एनजीटी का कड़ा हंटर: पर्यावरण को 'वसूली केंद्र' बनाने वाली छत्तीसगढ़ सरकार के फूले हाथ-पांव!
7 कड़े सवाल, हर 15 दिन में देनी होगी प्रगति रिपोर्ट; मंत्रालय से लेकर प्रदूषण विभाग तक हड़कंप
क्या छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर पूरी तरह फेल साबित हो चुकी है? क्या राज्य में प्रदूषण फैलाने वाले रसूखदारों और उद्योगपतियों को सत्ता का खुला संरक्षण हासिल है? ये तीखे सवाल हम नहीं, बल्कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के कड़े रुख और सरकार को थमाए गए ताजा फरमान के बाद प्रशासनिक गलियारों में गूंज रहे हैं। एनजीटी ने छत्तीसगढ़ सरकार की घोर लापरवाही पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सात बिंदुओं पर कड़े निर्देश जारी किए हैं। इतना ही नहीं, ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि अब 'कागजी घोड़े' दौड़ाने से काम नहीं चलेगा, सरकार को अब हर 15 दिन में अपनी प्रगति रिपोर्ट सौंपनी होगी। एनजीटी के इस 'पंद्रह दिनी अल्टीमेटम' से मंत्रालय से लेकर पर्यावरण विभाग तक हड़कंप मच गया है और अफसरों के हाथ-पांव फूल गए हैं।
सात बिंदुओं का चक्रव्यूह: कागजी विकास की खुली पोल
एनजीटी ने जिन सात बिंदुओं पर सरकार से जवाब और एक्शन रिपोर्ट मांगी है, वे राज्य के प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता को उजागर करते हैं। ट्रिब्यूनल ने साफ तौर पर निर्देश दिए हैं कि:
1 नदी-तालाबों में गंदा पानी बंद हो: नगरीय निकायों के आसपास बहने वाली नदियों और तालाबों में नालों का गंदा पानी सीधे प्रवाहित न किया जाए। इसके लिए नालों पर 'स्क्रीन जाली' लगाने जैसी पुख्ता व्यवस्था तुरंत की जाए।
2 अतिक्रमण पर चले बुलडोजर: जल स्रोतों के आसपास भू-माफियाओं द्वारा किए गए अवैध कब्जों को कड़ाई से हटाया जाए, क्योंकि ये सीधे तौर पर जनता की जिंदगी से खिलवाड़ हैं।
3 मूर्ति विसर्जन पर तुरंत सफाई: त्योहारों के बाद नदियों और तालाबों में होने वाले मूर्ति विसर्जन के तत्काल बाद नगरीय निकाय सफाई और जल सुधार का काम सुनिश्चित करें।
4 ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक निस्तारण: राज्य में सॉलिड वेस्ट (ठोस अपशिष्ट) के मैनेजमेंट को लेकर जो लापरवाही बरती जा रही है, उसे तुरंत खत्म कर वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाए!
'नोटिस और वसूली का खेल': उद्योगों को प्रदूषण फैलाने की खुली छूट?
वीडियो रिपोर्ट में पर्यावरण विभाग की कार्यप्रणाली पर बेहद संगीन आरोप लगाए गए हैं। हसदेव अरण्य में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और अडानी के प्रोजेक्ट्स का जिक्र करते हुए कहा गया है कि एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच के कई फैसलों को ठेंगे पर रख दिया गया, जिससे ग्लोबल स्तर पर इकोसिस्टम को नुकसान पहुंच रहा है।
सीमेंट प्लांट्स, स्पंज आयरन और कोल माइनिंग बेल्ट्स में पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आरोप है कि पर्यावरण विभाग के लिए एनजीटी क्लीयरेंस और प्रदूषण नियंत्रण महज 'करोड़ रुपए बटोरने की स्कीम' बनकर रह गया है। फैक्ट्रियों को नोटिस जारी किया जाता है, टेबल के नीचे से 'सैटलमेंट' होता है और फिर विभाग चुप्पी साध लेता है। इस 'खानापूर्ति' के खेल की वजह से फैक्ट्रियों के आसपास के ग्रामीण पलायन को मजबूर हैं, फसलें बर्बाद हो रही हैं और भूजल इतना जहरीला हो चुका है कि वह पीने लायक नहीं बचा।
नदियों में जहर, तालाबों की 'कब्रगाह' बना रायपुर
राजधानी रायपुर का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि कभी रायपुर को "छह कोरी छह आगर" यानी 126 तालाबों का शहर कहा जाता था। लेकिन आज भू-माफियाओं, बिल्डरों और प्रशासनिक सांठगांठ ने इन ऐतिहासिक तालाबों को पाटकर उन पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं।
कुम्हारी में केडिया डिस्टिलरी जैसी फैक्ट्रियों और स्पंज आयरन प्लांटों का जहरीला पानी सीधे नदियों में बहाया जा रहा है। भाटागांव के पास सालों से बन रहा प्यूरीफायर सिस्टम आज तक शुरू नहीं हो पाया। हकीकत यह है कि यदि आज छत्तीसगढ़ की किसी भी नदी के पानी का ईमानदारी से वैज्ञानिक परीक्षण करा लिया जाए, तो वह पानी पीने तो क्या, नहाने लायक भी नहीं मिलेगा।
लीपापोती की सरकार, कोर्ट के भरोसे जनता
जब जनता प्रदूषण और अतिक्रमण से त्रस्त होकर गुहार लगाती है, तो सरकार जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती करती है। यही वजह है कि राज्य के जागरूक नागरिकों को सरकार पर भरोसा न रखकर अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
अब देखना यह है कि हर 15 दिन में प्रगति रिपोर्ट मांगने वाले एनजीटी के इस तल्ख तेवर के बाद क्या साय सरकार की नींद टूटेगी? या फिर हर बार की तरह इस बार भी फाइलें दबाकर और आंकड़ों की बाजीगरी कर एनजीटी की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की जाएगी? जनता की सांसों पर पहरा देने वाले इस तंत्र का असली चेहरा अब बेनकाब हो चुका है।
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