छत्तीसगढ़ बीजेपी में छिड़ी अंदरूनी महाभारत, 'अनुशासन का बुलडोज़र' हुआ पंचर!
रायपुर: छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों पर्दे के पीछे एक ऐसी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है, जिसने रायपुर से लेकर दिल्ली दरबार तक हलचल मचा दी है। कल तक जो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 'ऑल इज वेल' और 'अनुशासन का डंडा' होने का दम भरती थी, आज उसी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और गुटबाजी की खबरें बाहर आने लगी हैं। छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार को बैठे लगभग ढाई साल हो चुके हैं, और इस समय सबसे बड़ा मुद्दा कैबिनेट में फेरबदल और मंत्रियों के परफॉर्मेंस का बना हुआ है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय चाहते हैं कि मंत्रिमंडल में फेरबदल हो ताकि वे अपने चहेते विधायकों को जगह दे सकें और खराब परफॉर्मेंस या संगठन विरोधी सुर अपनाने वाले मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा सकें, क्योंकि अगले ढाई साल बाद राज्य में चुनाव होने हैं। हालांकि, दिल्ली दरबार से फिलहाल इस फेरबदल को हरी झंडी नहीं मिली है और कहा गया है—"अभी रुको, देखते हैं।" ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी-शाह का रसूख भी राज्य के दिग्गज नेताओं के आगे बौना साबित हो रहा है?
बंद कमरे की 'इनसाइड स्टोरी': पाँच दिग्गजों ने फंसाया पेंच
राजनीतिक गलियारों और बंद कमरों से आ रही खबरों के मुताबिक, राज्य के आधा दर्जन दिग्गज नेताओं के तेवरों ने इस फेरबदल के पहियों पर ब्रेक लगा दिया है। आइए जानते हैं कि इन दिग्गज नेताओं के रुख ने कैसे इस पूरी कवायद को रोक दिया:
1. रामविचार नेताम और रेणुका सिंह (सरगुजा का आदिवासी असंतोष):
हाल ही में हुई बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक में भारी फेरबदल किया गया, जिससे दिग्गज आदिवासी नेता रामविचार नेताम को कोर ग्रुप से हटा दिया गया। सरगुजा क्षेत्र में आदिवासियों के बीच गहरा प्रभाव रखने वाले नेताम इस फैसले से बेहद खफा हैं और उन्होंने अपनी नाराजगी केंद्रीय नेतृत्व के सामने दर्ज कराई है। दूसरी तरफ, पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ विधायक रेणुका सिंह के तेवर भी तीखे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक कथित ऑडियो (जिसकी पुष्टि आधिकारिक तौर पर नहीं है) को लेकर विपक्ष भी हमलावर है और कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता खुद मान रहे हैं कि यह सरकार दिल्ली के रिमोट कंट्रोल से चल रही है।
2. विजय शर्मा (गृह मंत्रालय छोड़ने को तैयार नहीं):
मंत्रिमंडल की संभावित बदलाव सूची में सबसे पहला नाम गृह मंत्री विजय शर्मा का चल रहा था। राज्य, विशेषकर राजधानी रायपुर में लगातार बढ़ती चाकूबाजी, तलवारबाजी, लूट और बमबारी जैसी घटनाओं के कारण कानून-व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। चर्चा थी कि उन्हें मंत्री पद से हटाकर बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नई जिम्मेदारी देकर दिल्ली शिफ्ट किया जाएगा। लेकिन अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, विजय शर्मा दिल्ली जाने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं और वे न केवल राज्य की राजनीति में बने रहना चाहते हैं, बल्कि गृह मंत्रालय भी छोड़ने को राजी नहीं हैं।
3. ओपी चौधरी और सीएम के बीच अनबन की सुगबुगाहट:
मंत्रिमंडल फेरबदल की इस रेस में ओपी चौधरी काफी सक्रिय नजर आ रहे थे। कहा जा रहा है कि उन्होंने जो फेरबदल की सूची थमाई थी, उसमें कुछ ऐसे नाम शामिल थे जो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के बेहद करीबी मंत्रियों के थे। इसी बात को लेकर मुख्यमंत्री और चौधरी के बीच अनबन या खींचतान की स्थिति पैदा हुई। बताया जा रहा है कि इस फेरबदल के तरीके से ओपी चौधरी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।
4. अरुण साव (साहू समाज और विभागीय खींचतान):
डिप्टी सीएम अरुण साव को लेकर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। लोक निर्माण जैसे अहम विभागों में कथित तौर पर मची 'लूट-खसोट' के कारण उनका विभाग बदलने की चर्चा जोरों पर थी। वहीं, पार्टी के कुछ अन्य नेता और 'सुपर सीएम' कहे जाने वाले चेहरे चाहते हैं कि साव को मंत्रिमंडल से ही बाहर कर दिया जाए, ताकि वे स्वयं राज्य की पिछड़े वर्ग (साहू समाज) की राजनीति का नेतृत्व कर सकें। हालांकि, अरुण साव के प्रभारी नितिन नवीन के साथ अच्छे संबंधों के कारण फिलहाल मामला टल गया है।
दिल्ली में मंत्रियों की 'करतूतों' का पहुंचा पुलिंदा
इस पूरे खेल की शुरुआत बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक से हुई थी। दिल्ली से आए केंद्रीय नेताओं के सामने कई मंत्रियों की कार्यप्रणाली, उनके ओएसडी (OSD) और विशेष सहायकों के भ्रष्टाचार व मनमानी की शिकायतों का पुलिंदा रखा गया। कार्यकर्ताओं का यह गुस्सा देखकर केंद्रीय नेताओं ने आश्वासन दिया था कि, "आपकी शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा, लेकिन फिलहाल आप व्यक्ति विशेष के बजाय पार्टी के लिए काम करें। अगर सत्ता हाथ से चली गई तो कुछ नहीं बचेगा।"
पार्टी के 'अनुशासन' पर खड़े हुए बड़े सवाल
मंत्रिमंडल के इस फेरबदल के टलने और अंदरूनी कलह के सतह पर आने के बाद अब संगठन की एकजुटता और अनुशासन की पोल खुलती नजर आ रही है। केंद्रीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री साय के फैसलों को जिस तरह से सूबे के दिग्गज नेताओं ने चुनौती दी है, उससे आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर की रार और बढ़ने की आशंका है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली दरबार और मुख्यमंत्री साय मिलकर इस उलझे हुए राजनीतिक पेंच को कैसे सुलझाते हैं और आने वाले दिनों में ऊँट किस करवट बैठता है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें