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बुधवार, 15 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ में 'तालमेल' की पटरी से उतरी सरकार!



 यूरोक्रेसी का 'रिमोट कंट्रोल' या मंत्रियों की लाचारी? छत्तीसगढ़ में 'तालमेल' की पटरी से उतरी सरकार!

2. 2 साल, आधा दर्जन कमिश्नर: छत्तीसगढ़ चिकित्सा शिक्षा (Medical Education) विभाग बना अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर'।

3. सुशासन का दावा बनाम '2005 बैच' का दबदबा: फाइलों की खींचतान में पिस रही छत्तीसगढ़ की जनता।


छत्तीसगढ़ में सुशासन (Sushasan) और 'डबल इंजन' रफ्तार का दावा क्या सिर्फ कागजी है? राज्य के गलियारों से छनकर आ रही खबरें और लगातार हो रहे प्रशासनिक फेरबदल कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। मंत्रियों और उनके विभागों के आला अधिकारियों (सचिवों/आयुक्तों) के बीच पटरी न बैठने से न केवल विकास कार्य ठप हैं, बल्कि महत्वपूर्ण विभाग प्रशासनिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं। इसका सबसे ताजा और हैरान करने वाला उदाहरण प्रदेश का चिकित्सा शिक्षा विभाग (Medical Education Department) है, जहां पिछले दो सालों में करीब आधा दर्जन आयुक्त (Commissioners) बदले जा चुके हैं।


1. चिकित्सा शिक्षा विभाग में अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर':

 मुद्दा: चिकित्सा शिक्षा विभाग जैसी महत्वपूर्ण रीढ़, जो डॉक्टरों के निर्माण और मेडिकल कॉलेजों के टेंडर व संचालन की कमान संभालती है, वहां अफसरों के टिकने की मियाद कुछ महीने ही रह गई है।

 इतिहास और वर्तमान: भूपेश सरकार के समय इस विभाग को सुचारू बनाने के लिए चिकित्सा शिक्षा आयुक्त (Medical Education Commissioner) के पद का सृजन हुआ था। पहली कमिश्नर नम्रता गांधी (31 जनवरी 2024) बनीं। तब से लेकर अब तक अब्दुल कैसर, जेपी मौर्य, जेपी पाठक, चंदन कुमार, किरण कौशल और रितेश अग्रवाल जैसे कई अधिकारियों के पास यह जिम्मेदारी आई और गई।

 खोजी सवाल: क्या चिकित्सा शिक्षा आयुक्त का पद इतना 'मलाईदार' या दबाव वाला है कि किसी भी अधिकारी की पटरी मंत्री या सचिव के साथ लंबे समय तक नहीं बैठ पा रही? बार-बार अधिकारियों के बदलने से मेडिकल कॉलेजों के टेंडर और स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।

2. मंत्रियों बनाम सचिवों की जंग (Who is the Boss?):

 अधिकारियों का दबदबा: राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि छत्तीसगढ़ सरकार को मंत्री नहीं बल्कि अफसर चला रहे हैं। विशेषकर '2005 बैच' के चुनिंदा आईएएस अधिकारियों के दबदबे को लेकर खुद सत्ताधारी दल के भीतर असंतोष सुलग रहा है।

 सीएम सचिवालय बनाम अन्य विभाग: मुख्यमंत्री के सचिवालय (विशेषकर राहुल भगत) और वित्त विभाग (ओपी चौधरी) के निर्णयों और अन्य मंत्रियों के बीच का नीतिगत तालमेल कमजोर दिख रहा है।

 विवाद के चेहरे: चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और विभाग के सचिव अमित कटारिया (जो कभी पीएम के सामने चश्मा पहनने और अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहे) के बीच के प्रशासनिक तालमेल पर भी सवाल उठ रहे हैं।

3. जनता पर सीधा असर: इलाज महंगा, जांच के नाम पर 'लूट':

