गुरुवार, 21 मई 2026

कहानी: सिस्टम का सच और रेंजर की बेबसी कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा। वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी। उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात? इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी। सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था। सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी। नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था। कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?

 कहानी: सिस्टम का सच और वर्दी की बेबसी और बहुत कुछ 


कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा।

वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी।

उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात?

इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी।

सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था।

सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी।

नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था।

कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?


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