रविवार, 7 जून 2026

रबर स्टैंप' के तमगे से 'अल्टीमेट पावर सेंटर' तक: छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय का डबल गेम!

रबर स्टैंप' के तमगे से 'अल्टीमेट पावर सेंटर' तक: छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय का डबल गेम!



दिसंबर 2023 में जब छत्तीसगढ़ की सत्ता की कमान विष्णुदेव साय को सौंपी गई थी, तब दिल्ली से लेकर रायपुर तक के राजनीतिक पंडितों और विपक्ष ने एक ही सुर में दावा किया था— *“यह सरकार रबर स्टैंप है, रिमोट कंट्रोल से चलेगी।”* लेकिन साल 2026 आते-आते छत्तीसगढ़ के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में एक ऐसा गुप्त, आक्रामक और खामोश खेल खेला जा चुका है जिसने सबको चौंका दिया है।

सियासत की बिसात पर शह और मात का यह खेल इतनी चालाकी से चल रहा है कि दिल्ली को इसकी भनक कितनी है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन मुख्यमंत्री साय ने राज्य में अपना एक 'अभेद और निर्विवाद सिस्टम' खड़ा कर लिया है।

### **1. रिमोट की छटपटाहट और खामोश बगावत**

राजनीति में जो सीधा और सरल दिखता है, अमूमन वह वैसा होता नहीं। विपरीत परिस्थितियों में कद्दावर नेताओं को पटखनी देकर आए विष्णुदेव साय के भीतर 'रिमोट कंट्रोल सरकार' के नैरेटिव को लेकर एक गहरी छटपटाहट थी। इसी छटपटाहट ने एक ऐसी रणनीति को जन्म दिया, जिसने राज्य के स्थापित पावर सेंटर्स की नींव हिला दी। मुख्यमंत्री ने खुद को मजबूत करने के लिए उन चेहरों को खंगालना शुरू किया जो प्रभावशाली तो थे, लेकिन जिन पर किसी खास गुट या बड़े नेता का 'ठप्पा' नहीं लगा था।

### **2. ब्यूरोक्रेसी का महामंथन: 43 अफसरों के तबादले और मलाईदार विभागों पर कब्ज़ा**

कहा जाता है कि किसी भी मुख्यमंत्री की असली ताकत उसकी ब्यूरोक्रेसी होती है। शुरुआत में साय को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा था; चाहे वह वित्त मंत्री ओपी चौधरी की दमदारी हो या 2005 बैच के आईएएस अधिकारियों का प्रशासनिक नियुक्तियों में दबदबा।

लेकिन बिना किसी शोर-शराबे के, मुख्यमंत्री ने हाल ही में **43 आईएएस अफसरों का ट्रांसफर** कर पूरी बिसात ही पलट दी। खनिज, राजस्व, वन और गृह जैसे सबसे संवेदनशील और मलाईदार विभागों में उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद और निर्विवाद अफसरों को तैनात कर दिया है। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथ में लेने का साय का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है।

### **3. 'डबल गेम' और कद्दावर नेताओं की 'पॉलिटिकल क्लीनिंग'**

प्रशासन के बाद बारी राजनीति को साधने की थी। इस 'साइलेंट ऑपरेशन' के तहत उन भारी-भरकम चेहरों को हाशिए पर धकेल दिया गया जो खुद को मुख्यमंत्री से कम नहीं समझते थे या भविष्य के दावेदार थे:

 * **दिग्गजों की विदाई:** डॉ. रमन सिंह, बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत, विक्रम उसेंडी, रामविचार नेताम और रेणुका सिंह जैसे कद्दावर नेताओं को कोर ग्रुप से धीरे से किनारे कर दिया गया।

 * **परंपराओं का खात्मा:** पार्टी की स्थापित परंपराओं को तोड़ते हुए विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची से **23 विधायकों को बाहर** का रास्ता दिखा दिया गया। इसकी जगह मुख्यमंत्री ने पहली बार जीतकर आए युवा और प्रभावशाली विधायकों की एक नई फौज खड़ी कर दी है जो सीधे उनके प्रति वफादार हैं।

