‘डबल इंजन’ में टकराव या अपनों को बचाने का ‘कवच’? साय सरकार ने कतरे मोदी की CBI के पर!
भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाने' की गारंटी देने वाली भाजपा सरकार ने ही छत्तीसगढ़ के लोकसेवकों को दिया सुरक्षा घेरा; अब बिना राज्य सरकार की लिखित अनुमति के सीधे कार्रवाई नहीं कर पाएगी देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी।
छत्तीसगढ़ की सियासत में 'डबल इंजन' की सरकार को लेकर एक ऐसा विरोधाभास सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक महकमे तक हड़कंप मचा दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने मंचों से दहाड़ते हुए छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाकर सीधा करने' की जो गारंटी दी थी, उस गारंटी पर अब खुद विष्णुदेव साय सरकार ने एक बड़ा 'स्पीड ब्रेकर' लगा दिया है।
गृह विभाग द्वारा जारी एक ताजा अधिसूचना ने देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के अधिकारों को राज्य में बेहद सीमित कर दिया है। नई शर्तों के मुताबिक, सीबीआई अब छत्तीसगढ़ सरकार के नियंत्रण वाले किसी भी लोकसेवक (अधिकारी-कर्मचारी) के खिलाफ राज्य सरकार की पूर्व लिखित अनुमति के बिना न तो जांच कर पाएगी और न ही कोई सीधी कार्रवाई।
भूपेश सरकार की 'बंदिश' हटाई, फिर खुद ही लगा दी!
दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि तत्कालीन कांग्रेस (भूपेश बघेल) सरकार ने जब छत्तीसगढ़ में सीबीआई की सीधी एंट्री पर रोक लगाई थी, तब भाजपा ने इसे 'भ्रष्टाचार को छुपाने का प्रयास' बताया था। दिसंबर 2023 में जैसे ही विष्णुदेव साय के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी, आनंद-फानन में पहला बड़ा फैसला लेते हुए भूपेश सरकार के उस प्रतिबंध को हटा दिया गया और सीबीआई को बेधड़क कार्रवाई की खुली छूट दी गई।
लेकिन, महज कुछ महीनों के भीतर ऐसा क्या हुआ कि साय सरकार को भी ममता बनर्जी और भूपेश बघेल की राह पर चलते हुए सीबीआई के पर कतरने पड़े?
अधिसूचना के बारीक अक्षर, जो बयां कर रहे हैं डर!
गृह विभाग की अधिसूचना को यदि बारीकी से पढ़ा जाए, तो साफ होता है कि सीबीआई को केंद्र सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय उपक्रमों और निजी व्यक्तियों पर कार्रवाई की पूरी आजादी तो है, लेकिन असली पेंच राज्य के लोकसेवकों को लेकर फंसाया गया है। अधिसूचना में स्पष्ट तौर पर यह शर्त जोड़ दी गई है कि "छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नियंत्रित लोक सेवकों से संबंधित मामलों में राज्य सरकार की पूर्व लिखित अनुमति के बिना ऐसा कोई अन्वेषण (Investigation) नहीं किया जाएगा।"
सवाल: आखिर किसे बचाने की है तैयारी?
इस नए आदेश के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। राज्य सरकार ने सत्ता में आते ही बहुचर्चित पीएससी (PSC) घोटाला समेत कई बड़े और संवेदनशील मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी थी । इन मामलों के तार राज्य के कई मौजूदा और रसूखदार अधिकारियों-कर्मचारियों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह तीखा सवाल उठना लाजिमी है कि:
1 क्या सीबीआई की जांच की आंच कुछ ऐसे चेहरों तक पहुंच रही थी, जिन्हें बचाना सरकार की सियासी मजबूरी है?
2 क्या 'डबल इंजन' की साय सरकार को अब केंद्रीय नेतृत्व या गृह मंत्रालय की मंशा पर भरोसा नहीं रहा?
3 क्या राज्य सरकार को यह डर सताने लगा है कि दिल्ली के इशारे पर सीबीआई कभी भी राज्य के अफसरों पर शिकंजा कस सकती है, जिससे पूरी सरकार बैकफुट पर आ जाएगी?
विपक्ष हमलावर: "भ्रष्टाचार को ढंकने की कोशिश"
इस आदेश को लेकर विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने इसे सीधे तौर पर सरकार की कमजोरी और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाला कदम बताया है
कांग्रेस का आरोप है कि जो भाजपा कल तक सीबीआई की दुहाई देती नहीं थकती थी, वह आज अपने ही अधिकारियों को बचाने के लिए जांच एजेंसी का गला घोंट रही है। इस आदेश के बाद अब निष्पक्ष जांच की उम्मीद बेमानी हो चुकी है क्योंकि सरकार कभी भी अपने खास अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई को लिखित अनुमति नहीं देगी ।
कटाक्ष: क्या अमित शाह की 'गारंटी' फेल?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय और अमित शाह के उस रसूख को चुनौती है, जिसके दम पर भाजपा ने छत्तीसगढ़ का चुनाव जीता था। यदि राज्य में भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा है, तो फिर केंद्रीय जांच एजेंसी से यह परहेज क्यों? क्या अब भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की स्क्रिप्ट दिल्ली के बजाय रायपुर के 'महानदी भवन' (मंत्रालय) से लिखी जाएगी?
यह देखना दिलचस्प होगा कि इस 'अदृश्य राजनैतिक युद्ध' में जीत किसकी होती है—भ्रष्टाचार पर वार करने का दावा करने वाली केंद्रीय नीति की या फिर अपनों को सुरक्षित रखने की राज्य की इस नई 'ढाल' की!
अखबार के लिए विशेष 'साइड बॉक्सेस' (Side Elements):
बॉक्स 1: 'क्रोनोलॉजी' समझिए...
दिसंबर 2018: भूपेश सरकार ने सीबीआई को दी गई 'सामान्य सहमति' वापस ली, राज्य में एंट्री बैन की।
दिसंबर 2023: साय सरकार ने आते ही प्रतिबंध हटाया, सीबीआई को खुली छूट दी
सितंबर 2024 (ताजा): साय सरकार ने नया आदेश जारी कर फिर लगाया 'लिखित अनुमति' का पहरा
बॉक्स 2: तीखे सवाल (Bullet Points):
जब पीएससी घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है, तो अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए हर बार लिखित अनुमति का पेंच क्यों?
क्या विपक्ष की तरह अब भाजपा शासित राज्यों को भी केंद्रीय एजेंसियों के 'दुरुपयोग' का डर सताने लगा है?
'भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाने' का वादा करने वाली भाजपा इस यू-टर्न पर जनता को क्या जवाब देगी?
Video देखे
https://youtu.be/BHxMyeerKtM?si=6G3cLnI2oVuidbbq

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें