही महीनों बाद उनकी भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो गई थी किस तरीके से भ्रष्टाचारियों को जेल में डालने की बात हुई थी और किस तरीके से उन्हें मुख्यमंत्री उपमुख्यमंत्री बना दिया गया था यह राजनीति उन लोगों के लिए जायज हो सकती है जो नैतिकता को तिलांजलि दे चुके हैं लेकिन जब बात धर्म की आने लगी है तो क्या सचमुच अब भारतीय जनता पार्टी या देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब सब कुछ अपने कब्जे में कर लेना चाहते हैं और मोदी समर्थकों को क्या यह दिखाई नहीं देता कि किसी शंकराचार्य का किस तरीके से अपमान हो रहा है उनकी बातों की किस तरीके से अवहेलना हो रही है उन्हें डराया धमकाया तक जा रहा यकीन मानिए यदि आप यह बात यदि किसी दूसरे धर्म में होती यानी बहुत सारे धर्म है सिख चैन मुस्लिम ईसाई पारसी किसी भी धर्म गुरुओं के खिलाफ कोई सत्ता इस तरह का व्यवहार करती या अनदेखी करती उनके बातों की अवहेलना करती तो अब तक बवाल मच चुका होता सत्ता के खिलाफ विद्रोह हो चुका होता क्या कुछ नहीं हो जाता लेकिन हमने पहले ही कहा कि राजनीति को साधने के लिए विश्व हिंदू परिषद के गठन के साथ यह खेल हो गया था धर्म पर भी कब्जा करने का मोनोपोली स्थापित करने का और क्या मोदी सरकार अब इस परे सफल हो गई है और अब हिंदू समाज में शंकराचार्य की अहमियत समाप्त हो चली है या समाप्त हो गई है या हो रही है कहना बेहद कठिन है आप सोचिए जरूर कि राजनीति किस करवट बैठ रही है और धर्म के आश्रय जिस राजनीति को साधा गया है वह धर्म के साथ या धर्म गुरुओं के साथ उस राजनीति का व्यवहार कैसा होता जा रहा है !
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