### **4. दिल्ली को विश्वास में लेकर खुद का कुनबा मजबूत करना**

इस पूरे खेल की सबसे तीखी सच्चाई यह है कि इसे **'डबल गेम'** कहा जा रहा है। मुख्यमंत्री और उनके रणनीतिकार अफसरों ने बड़ी चालाकी से दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व को यह विश्वास दिलाया कि यह सब 'सीनियर नेताओं को किनारे कर नए प्रयोग' करने के लिए किया जा रहा है।

यानी, **"दिल्ली को विश्वास में लो और राज्य में अपना खुद का अभेद साम्राज्य खड़ा कर लो।"** अब स्थिति यह है कि यदि कोई कद्दावर नेता दिल्ली जाकर शिकायत भी करे, तो उसका कोई असर नहीं होने वाला, क्योंकि साय का कुनबा पूरी तरह से स्थापित हो चुका है।

 निष्कर्ष (Punchline)

छत्तीसगढ़ में भले ही कानून-व्यवस्था की स्थिति और अपराधों को लेकर सवाल उठ रहे हों, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे पर विष्णुदेव साय ने खुद को 'अल्टीमेट पावर सेंटर' के रूप में स्थापित कर लिया है। जो लोग साय को सीधा और खामोश समझते थे, वे उनके इस 'डबल गेम' के चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। यह साय का नया युग है— जहाँ चेहरा सीधा है, लेकिन चालें बेहद गहरी और अचूक हैं!

वीडियो देखें 

https://youtu.be/dMcfBCq1Ee8?si=3NbNC4HtQV_MGx-D


खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा'

 खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा', कानून को 'वॉशिंग मशीन' बनाने की जिद!



छत्तीसगढ़ में सत्ता बदलते ही क्या न्याय की परिभाषा भी बदल गई है? क्या सूबे की 'डबल इंजन सरकार' में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब रसूखदारों के आगे खाकी (पुलिस) नतमस्तक होकर पीड़ित को ही मुलजिम बनाने का खेल खेल रही है? ये सवाल हम नहीं, बल्कि बेमेतरा जिले के साजा विधानसभा क्षेत्र से आ रही वह हैरान करने वाली तस्वीरें और पुलिसिया कार्रवाई की स्क्रिप्ट चीख-चीख कर कह रही है, जिसने पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

ताजा मामला साजा विधानसभा के हाईप्रोफाइल भाजपा विधायक ईश्वर साहू के पुत्र कृष्णा साहू से जुड़ा है। आरोप है कि सत्ता की धमक और अहंकार के नशे में चूर विधायक पुत्र को बचाने के लिए साजा पुलिस ने एक ऐसा 'कुचक्र' रचा है, जिससे पीड़ित आदिवासी परिवार ही अब सहमा हुआ है।

दशहरे की रात का वो खूनी खेल और 'खाकी' की सुस्ती

घटना बीती 12 अक्टूबर यानी दशहरे की रात की है। आरोप है कि विधायक पुत्र कृष्णा साहू ने अपने साथियों के साथ मिलकर मनीष मंडावी (एक आदिवासी युवक) और उसके चाचा के साथ जमकर मारपीट की। मारपीट इस कदर बेरहमी से की गई कि पीड़ित का सिर तक फट गया। जातिसूचक गालियां दी गईं। लेकिन हद तो तब हो गई जब इस गंभीर मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पीड़ित को घंटों थाने के चक्कर काटने पड़े। साजा पुलिस सत्ता के दबाव में एफआईआर दर्ज करने से कतराती रही। आखिरकार जब आदिवासी समाज ने एकजुट होकर तीखा आक्रोश जताया और पुलिस पर भारी दबाव बनाया, तब कहीं जाकर साजा पुलिस ने विधायक पुत्र कृष्णा साहू के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट (ST/ST Act) और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।

काउंटर एफआईआर का 'पटकथा': 45 घंटे बाद याद आई लूट?

