मंगलवार, 9 मार्च 2010

नई आज़ादी को सलाम


२४ साल की पत्रकारिता में शयद पहली बार मैंने महसूस किया की आज मेरे पास शब्द नहीं है ? महिला बिल का पास होना नई आजादी है मैंने १९४७ की आज़ादी नहीं देखी है लेकिन मेरा दावा है यह नई आज़ादी भी उससे कम किसी हल में नहीं है

महिलाए सिर्फ मां नहीं बहन नहीं वह पुरुष की जीवन संगिनी भी होती है ऐसी जीवन संगिनी जो हर हाल में अपनो की ख़ुशी के लिए अपना सर्वत्र निछावर कर देती है मै ये नहीं कहता की मै कुछ नया कह रहा हूँ और न ही मै किसी को यह सब याद ही दिलाने की कोशिश कर रहा हूँ दरअसल इस नई आज़ादी की ख़ुशी ने मुझे भीतर तक गुदगुदा दिया है मै नहीं जानता की इस खुशी को कैसे व्यक्त करना चाहिए लेकिन इतना जानता हूँ कि आज़ादी मिली है

मेरा देश अब और अच्छे से जीयेगा क्योकि घर बनाने वाली अब देश बनाएंगी

क्या कहूँ -----


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी टिप्पणी के लिए आपका आभार.... .समाज में बदलाव जरुरी हैं.....वैसे उन पुरुषों के संख्या बेहद कम हैं जो महिला बिल के पास हो जाने पर दिल से प्रसन्न हैं..और आप उन में से एक हैं...(राजनेतायों के बारे कुछ नही कहा जा सकता...)...डिम्पल

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