डबल इंजन सरकार में भ्रष्टाचार का 'सुपरफास्ट' सिंडिकेट: पड़ोसी राज्यों से लात खाई ब्लैकलिस्टेड कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ में 'रेड कारपेट'
जीरो टॉलरेंस का दावा हवा-हवाई; नियमों को ठेंगे पर रख अपात्र कंपनियों को बांटे जा रहे 13 करोड़ के संवेदनशील ठेके; मासूम बच्चों के शोषकों पर मेहरबान सिस्टम, क्या जनता की जान इतनी सस्ती है?
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दागी और धोखेबाज कंपनी को पड़ोसी राज्यों के कई विभागों ने 'अयोग्य' घोषित कर लात मारकर बाहर निकाल दिया हो, उसके स्वागत में छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार पलक-पावड़े बिछाए खड़ी है? सुशासन और 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाली मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार के राज में पर्दे के पीछे भ्रष्टाचार का एक ऐसा अनोखा और खौफनाक सिंडिकेट चल रहा है, जिसे न तो नियमों की परवाह है, न जनता के टैक्स के पैसों की और न ही इंसानी जिंदगियों की।
पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में जिस शराब कंपनी पर मासूम बच्चों के शोषण और अवैध परमिट के गंभीर आरोप लगे, उसे छत्तीसगढ़ में एंट्री देने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ सड़क, बिजली और खेल मैदानों के नाम पर करोड़ों रुपये के सरकारी ठेके रेवड़ियों की तरह उन अपात्र कंपनियों को बांटे जा रहे हैं जो तकनीकी रूप से पूरी तरह अयोग्य हैं। आखिर जनता की गाढ़ी कमाई से हो रहे इस 'खूनी खेल' का असली मास्टरमाइंड कौन है?
क्रोनोलॉजी ऑफ करप्शन: 13 करोड़ की बंदरबांट और मौत को आमंत्रण
इस पूरे घोटाले की कड़ियों को जोड़ें तो अफसरों और अयोग्य ठेकेदारों की जुगलबंदी के तीन बड़े और बेहद संवेदनशील मामले सामने आते हैं:
1. रायपुर-धमतरी-कुरूद: अयोग्य हाथों में बिजली का करंट (ठेका राशि: ₹6 करोड़)
रायपुर-धमतरी-कुरूद मार्ग पर बिजली लाइन शिफ्टिंग और विद्युतीकरण (कोड आईडी: CGER7424) का बेहद संवेदनशील काम एक ऐसी अपात्र कंपनी को सौंप दिया गया, जिसे छत्तीसगढ़ के ही दूसरे विभाग पहले ब्लैकलिस्ट कर चुके हैं। जरा सोचिए, जिस दौर में जरा से शॉर्ट सर्किट से लोगों की जान चली जाती है, वहां हाई-वोल्टेज बिजली का काम एक दागी कंपनी को देना क्या सीधे-सीधे लोगों को मौत के मुंह में धकेलना नहीं है?
2. बिलासपुर न्यायधानी: खेल परिसर के नाम पर बड़ा खेल (ठेका राशि: ₹4.87 करोड़)
बिलासपुर खेल परिषद (स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स) के निर्माण, विद्युत नवीनीकरण और मेंटेनेंस के नाम पर करीब पौने पांच करोड़ का ठेका एक और अपात्र कंपनी की झोली में डाल दिया गया। बच्चों और खिलाड़ियों के भविष्य से जुड़े इस परिसर में तकनीकी रूप से अक्षम कंपनी से काम कराना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा है। क्या माननीय हाईकोर्ट को इस पर स्वतः संज्ञान नहीं लेना चाहिए?
3. नवा रायपुर-महासमुंद: चमचमाती सड़कों के नीचे 'अंधेरा' (ठेका राशि: ₹2.15 करोड़)
नवा रायपुर और महासमुंद में सड़क चौड़ीकरण के दौरान बिजली लाइन की शिफ्टिंग के नाम पर सवा दो करोड़ रुपये का ठेका भी अपात्रों को ही रेवड़ी की तरह बांट दिया गया।
बड़ा सवाल: जनता की जान दांव पर, क्या कमीशन का है चक्कर?
