सोमवार, 13 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ में 'DMF' फंड का अंतहीन 'खेल'

 छत्तीसगढ़ में 'DMF' फंड का अंतहीन 'खेल'


भूपेश बघेल सरकार में हुए 1200 करोड़ रुपये के घोटाले की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि अब नई सरकार में भी कोरबा से 'डीएमएफ' की बंदरबांट की कहानी सामने आ गई है। मामला अब हाईकोर्ट की चौखट पर है।

प्रवेशिका (Intro)

"छत्तीसगढ़ की धरती सोना उगलती है, और जितना सोना यह उगलती है, उससे भी बड़ी भ्रष्टाचार की कहानियां यहाँ की हवाओं में तैरती हैं।"

प्रदेश में सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस राज्य में जनता के हक के पैसों की लूट का खेल बदस्तूर जारी रहता है। छत्तीसगढ़ में इस समय सबसे ज्यादा विवादों और चर्चाओं के केंद्र में यदि कोई विषय है, तो वह है डीएमएफ (District Mineral Foundation) फंड यानी जिला खनिज न्यास संस्थान का पैसा। जिस राशि को आदिवासियों के स्वास्थ्य, उनके बच्चों की शिक्षा, और खनन से विस्थापित हुए प्रभावित परिवारों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए खर्च किया जाना था, उसे अफसरशाही, राजनेताओं और सप्लायरों के गठजोड़ ने अपनी 'कमीशनखोरी' की तिजोरी बना लिया है।

हाईकोर्ट पहुंचा मामला: कोरबा में नया 'खेल' उजागर

हालिया विवाद छत्तीसगढ़ के प्रमुख औद्योगिक और खनन प्रभावित जिले कोरबा से सामने आया है [02:34]। कोरबा जिला खनिज प्रभावित क्षेत्रों में अग्रणी है, जहाँ सालाना लगभग 600 करोड़ रुपये का डीएमएफ फंड आता है [02:34]। नियमों के मुताबिक, इस राशि का बड़ा हिस्सा खनन प्रभावित 43 गांवों (जिनमें से 13 गांवों की स्थिति अत्यंत दयनीय और चिंताजनक है) के भू-विस्थापितों के कल्याण में लगाया जाना था [04:35]।

लेकिन धरातल पर जो काम हुए, वे इस फंड के मूल उद्देश्यों की धज्जियां उड़ाते हैं:

1. गैर-जरूरी मल्टीलेवल पार्किंग: आदिवासियों और ग्रामीणों के स्वास्थ्य-शिक्षा की अनदेखी कर करोड़ों रुपये की लागत से एक 'मल्टीलेवल पार्किंग' खड़ी कर दी गई [05:21]। आज यह पार्किंग पूरी तरह सूनी पड़ी है और इसका कोई जनोपयोगी महत्व नहीं रह गया है [05:42]।

2. सन्नाटे में डूबा कन्वेंशन हॉल: एक आलीशान कन्वेंशन हॉल बना दिया गया, जहाँ अब सिर्फ मवेशी घूमते हैं [05:57]। इसके ताले टूट रहे हैं, सामान चोरी हो रहा है [05:57]। आरोप है कि यह निर्माण केवल ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने और भारी कमीशन वसूलने के लिए किया गया था [06:07]।

3. अनावश्यक ऑडिटोरियम: पीजी कॉलेज में भारी-भरकम राशि खर्च कर ऑडिटोरियम का निर्माण किया गया [06:14], जिसका प्रभावित गरीब ग्रामीणों के बुनियादी जीवन स्तर से कोई सीधा सरोकार नहीं है।

इस पूरे मामले की गंभीर शिकायतों के बाद अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ इस पर 30 जनवरी को सुनवाई करने जा रही है, जिससे शासन-प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है [05:05]।

सक्रिय हुई जांच टीम: फाइलों को खंगालने का सिलसिला

कोरबा में हुए इस नए घोटाले की गूंज के बाद तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गई है। इस जांच दल में शामिल हैं:

 हरिशंकर चौहान (उपायुक्त) [04:12]

 स्मृति तिवारी (उपायुक्त) [04:12]

 स्मिता पांडे (लेखाधिकारी) [04:12]

यह टीम लगातार प्रभावित स्थलों का भौतिक सत्यापन कर रही है और वित्तीय दस्तावेजों व कागजातों को जब्त कर जांच को आगे बढ़ा रही है [04:12]। क्षेत्र के कद्दावर आदिवासी नेता और पूर्व गृह मंत्री नंदकीराम कंवर भी इस संबंध में आवाज उठा चुके हैं और उनकी इस मुद्दे पर तत्कालीन कलेक्टर से तीखी बहस तक हो चुकी है [03:52]।

