नान घोटाला: सुप्रीम कोर्ट के हथौड़े की गूंज से हिली छत्तीसगढ़ की सियासत; क्या खुलेंगे 'रहस्यमयी डायरी' के राज?
11 साल बाद खुला फाइलों का बंद पन्ना, कानूनी चक्रव्यूह में घिरे नौकरशाह और रसूखदार; पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- "गर्दन तक पहुंचेंगे कानून के हाथ।"
राजनीति में कुछ मुद्दे कभी मरते नहीं हैं, उन्हें बस वक्त के हिसाब से 'कोल्ड स्टोरेज' में डाल दिया जाता है। लेकिन जब देश की सर्वोच्च अदालत की सख्ती और हथौड़े की गूंज सुनाई देती है, तो बड़े-बड़ों के रसूख वाले महलों में भी नींद उड़ जाती है। छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित 'नान घोटाला' (नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला) एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज पर पूरी शिद्दत के साथ जिंदा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले का ट्रायल शुरू करने और सख्त रुख अपनाने के बाद सूबे के सियासी गलियारों से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक हड़कंप मच गया है ।
क्या था साल 2015 का वह महा-घोटाला?
बात साल 2015 की है, जब छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पूरे शबाब पर थी। इसी दौरान एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की । इस छापे ने पूरे देश को चौंका दिया था। जांच में केवल करोड़ों रुपए नगद ही बरामद नहीं हुए, बल्कि यह भी खुलासा हुआ कि कैसे मलाईदार पदों को बांटा जाता था ।
इस पूरे काले खेल की सबसे बड़ी धुरी बनी वह 'रहस्यमयी डायरी', जिसने तत्कालीन राजनीति में भूचाल ला दिया था। इस डायरी में 'डॉक्टर', 'मैडम' जैसे कई गुप्त कोड लिखे हुए थे, जिन्हें करोड़ों रुपए का कमीशन पहुंचाया जाता था।
ब्यूरोक्रेसी के 'सुपर पावर' और घटिया चावल का पाप
इस महा-घोटाले में तत्कालीन ब्यूरोक्रेसी के दो सबसे रसूखदार और ताकतवर चेहरे विलेन बनकर उभरे—आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा । तत्कालीन प्रशासनिक गलियारों में इन्हें 'सुपर पावर' माना जाता था ।
इस घोटाले का सबसे शर्मनाक और अमानवीय पहलू यह था कि इन रसूखदारों के संरक्षण में ₹3 प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से कमीशन की जेबें तो गर्म हो रही थीं, लेकिन प्रदेश की गरीब और मासूम जनता की थाली तक 'घटिया और अमानक स्तर का चावल' परोसा जा रहा था । गरीबों के निवाले पर डाका डालकर रसूखदार अपनी तिजोरियां भर रहे थे ।
शिवशंकर भट्ट: वो 'विभीषण' जिसने खोल दिए राज
इस पूरी कानूनी लड़ाई के सबसे अहम किरदार हैं शिवशंकर भट्ट, जिन्हें छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में 'विभीषण' के नाम से भी जाना जाता है । भट्ट ने जब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी जुबान खोली और बकायदा शपथ पत्र दाखिल किया, तो पूरा देश हतप्रभ रह गया। उन्होंने सीधे तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का नाम इस मामले में घसीटा ।
हालांकि, भाजपा ने इस शपथ पत्र को कभी गंभीरता से नहीं लिया । लेकिन हाल ही में डॉ. रमन सिंह को पार्टी के कोर ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के फैसले को इसी नान घोटाले के ट्रायल से जोड़कर देखा जा रहा है। सवाल अब भी बरकरार है कि क्या डॉ. रमन सिंह वाकई इस पूरे खेल के मुखिया थे या उनकी नाक के नीचे उनकी मर्जी के बिना यह सब हो रहा था ?
11 साल का कानूनी पचड़ा और घूमता चक्रव्यूह
बीते 11 सालों में छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए । सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, और जांच की कमान भी ACB से लेकर ED (प्रवर्तन निदेशालय) और SIT (विशेष जांच दल) के हाथों में घूमती रही । लेकिन रसूख की ताकत के दम पर यह मामला कानूनी दांवपेंचों में ऐसा उलझा कि लोग इसे लगभग भूलने लगे थे । रसूखदार अधिकारी और नेता जमानत और कानूनी सुरक्षा की आड़ में छिपे रहे ।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: "सिस्टम सिर्फ गरीबों के लिए नहीं"
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर दखल देकर ट्रायल को हरी झंडी दे दी है, तो उम्मीद की एक नई किरण जागी है। अदालत ने कड़ा संदेश दिया है कि कानून के हाथ सिर्फ लंबे नहीं होते, वे जरूरत पड़ने पर गुनहगारों की गर्दन तक भी पहुंचते हैं ।
अब देखना यह होगा कि कोर्ट के इस 'फाइनल राउंड' में क्या आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा जैसे अफसर इस चक्रव्यूह से निकल पाएंगे? क्या डायरी के उन गुप्त कोड्स के पीछे छिपे 'मगरमच्छों' के असली चेहरे बेनकाब होंगे या एक बार फिर रसूख के आगे सिस्टम बौना साबित हो जाएगा ? जनता की नजरें अब देश की सबसे बड़ी अदालत के इस अंतिम फैसले पर टिकी हैं।

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