 सरकारी अस्पतालों में जहां एमआरआई (MRI) और सीटी स्कैन (CT Scan) जैसी सुविधाएं मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर होनी चाहिए, वहां कथित तौर पर प्राइवेट अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के लिए भारी शुल्क वसूला जा रहा है।

 आयुष्मान कार्ड (Ayushman Card) और जन आरोग्य जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर दम तोड़ रही हैं। इसी का नतीजा है कि मुख्य विपक्षी दल अब स्वास्थ्य मंत्री के बंगले के घेराव की रणनीति बना रहा है।

4. पुराना चिकित्सा उपकरण घोटाला और अधूरी कार्रवाई:

 पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने चिकित्सा उपकरणों की खरीदी में करोड़ों के कथित घोटाले की शिकायत पीएमओ, ईडी और सीबीआई से की थी।

 इस शिकायत के बाद हालांकि कुछ कार्रवाई हुई और आधा दर्जन अधिकारियों पर गाज गिरी, लेकिन कई दागी चेहरे आज भी अन्य महत्वपूर्ण विभागों में जमे हुए हैं, जो सुशासन के दावों पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

प्रिंट मीडिया के लिए कुछ विशेष इनपुट्स (आपकी जानकारी के लिए अतिरिक्त तथ्य):

यदि आप इस पर ग्राउंड रिपोर्टिंग या फॉलो-अप करना चाहते हैं, तो इन बिंदुओं को अपनी जांच का हिस्सा बना सकते हैं:

1. फाइलों का 'गो-स्लो' मूवमेंट: मंत्रालय (महानदी भवन) से डेटा निकालें कि पिछले 6 महीनों में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग की कितनी महत्वपूर्ण फाइलें मंत्रियों और सचिवों की 'सहमति/असहमतियों' के फेर में अटकी रहीं।

2. मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचे की कमी: अंबिकापुर, जगदलपुर या रायपुर (मेकाहारा) जैसे प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में नई मशीनों की खरीदी के टेंडरों की स्थिति क्या है? क्या आयुक्तों के बार-बार बदलने से टेंडर प्रक्रिया अटकी पड़ी है?

3. अन्य विभागों में भी यही हाल: सिर्फ चिकित्सा शिक्षा ही नहीं, बल्कि कई अन्य तकनीकी विभागों (जैसे पीएचई, माइनिंग और वन विभाग) में भी मंत्रियों और उनके मातहत आईएएस अधिकारियों के बीच फाइलों के नोटिंग्स पर खींचतान चल रही है, जिसे आप इस रिपोर्ट में 'बॉक्स आइटम' के रूप में जोड़ सकते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

यह स्टोरी न केवल छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के भीतर मचे घमासान को उजागर करेगी, बल्कि सुशासन और जीरो टॉलरेंस के नारों के पीछे छिपी जमीनी हकीकत को भी पाठकों के सामने रखेगी। प्रिंट मीडिया में खोजी पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह एक बेहद दमदार और जन-सरोकार से जुड़ी रिपोर्ट साबित हो सकती है।

वीडियो देखें 

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट

 छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट: करोड़ों का बजट और सत्ता का खेल 


 छत्तीसगढ़ में 'हम ही बनाया है, हम ही संवारेंगे' के गूंजते नारों के बीच देश का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षा विभाग की एक ऐसी कड़वी और स्याह हकीकत सामने आई है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य संवारने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वे खुद भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर दलदल में धंसे हुए हैं। शिक्षा विभाग के भीतर 40 से अधिक ऐसे 'दागी' अफसर मलाईदार पदों पर कुंडली मारकर बैठे हैं, जिन्हें कायदे से सलाखों के पीछे या सस्पेंशन लिस्ट में होना चाहिए था।

करोड़ों रुपए के भारी-भरकम बजट वाले इस सबसे महत्वपूर्ण विभाग को दीमक की तरह चाट रहे इन चेहरों और सत्ता के बीच की गलबहियां अब खुलकर उजागर होने लगी हैं।