कुल 13 करोड़ रुपये के ये तीनों ठेके यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है। क्या ये अपात्र कंपनियां अधिकारियों को भारी-भरकम कमीशन दे रही हैं, जिसके बदले जनता की सुरक्षा को ताक पर रख दिया गया? खराब गुणवत्ता, ओवर-बिलिंग (बिल बढ़ाकर राशि हड़पना) और राजस्व की बर्बादी का यह खुला खेल धड़ल्ले से जारी है।
अधिकारियों का लचर बहाना:
जब इस घालमेल पर अधिकारियों से सवाल किया जाता है, तो उनका रटा-रटाया जवाब आता है कि "हमने शपथ-पत्र (Affidavit) मांगा है, अगर वो झूठा निकला तो ठेकेदार को जेल भेजेंगे।" लेकिन साहब, जब तक आपकी कागजी कार्रवाई पूरी होगी और ठेकेदार जेल जाएगा, तब तक अगर घटिया काम की वजह से किसी बेकसूर की जान चली गई, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या 'पैसे दो, ठेका लो और नियमों को जेब में रखो' ही इस सरकार की नई नीति बन चुकी है?
शर्मनाक: बाल शोषकों के लिए 'रेड कारपेट'!
भ्रष्टाचार की हद तो तब हो जाती है जब शराब के काले कारोबार में लिप्त दागी कंपनियों को राज्य में तवज्जो दी जाती है। साल 2024 में मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में 'सोम डिस्टिलरी' का एक खौफनाक मामला सामने आया था, जहां 59 मासूम बच्चों को बंधक बनाकर काम कराया जा रहा था।केमिकल की वजह से उन बच्चों के हाथ तक झुलस चुके थे। मध्य प्रदेश सरकार ने इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया और हाईकोर्ट ने इसका लाइसेंस सस्पेंड कर दिया।अब सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी अमानवीय और कानून द्वारा सस्पेंड की गई कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ का आबकारी और प्रशासनिक अमला पलक-पावड़े बिछा रहा है? कल को अगर ये शराब सप्लाई में कोई बड़ा खिलवाड़ कर दें, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
बदहाल कानून व्यवस्था: 10 हजार की भीड़ के बीच मर्डर और लूट, बेबस सरकार!
यह सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की कानून व्यवस्था भी पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है। कोटनी में साप्ताहिक बाजार के दौरान, जहां 10 से 15 हजार लोगों की भारी भीड़ मौजूद थी, वहां तीन बेखौफ अपराधी आते हैं, एक सराफा व्यवसायी को सरेआम गोली मारते हैं और लगभग 65 लाख रुपये से अधिक के सोने-चांदी के जेवरात लूटकर फरार हो जाते हैं।
इस दुस्साहस के बाद पूरे इलाके में आक्रोश है, पीड़ित परिवार रो-रोकर बेहाल है और जनता शव को सड़क पर रखकर प्रदर्शन करने को मजबूर है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सीधा सवाल दागा है कि “मुख्यमंत्री जी और गृहमंत्री जी, बताइए कि इस राज्य में जनता की रक्षा कौन करेगा?” जब अपराधी इतने बेखौफ हैं कि हजारों की भीड़ के बीच हत्या करके निकल जाते हैं, तो आम नागरिक खुद को सुरक्षित कैसे महसूस करे? टिप्पणी (Conclusion):
छत्तीसगढ़ में 'बदलाव' का नारा देकर सत्ता में आई सरकार आज खुद कटघरे में है। एक तरफ अयोग्य और ब्लैकलिस्टेड ठेकेदारों को संवेदनशील सरकारी काम सौंपकर जनता को मौत के मुहाने पर खड़ा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ सरेआम गोलियां चल रही हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री व लोक निर्माण मंत्री अरुण साव को अब फाइलों से बाहर निकलकर जनता को जवाब देना होगा। शपथ-पत्रों के पीछे छिपने वाले अफसर याद रखें कि जनता का टैक्स उनकी अय्याशी के लिए नहीं है, और न ही जनता की जान इतनी सस्ती है कि उसे कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा दिया जाए। उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर एफआईआर ही अब एकमात्र रास्ता है!