नियमों का खेल और 'अतिथि शिक्षकों' की आड़

डॉ. रमन सिंह की तत्कालीन सरकार से लेकर वर्तमान विष्णुदेव साय की सरकार तक, समय-समय पर डीएमएफ के नियमों में बदलाव किए गए हैं [06:24]। तर्क दिया जाता है कि इन बदलावों का उद्देश्य फंड का बेहतर इस्तेमाल करना है। इसी के तहत अब डीएमएफ फंड से 'अतिथि शिक्षकों' (Guest Teachers) की भर्ती की जा रही है [06:42]।

विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम होना सराहनीय है, लेकिन जब नियमित भर्तियों के जरिए राज्य के पढ़े-लिखे युवाओं को स्थायी रोजगार देने के बजाय डीएमएफ फंड का इस्तेमाल इस तरह की अस्थाई नियुक्तियों के लिए किया जाए, तो मंशा पर सवाल उठने लाजिमी हैं [06:49]। यह व्यवस्था युवाओं को स्थायी सरकारी नौकरियों से दूर रखने का एक जरिया मात्र बनकर रह गई है [06:57]।

पुराना इतिहास: 1200 करोड़ का भूत और जेल की सलाखें

छत्तीसगढ़ में डीएमएफ घोटाले का यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछली भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल के दौरान लगभग 1200 करोड़ रुपये के डीएमएफ घोटाले का खुलासा हुआ था [01:45]।

 इस मामले में 30% से 40% तक कमीशनखोरी की बात सामने आई थी [03:23]।

 कागजों पर ही बड़ी-बड़ी सड़कें बना दी गईं, कागजों पर ही स्कूलों की पुताई और मरम्मत का काम पूरा दिखा दिया गया [03:23]।

 ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की जांच के बाद तात्कालिक चर्चित आईएएस अधिकारी रानू साहू समेत आधा दर्जन से अधिक अधिकारी और बिचौलिए आज भी जेल की सलाखों के पीछे हैं [01:55]।

सवाल यह भी उठता है कि इस पूरे घोटाले में कार्रवाई की सुई केवल आईएएस अधिकारियों के गिर्द ही क्यों घूमती है, जबकि इस पूरे सिस्टम में शामिल अन्य प्रभावशाली ताकतें अक्सर पर्दे के पीछे बची रह जाती हैं [02:15]।

चार प्रमुख जिलों पर 'गिद्ध दृष्टि'

छत्तीसगढ़ के चार प्रमुख जिले ऐसे हैं जहां सबसे ज्यादा खनिज राजस्व मिलता है और इसी अनुपात में वहां डीएमएफ का भारी-भरकम बजट भी आवंटित होता है:

1. कोरबा (सालाना लगभग 600 करोड़ रुपये) [02:34]

2. रायगढ़ [01:22]

3. दंतेवाड़ा [01:22]

4. काँकेर [01:22]

इन चारों जिलों में हर साल औसतन 500 करोड़ रुपये से अधिक का डीएमएफ फंड आता है [01:22]। इतनी भारी राशि को देखकर विभागीय अफसरों, सप्लायरों और स्थानीय राजनेताओं की 'गिद्ध दृष्टि' हमेशा इस फंड पर जमी रहती है [00:41]।

निष्कर्ष: 'धरती अमीर, लोग गरीब' का क्रूर सच

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी ने कभी नारा दिया था—"अमीर धरती के गरीब लोग" [02:54]। आज दशकों बाद भी यह नारा राज्य की कड़वी सच्चाई को बयां करता है [03:05]।

जिस खनिज न्यास निधि का गठन कोयला, लोहा और अन्य खनिज निकालने के कारण बेघर हुए आदिवासियों, प्रदूषित आबोहवा में जी रहे ग्रामीणों और कुपोषण की मार झेल रहे बच्चों के जीवन में उजाला लाने के लिए किया गया था, उसे कंक्रीट के बेजान ढांचों और कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा दिया गया। अब सबकी नजरें 30 जनवरी को हाईकोर्ट की सुनवाई और जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं [07:23]। क्या इस बार भी जांच केवल फाइलों में दफन होकर रह जाएगी या प्रभावित आदिवासियों को उनका असली हक मिल पाएगा?

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