युक्ति-युक्तकरण के नाम पर स्कूलों पर ताले, बेटियों की सुरक्षा दांव पर

[00:59] छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार पर सवाल तब से ही उठने शुरू हो गए थे, जब 57 हजार शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया को अटका दिया गया। इसके बाद विभाग ने 'युक्ति-युक्तकरण' (Rationalization) के नाम पर राज्य भर में हजारों सरकारी स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने का फरमान सुना दिया।

 गरियाबंद का कन्याशाला विवाद [01:18]: गरियाबंद में 1965 से संचालित हो रहे एक नामी गर्ल्स स्कूल को बंद कर जब दूसरे को-एड स्कूल (ठाकुर दलगंजन स्कूल) में मर्ज करने का प्रयास किया गया, तो छात्राओं और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा। छात्राओं ने स्कूल में ताला जड़कर उग्र प्रदर्शन किया।

 असुरक्षित माहौल और बदहाली [02:14]: छात्राओं और परिजनों का सीधा आरोप है कि जिस स्कूल में उन्हें भेजा जा रहा है, वहां न तो पढ़ाई का स्तर अच्छा है, न ही वहां का माहौल बेटियों के लिए सेफ है। बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय तक बदहाल हैं। इस तुगलकी नीति के कारण 40 से 50 छात्राएं टीसी (Transfer Certificate) लेकर स्कूल छोड़ने को मजबूर हो गईं।

 बिलासपुर में आदिवासियों पर मार [03:15]: बिलासपुर संभाग में भी इसी अविवेकपूर्ण नीति के चलते पंडो जनजाति के मासूम बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए 7 से 8 किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। थक-हारकर कई गरीब आदिवासियों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया है।

40 घोटाले, ठंडे बस्ते में जांच और सत्ता का संरक्षण

[04:35] एक तरफ समय पर बच्चों को न तो कॉपी-किताबें मिल पा रही हैं और न ही स्कूल ड्रेस, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों के बजट को ठिकाने लगाने वाले 40 दागी चेहरों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार उन्हें अपनी गोद में बिठाए हुए है। इन अफसरों पर भ्रष्टाचार से लेकर कुकर्मों तक के गंभीर मामले दर्ज हैं, लेकिन नेताओं और नौकरशाहों का नेक्सेस इतना मजबूत है कि तमाम जांचें ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं।

[05:42] सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस सिंडिकेट की पहुंच और ठसक सीधे सत्ता के शीर्ष तक है। वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और यहां तक कि स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास भी कुछ समय के लिए यह विभाग रहा, लेकिन इन दागियों का बाल भी बांका नहीं हो सका। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि इनमें से कई अफसरों को सुचिता और संस्कारों की बात करने वाले 'संघ' (RSS) का भी आंतरिक समर्थन प्राप्त है, जिसके दम पर ये मलाईदार कुर्सियों का आनंद ले रहे हैं।

सलाखों के बजाय मलाईदार पदों पर ताजपोशी

[07:54] जिन अधिकारियों की जगह जेल की कोठरी में होनी चाहिए थी, वे आज प्रदेश की पूरी शिक्षा व्यवस्था की नीतियां तय कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भविष्य के साथ हो रहे इस बड़े खिलवाड़ को लेकर अब विपक्ष और आम जनता में भारी आक्रोश है। यह 40 चेहरों का सिंडिकेट महज़ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय और नीतिगत घोटाला है।

अगर सरकार की नीयत वाकई साफ है, तो उसे तुरंत इन 40 दागी अफसरों की सूची पर संज्ञान लेते हुए इन्हें निलंबित करना चाहिए और बंद किए गए स्कूलों को दोबारा खोलना चाहिए। अन्यथा, छत्तीसगढ़ का भविष्य संवरने के बजाय इन दागियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा।

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