अडानी डिमांड' से साय सरकार के हाथ-पांव फूले!
क्या कॉरपोरेट दबाव और जन-आक्रोश के बीच फंस गई है छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार? राजस्थान को जरूरत नहीं, फिर भी 'मध्य भारत के फेफड़े' पर क्यों चल रही है कुल्हाड़ी? एकInside रिपोर्ट।
छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य के जंगलों को बचाने की जंग एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। एक तरफ जहां हसदेव अरण्य में राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के नाम पर संचालित होने वाली तीसरी खदान 'केते एक्सटेंशन' (Kete Extension) को गुपचुप तरीके से मंजूरी मिलने के बाद स्थानीय आदिवासियों और पर्यावरणविदों ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है , वहीं दूसरी तरफ कॉरपोरेट दिग्गज अडानी समूह की एक नई और गुप्त फरमाइश ने राज्य की विष्णुदेव साय सरकार की रातों की नींद उड़ा दी है ।
उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, अडानी पावर लिमिटेड और अडानी एंटरप्राइजेज केमिकल ने छत्तीसगढ़ सरकार को पत्र लिखकर सरगुजा क्षेत्र में भारी-भरकम जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर (बिजली-पानी) की मांग की है । इस मांग ने सरकार के भीतर एक ऐसा राजनीतिक असमंजस पैदा कर दिया है कि मामले को सुलझाने के लिए सीधे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप की जरूरत महसूस की जा रही है ।
पेंच नंबर 1: जब राजस्थान को कोयले की जरूरत ही नहीं, तो हसदेव का विनाश क्यों?
इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू 'सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी' (CEA) के संशोधित आंकड़े हैं । सरकारी दावों में बार-बार कहा जाता है कि राजस्थान के पावर प्लांटों को चालू रखने के लिए हसदेव का कोयला अनिवार्य है। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है:
1. सरप्लस बिजली का सच: CEA के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025-26 से 2035-36 के बीच राजस्थान की बिजली मांग के पुराने अनुमान (20,000 मेगावाट) को घटाकर अब 16,000 मेगावाट कर दिया गया है । इसके साथ ही, राजस्थान के पास वर्तमान में 840 मेगावाट सरप्लस (अतिरिक्त) बिजली मौजूद है ।
2. सौर ऊर्जा की क्रांति: राजस्थान खुद सौर ऊर्जा (Solar Energy) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहा है, जहां अकेले 32,000 मेगावाट की सौर परियोजनाएं कतार में हैं ।
3. सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा: खुद पूर्ववर्ती सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर स्वीकार किया था कि राजस्थान की अगले 20 वर्षों की कोयला जरूरत अकेले 'परसा केते बासेन' (PKB) ब्लॉक से पूरी हो सकती है ।
बड़ा सवाल: जब राजस्थान को अतिरिक्त कोयले की आवश्यकता ही नहीं है, तो हसदेव के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील (Ecologically Sensitive) क्षेत्र को क्यों उजाड़ा जा रहा है?
पेंच नंबर 2: 'लेजेंड' के नाम पर खुद के पावर प्लांटों को फायदा पहुंचाने का खेल?
