गरीबों के निवाले पर डकैती, विधानसभा जांच समिति की रिपोर्ट में सनसनीखेज खुलासे!
216 करोड़ के पीडीएस घोटाले में मंत्रालय से लेकर जिलों तक बैठे दो दर्जन से अधिक अफसरों पर गिरेगी गाज; FIR और जेल भेजने की सिफारिश
छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए बहुचर्चित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) घोटाले को लेकर विधानसभा की पांच सदस्यीय विशेष जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया है। सूत्रों से मिली बेहद चौंकाने वाली जानकारी के मुताबिक, इस जांच रिपोर्ट में मंत्रालय से लेकर खाद्य विभाग के शीर्ष और मैदानी स्तर के दो दर्जन से अधिक अधिकारियों (IAS से लेकर जिला खाद्य अधिकारियों तक) की सीधी संलिप्तता पाई गई है। समिति ने न केवल इन भ्रष्ट अफसरों को चिन्हित किया है, बल्कि उनके खिलाफ तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज कर जेल भेजने की सख्त सिफारिश भी कर दी है। आगामी मानसून सत्र में इस रिपोर्ट के सदन के पटल पर रखे जाते ही प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक दीर्घाओं में बड़ा भूचाल आना तय माना जा रहा है।
600 करोड़ का आरोप, सरकार ने माना 216 करोड़ का घपला
चुनाव से पूर्व वर्तमान सत्ताधारी दल ने इस घोटाले को करीब 600 करोड़ रुपये का बताते हुए सड़क से लेकर सदन तक बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। सत्ता परिवर्तन के बाद जब इस मामले में सुगबुगाहट तेज हुई, तो विधानसभा के भीतर खुद सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी ही सरकार के खाद्य मंत्री दयालदास बघेल को कटघरे में खड़ा कर दिया था। भारी हंगामे और तीखे सवालों के बाद खाद्य मंत्री ने सदन में स्वीकार किया कि प्रारंभिक जांच के अनुसार यह घोटाला 216 करोड़ रुपये का है। इसी के बाद मामले की तह तक जाने के लिए अजय चंद्राकर और पुन्नूलाल मोहिले जैसे वरिष्ठ विधायकों की सदस्यता वाली एक उच्च स्तरीय 5 सदस्यीय विधानसभा जांच समिति का गठन किया गया था।
'वसूली एजेंट' के जरिए चलता था सिंडिकेट, नियमों की उड़ी धज्जियां
सूत्रों के अनुसार, जांच समिति के सामने यह तथ्य भी आया है कि इस पूरे खेल को अंजाम देने के लिए पूर्ववर्ती कार्यकाल में एक विशेष 'वसूली एजेंट' सक्रिय था। इसी एजेंट और विभागीय अफसरों के गठजोड़ से यह तय होता था कि किस राशन दुकान को निलंबित करना है और किस चहेती समिति या सोसाइटी को उसका अतिरिक्त प्रभार सौंपना है।
नियमों के मुताबिक एक सोसाइटी को सीमित दुकानें ही दी जा सकती हैं, लेकिन दुर्ग सहित कई जिलों में विभागीय सांठगांठ के चलते एक-एक सोसाइटी को दर्जन भर से अधिक दुकानों का प्रभार सौंपकर मलाई काटी जा रही थी। वहीं सरगुजा संभाग से भी बेहद गंभीर शिकायतें मिली हैं, जहां आदिवासियों के नाम पर आरक्षित राशन दुकानों को नियमों को ताक पर रखकर गैर-आदिवासियों को आवंटित कर दिया गया।
करप्ट अफसर अब भी मलाईदार पदों पर, मानसून सत्र में बढ़ेगी खाद्य मंत्री की परीक्षा
इस पूरे मामले का सबसे स्याह पहलू यह है कि जिन अधिकारियों पर इस 216 करोड़ रुपये की 'डकैती' में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं, वे आज भी मंत्रालय और विभाग के बेहद महत्वपूर्ण व मलाईदार पदों पर जमे हुए हैं। जांच में 'जायसवाल' सरनेम वाले एक प्रभावशाली अधिकारी सहित कई विभागीय चेहरों की भूमिका को पूरी तरह बेनकाब किया गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या वर्तमान विष्णुदेव साय सरकार और खाद्य मंत्री दयालदास बघेल अपनी ही समिति की इस सिफारिश पर कड़ा एक्शन लेते हुए इन रसूखदार अफसरों को जेल का रास्ता दिखाएंगे? या फिर अतीत के अन्य मामलों (जैसे रमन शासनकाल के दौरान 'मडूम बांध' को अनुपयोगी बताकर एक निजी पावर कंपनी को बेचने और बाद में उस कंपनी द्वारा उसे आगे बेचने के खेल) की तरह इस बेहद संवेदनशील जांच रिपोर्ट को भी ठंडे बस्ते में या लीपापोती की भेंट चढ़ा दिया जाएगा? प्रदेश के लाखों गरीब परिवारों की निगाहें अब आगामी मानसून सत्र और सरकार के फैसले पर टिकी हैं।
इस खोजी रिपोर्ट के अगले अंक में हम विधानसभा समिति द्वारा चिन्हित किए गए उन दो दर्जन अफसरों के नामों का सिलसिलेवार खुलासा करेंगे जिनकी वजह से गरीबों के थाली का चावल बाजार में बिका।
