शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

सरकारी राशन की 'कस्टम मिलिंग' में अंतरराज्यीय सिंडिकेट

 सरकारी राशन की 'कस्टम मिलिंग' में अंतरराज्यीय सिंडिकेट; छत्तीसगढ़ का धान, ओडिशा में खेल!


गरीबों के निवाले और किसानों के पसीने की कमाई पर डाका डालने वाला एक बहुत बड़ा अंतरराज्यीय सिंडिकेट इस समय सक्रिय है। सरकारी खरीद के धान की 'कस्टम मिलिंग' (Custom Milling) के नाम पर नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे किए जा रहे हैं। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह फासला किसी तकनीकी चूक का नतीजा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी प्रशासनिक और व्यापारिक साठगांठ का हिस्सा है। इस पूरे खेल का केंद्र बिंदु है—छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती इलाका और पड़ोसी राज्य ओडिशा।

क्या है पूरा मामला?

सरकार किसानों से समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी करती है। इस धान को चावल में बदलने के लिए राइस मिलर्स को दिया जाता है, जिसे 'कस्टम मिलिंग' कहते हैं। नियम के मुताबिक, मिलर्स को तय समय सीमा के भीतर धान का उठाव करके, उसकी मिलिंग कर चावल सरकारी गोदामों या मार्कफेड (MARKFED) को सौंपना होता है। लेकिन धरातल पर कहानी पूरी तरह बदली हुई है।

जांच में यह बात सामने आई है कि छत्तीसगढ़ के बंपर धान उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा मिलिंग के तय नियमों का उल्लंघन करते हुए अवैध तरीके से सीमा पार ओडिशा भेजा जा रहा है। वहां इस धान को खपाने और कागजी हेरफेर करने का एक समानांतर नेटवर्क चल रहा है।

मार्कफेड (MARKFED) की सुस्ती और प्रशासनिक साठगांठ पर सवाल

इस पूरे घालमेल में सबसे बड़ी उंगली नोडल एजेंसियों और मार्कफेड के कामकाज पर उठती है। करोड़ों रुपये के धान के परिवहन और मिलिंग की निगरानी करने वाली व्यवस्था ने आख़िरकार अपनी आँखें क्यों मूंद रखी हैं?

1. परिवहन में हेरफेर: बिना वैध परमिट या बोगस दस्तावेजों के सहारे धान की बोरियों से लदे ट्रक अंतरराज्यीय सीमाओं को पार कर रहे हैं।

2. कागजी मिलिंग (Paper Milling): कई मामलों में संदेह है कि धान का भौतिक रूप से उठाव और मिलिंग केवल रजिस्टरों में दर्ज है, जबकि वास्तविक स्टॉक को खुले बाजार में या ऊंचे दामों पर ठिकाने लगाया जा रहा है।

3. लापरवाही या शह?: जब छत्तीसगढ़ के गोदामों और सोसायटियों से धान का उठाव समय पर नहीं होता, तो वह सड़ने की कगार पर पहुंच जाता है। इसी 'सड़न' और 'शॉर्टेज' की आड़ में इस अवैध परिवहन को छुपाया जाता है।

ओडिशा कनेक्शन: सीमाओं के पार रची जा रही साजिश

छत्तीसगढ़ से सटे ओडिशा के सीमावर्ती जिलों के राइस मिलर्स और बिचौलियों की भूमिका इसमें सबसे संदिग्ध है। छत्तीसगढ़ के कोटे का धान ओडिशा के मिलों में पहुंच रहा है, जहां इसे स्थानीय बताकर या री-साइकलिंग के जरिए सरकारी सिस्टम में वापस धकेल दिया जाता है। इस प्रक्रिया से न केवल छत्तीसगढ़ सरकार के राजस्व को चपत लग रही है, बल्कि केंद्र सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को भी सीधे तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।

नुकसान किसका?

 आम जनता और टैक्सपेयर: सरकार जो सब्सिडी और प्रोत्साहन राशि मिलर्स और परिवहनकर्ताओं को देती है, वह सीधे तौर पर जनता के टैक्स का पैसा है। इस घोटाले से सरकारी खजाने को सीधे करोड़ों का नुकसान हो रहा है।

 छोटे किसान: जहां एक तरफ वास्तविक किसान अपने दाने-दाने के भुगतान के लिए कतारों में खड़ा रहता है, वहीं बिचौलियों का यह सिंडिकेट रातों-रात अमीर हो रहा है।

निष्कर्ष और कड़े कदम उठाने की जरूरत

'कस्टम मिलिंग' के इस अंतरराज्यीय खेल को रोकने के लिए केवल कागजी कार्रवाई काफी नहीं है। इसके लिए दोनों राज्यों की सीमाओं पर कड़े चेकपोस्ट, ट्रकों की जीपीएस (GPS) ट्रैकिंग और मार्कफेड के अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी जरूरी है। यदि इस सिंडिकेट को वक्त रहते नहीं तोड़ा गया, तो यह सरकारी राशन व्यवस्था की रीढ़ को पूरी तरह खोखला कर देगा।

यह जांच का विषय है कि इस पूरे खेल का 'मास्टरमाइंड' कौन है और राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण के बिना क्या इतना बड़ा अंतरराज्यीय नेटवर्क चलाया जाना संभव है?


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