कहानी में असली ट्विस्ट इसके बाद आता है। जैसे ही विधायक पुत्र पर गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज हुआ, साजा पुलिस ने कथित तौर पर रसूखदारों को 'वॉशिंग मशीन' में डालकर पाक-साफ करने की स्क्रिप्ट लिख डाली। अमूमन ऐसी संगीन धाराओं के तहत आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए, लेकिन कृष्णा साहू बेखौफ अंदाज में ठसक के साथ थाने पहुंचता है।

पुलिस उसे गिरफ्तार करने की बजाय उसकी एक ऐसी शिकायत पर तुरंत मुहर लगा देती है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। घटना के लगभग 45 घंटे बाद विधायक पुत्र की तरफ से काउंटर रिपोर्ट लिखवाई जाती है कि पीड़ित मनीष मंडावी और उसके चाचा ने मिलकर उनसे ₹40,000 लूट लिए! पुलिस बिना किसी जांच के, बिना समय गंवाए पीड़ित पक्ष के खिलाफ ही लूट (Dacoity/Robbery) जैसी गंभीर धारा के तहत काउंटर एफआईआर दर्ज कर लेती है।

सवाल: क्या समझौते का दबाव बनाने के लिए रचा गया कुचक्र?

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पुलिस अक्सर रसूखदारों को बचाने के लिए काउंटर केस का सहारा लेती है ताकि गरीब पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाया जा सके और वह 'समझौता' करने को मजबूर हो जाए।

 पहला सवाल: विधायक बनने से पहले और बाद की जीवनशैली को देखें, तो क्या सचमुच ₹40,000 की लूट की रिपोर्ट लिखवाने में विधायक पुत्र को 45 घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया?

 दूसरा सवाल: एसटी/एससी एक्ट के तहत नामजद आरोपी थाने में खुलेआम घूम रहा है और पुलिस उससे पूछताछ करने के बजाय उसकी 'लूट' की थ्योरी पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेती है, ऐसा क्यों?

 तीसरा सवाल: यह पूरा इलाका प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है, ऐसे में गृहमंत्री की नाक के नीचे कानून का यह कैसा माखौल उड़ाया जा रहा है?

लोहारीडीह की आग से भी नहीं सीखा सबक?

इसी कवर्धा-बेमेतरा बेल्ट में पिछले दिनों 'लोहारीडीह कांड' हुआ था, जहां एक रसूखदार भाजपा नेता के आतंक से तंग आकर उग्र भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया था और पूरा गांव जेल की सलाखों के पीछे चला गया था। साजा की यह घटना बताती है कि प्रशासन ने लोहारीडीह की त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा है। जब पुलिस निष्पक्ष न्याय देने की बजाय सत्ता के औजार के रूप में काम करने लगे, तो जनता का कानून से विश्वास उठने लगता है।

नवा बैला के नवा सींग... सत्ता का अहंकार?

छत्तीसगढ़ी में एक बड़ी मशहूर कहावत है— "नवा बैला के नवा सींग, चरे बैला टंगे टिंग" (यानी नया-नया पद या ताकत मिलने पर जरूरत से ज्यादा धमक दिखाना)। साजा में भी यही देखने को मिल रहा है। विपक्ष अब इस मुद्दे पर पूरी तरह मुखर है और सरकार को घेरने की तैयारी में है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री और गृहमंत्री अपने ही विधायक के पुत्र के इस 'गुंडाराज' पर लगाम कसेंगे या फिर साजा पुलिस का यह 'शर्मनाक खेल' यूं ही जारी रहेगा और एक गरीब आदिवासी न्याय की भीख मांगते-मांगते खुद ही लुटेरा बनकर सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा?

जवाब का इंतजार सूबे की जनता को है।

वीडियो देखें


https://youtu.be/8wLJBtZ6Q4Y?si=Q6XZYs_ObqrHeiL1