छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट: करोड़ों का बजट और सत्ता का खेल
छत्तीसगढ़ में 'हम ही बनाया है, हम ही संवारेंगे' के गूंजते नारों के बीच देश का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षा विभाग की एक ऐसी कड़वी और स्याह हकीकत सामने आई है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य संवारने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वे खुद भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर दलदल में धंसे हुए हैं। शिक्षा विभाग के भीतर 40 से अधिक ऐसे 'दागी' अफसर मलाईदार पदों पर कुंडली मारकर बैठे हैं, जिन्हें कायदे से सलाखों के पीछे या सस्पेंशन लिस्ट में होना चाहिए था।
करोड़ों रुपए के भारी-भरकम बजट वाले इस सबसे महत्वपूर्ण विभाग को दीमक की तरह चाट रहे इन चेहरों और सत्ता के बीच की गलबहियां अब खुलकर उजागर होने लगी हैं।
युक्ति-युक्तकरण के नाम पर स्कूलों पर ताले, बेटियों की सुरक्षा दांव पर
[00:59] छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार पर सवाल तब से ही उठने शुरू हो गए थे, जब 57 हजार शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया को अटका दिया गया। इसके बाद विभाग ने 'युक्ति-युक्तकरण' (Rationalization) के नाम पर राज्य भर में हजारों सरकारी स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने का फरमान सुना दिया।
गरियाबंद का कन्याशाला विवाद [01:18]: गरियाबंद में 1965 से संचालित हो रहे एक नामी गर्ल्स स्कूल को बंद कर जब दूसरे को-एड स्कूल (ठाकुर दलगंजन स्कूल) में मर्ज करने का प्रयास किया गया, तो छात्राओं और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा। छात्राओं ने स्कूल में ताला जड़कर उग्र प्रदर्शन किया।
असुरक्षित माहौल और बदहाली [02:14]: छात्राओं और परिजनों का सीधा आरोप है कि जिस स्कूल में उन्हें भेजा जा रहा है, वहां न तो पढ़ाई का स्तर अच्छा है, न ही वहां का माहौल बेटियों के लिए सेफ है। बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय तक बदहाल हैं। इस तुगलकी नीति के कारण 40 से 50 छात्राएं टीसी (Transfer Certificate) लेकर स्कूल छोड़ने को मजबूर हो गईं।
बिलासपुर में आदिवासियों पर मार [03:15]: बिलासपुर संभाग में भी इसी अविवेकपूर्ण नीति के चलते पंडो जनजाति के मासूम बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए 7 से 8 किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। थक-हारकर कई गरीब आदिवासियों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया है।
40 घोटाले, ठंडे बस्ते में जांच और सत्ता का संरक्षण
[04:35] एक तरफ समय पर बच्चों को न तो कॉपी-किताबें मिल पा रही हैं और न ही स्कूल ड्रेस, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों के बजट को ठिकाने लगाने वाले 40 दागी चेहरों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार उन्हें अपनी गोद में बिठाए हुए है। इन अफसरों पर भ्रष्टाचार से लेकर कुकर्मों तक के गंभीर मामले दर्ज हैं, लेकिन नेताओं और नौकरशाहों का नेक्सेस इतना मजबूत है कि तमाम जांचें ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं।
[05:42] सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस सिंडिकेट की पहुंच और ठसक सीधे सत्ता के शीर्ष तक है। वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और यहां तक कि स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास भी कुछ समय के लिए यह विभाग रहा, लेकिन इन दागियों का बाल भी बांका नहीं हो सका। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि इनमें से कई अफसरों को सुचिता और संस्कारों की बात करने वाले 'संघ' (RSS) का भी आंतरिक समर्थन प्राप्त है, जिसके दम पर ये मलाईदार कुर्सियों का आनंद ले रहे हैं।
सलाखों के बजाय मलाईदार पदों पर ताजपोशी
[07:54] जिन अधिकारियों की जगह जेल की कोठरी में होनी चाहिए थी, वे आज प्रदेश की पूरी शिक्षा व्यवस्था की नीतियां तय कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भविष्य के साथ हो रहे इस बड़े खिलवाड़ को लेकर अब विपक्ष और आम जनता में भारी आक्रोश है। यह 40 चेहरों का सिंडिकेट महज़ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय और नीतिगत घोटाला है।
अगर सरकार की नीयत वाकई साफ है, तो उसे तुरंत इन 40 दागी अफसरों की सूची पर संज्ञान लेते हुए इन्हें निलंबित करना चाहिए और बंद किए गए स्कूलों को दोबारा खोलना चाहिए। अन्यथा, छत्तीसगढ़ का भविष्य संवरने के बजाय इन दागियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा।

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