गुरुवार, 21 मई 2026

संघ की क्लास की परतें खुलने लगी

 संघ की क्लास की परतें खुलने लगी

आ गया एक एक सच सामने 


छत्तीसगढ़ की राजनीति में सत्ता और संगठन के बीच चल रही खींचतान ने अब एक बेहद गंभीर और नया मोड़ ले लिया है। रायपुर के रोहिणीपुरम स्थित सरस्वती शिक्षण संस्थान के कार्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और प्रदेश सरकार के 5 दिग्गज मंत्रियों के बीच हुई 'समन्वय बैठक' की परतें अब एक-एक कर खुलने लगी हैं।

सूत्रो के मुताबिक, यह महज कोई औपचारिक समन्वय बैठक नहीं थी, बल्कि मंत्रियों की बाकायदा 'क्लास' ली गई थी। इस क्लास में प्रदेश के पांच ताकतवर मंत्रियों— गृहमंत्री विजय शर्मा, वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, वन मंत्री केदार कश्यप और राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा को विशेष तौर पर तलब किया गया था ।

CBI के पर कतरने के पीछे क्या नागपुर कनेक्शन?

इस तीखी रिपोर्ट में सबसे बड़ा और गंभीर सवाल गृह मंत्रालय के उस फैसले पर उठाया गया है, जिसके तहत छत्तीसगढ़ में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है । राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बड़ी शिद्दत से गूंज रहा है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मोदी-शाह की दिल्ली वाली महाशक्तिशाली CBI की एंट्री पर छत्तीसगढ़ सरकार को अंकुश लगाने की हिमाकत करनी पड़ी?

दावा किया जा रहा है कि संघ (RSS) से जुड़े कई रसूखदार और बड़े अधिकारियों के नाम CBI की जांच के दायरे में आ चुके हैं । इन अधिकारियों ने अपनी गर्दन फंसती देख संघ के बड़े पदाधिकारियों के सामने गुहार लगाई थी और अपनी व्यथा सुनाई थी। आरोप है कि अपने चहेते और खास नौकरशाहों को CBI की सीधी और ताबड़तोड़ कार्रवाई (पूछताछ और गिरफ्तारी) से बचाने के लिए ही गृह मंत्रालय के जरिए यह पूरी चक्रव्यूह रचना तैयार की गई है ।

जांच की आंच में घिरे बड़े नाम!

वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार ने साफ तौर पर इशारा किया है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौरान हुए शराब घोटाले, महादेव सट्टा ऐप कांड, कोयला घोटाले और बहुचर्चित PSC घोटाले की जांच में कई IAS और IPS अधिकारियों के नाम लगातार तैर रहे हैं । इसमें जनसंपर्क और परिवहन विभाग संभाल चुके IPS दीपांशु काबरा जैसे चर्चित नामों का भी जिक्र नागपुर कनेक्शन के हवाले से किया गया है । चूंकि PSC घोटाले की जांच अब CBI के हाथों में है, इसलिए जांच का दायरा कहां तक फैलेगा, इसे लेकर सत्ता और संघ के भीतर भारी घबराहट देखी जा रही थी ।

विपक्ष और गलियारों में चर्चा: 'सिर्फ बचाना नहीं, मलाईदार पोस्टिंग भी देनी है'

चर्चाएं सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। भाजपा खेमे और प्रशासनिक हल्कों में दबी जुबान से यह बात चीख-चीख कर कही जा रही है कि गृहमंत्री विजय शर्मा को सिर्फ CBI पर लगाम लगाने का ही फरमान नहीं मिला है, बल्कि संघ की ओर से बाकायदा उन पसंदीदा अफसरों और कर्मचारियों की एक सीक्रेट लिस्ट सौंपी गई है जिन पर कोई कार्रवाई नहीं की जानी है । इतना ही नहीं, आदेश यह भी है कि इन्हें हटाना तो दूर, बल्कि जल्द से जल्द मलाईदार और अच्छी जगहों पर पोस्टिंग दी जाए ।

तीखा सवाल:

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार स्वतंत्र रूप से फैसले ले रही है, या फिर पर्दे के पीछे से सरकार की कमान और मंत्रियों के विभागों का रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से संघ कार्यालय से संचालित हो रहा है?

अभी तो सिर्फ गृह मंत्रालय का पत्ता खुला है, आने वाले दिनों में बाकी के 4 मंत्रियों— ओ.पी. चौधरी, केदार कश्यप, श्याम बिहारी जायसवाल और टंक राम वर्मा के विभागों से संघ के एजेंडे वाले क्या-क्या आदेश निकलते हैं, इस पर पूरी राजनीतिक बिरादरी की नजरें टिकी हुई हैं !

Vidio देखें 


https://youtu.be/kfLU-rsmGpI?si=9P9NGqFiNFic2TzW


कहानी: सिस्टम का सच और रेंजर की बेबसी कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा। वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी। उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात? इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी। सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था। सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी। नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था। कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?

 कहानी: सिस्टम का सच और वर्दी की बेबसी और बहुत कुछ 


कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा।

वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी।

उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात?

इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी।

सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था।

सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी।

नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था।

कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?