ग्राउंड रिपोर्ट और स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि हसदेव से निकलने वाले कोयले का इस्तेमाल राजस्थान के लिए कम और अडानी समूह के निजी थर्मल पावर प्लांटों (रायपुर, कोरबा और रायगढ़ स्थित प्लांट) के लिए ज्यादा किया जा रहा है । बिलासपुर-सरगुजा हाईवे पर चौबीसों घंटे बाय-रोड ट्रकों के माध्यम से भारी मात्रा में कोयला निजी प्लांटों की तरफ डंप किया जा रहा है । 'केते एक्सटेंशन' की तीसरी खदान को मिली मंजूरी को इसी बड़ी क्रोनी-कैपिटलिज्म (Crony Capitalism) की साजिश का हिस्सा माना जा रहा है ।
पर्यावरणीय तबाही: 'रेगिस्तान' बनने की कगार पर छत्तीसगढ़
हसदेव का जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि पूरे मध्य भारत का 'फेफड़ा' (Lung of Central India) है । अब तक दो खदानों के चक्कर में 10,000 एकड़ जंगल तबाह हो चुका है और करीब 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं ।
तीसरी मंजूरी (केते एक्सटेंशन) का सच:
घना जंगल: इस प्रस्तावित ब्लॉक का 98% इलाका बेहद घना जंगल है ।
पेड़ों की बलि: स्थानीय संघर्ष समितियों के मुताबिक, इस तीसरे ब्लॉक के खुलने से 5 लाख से अधिक पेड़ और साफ कर दिए जाएंगे ।
विलुप्ति का खतरा: 'भारतीय वन्यजीव संस्थान' (WII) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यहां खनन से मिनीमाता हसदेव बांगो बांध का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा , जिससे छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था चरमरा जाएगी।
मानव-हाथी संघर्ष: हाथियों के 2000 वर्ग किमी के प्राकृतिक कॉरिडोर और हाथी रिजर्व के बीच खनन होने से हाथियों का गुस्सा अब सीधे इंसानी बस्तियों पर फूटेगा ।
आदिवासियों पर चोट: स्थानीय आदिवासियों की 70% आजीविका इसी जंगल पर निर्भर है, जो अब पूरी तरह उजड़ जाएगी ।
पेंच नंबर 3: बस्तर से डरकर सरगुजा में 'जमीन की नई डिमांड'
इस पूरे विवाद के बीच 'इनसाइड स्टोरी' यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर उद्योगपतियों (जिंदल, मित्तल आदि) को आमंत्रित किया है । अडानी समूह को बस्तर में पहले ही लौह अयस्क (Iron Ore) की एक खदान आवंटित है, लेकिन पिछले 8 महीनों से वहां काम ठप है क्योंकि 150 से अधिक गांवों के आदिवासी इसका उग्र विरोध कर रहे हैं ।
नक्सलवाद और जन-विरोध के डर से अब अडानी समूह ने अपना रुख बदलते हुए सरगुजा क्षेत्र में ऊर्जा व केमिकल सेक्टर के लिए नई जमीन मांग ली है।
राजनीतिक गलियारों में हड़कंप: आगे कुआं, पीछे खाई
सूत्रों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की एक दमदार मंत्री ने इस विषय पर प्रदेश प्रभारी नितिन नवीन से भी चर्चा की है । सरकार के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है:
अगर अडानी की मांग मानी: तो आदिवासियों का आक्रोश इस कदर भड़केगा कि साय सरकार के लिए अगला विधानसभा चुनाव जीतना नामुमकिन हो जाएगा। छत्तीसगढ़ पहले ही अभूतपूर्व गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग) और जल संकट से जूझ रहा है , ऐसे में और जंगल काटना आत्मघाती होगा।
अगर मांग ठुकराई: तो दिल्ली दरबार (मोदी-शाह) की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है ।
क्लाइमेक्स (आगे क्या?):
आगामी 19-20 तारीख को बस्तर में होने वाली 'मध्य क्षेत्रीय बैठक' में देश के गृह मंत्री अमित शाह शामिल होने आ रहे हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक के इतर साय सरकार के शीर्ष नेता इस 'कॉरपोरेट डिमांड' और 'हसदेव विवाद' पर बीच का रास्ता निकालने के लिए अमित शाह के सामने अपनी बात रख सकते हैं ।
क्या छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार छत्तीसगढ़ के जल, जंगल और जमीन की रक्षा कर पाएगी या कॉरपोरेट दबाव के आगे नतमस्तक होना पड़ेगा? यह आने वाला वक्त तय करेगा।
सदन के संकल्प का क्या हुआ?
याद रहे कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा में सभी 90 विधायकों (भाजपा और कांग्रेस दोनों) ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर हसदेव के सभी कोयला ब्लॉकों को निरस्त करने का संकल्प लिया था । तत्कालीन सरकार ने इसी आधार पर केते एक्सटेंशन की जनसुनवाई और भूमि अधिग्रहण को रोका था । लेकिन सत्ता बदलते ही उसी संकल्प को ठंडे बस्ते में डालकर तीसरी खदान को हरी झंडी दे दी गई । यहाँ तक कि अनुसूचित जनजाति आयोग के कड़े तेवरों और फर्जी जनसुनवाई की शिकायतों को भी दरकिनार कर दिया गया है!
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