छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग में 'हाई पैकेज' का खेल: बेहाल अस्पताल, चहेते कंसलटेंट्स पर लाखों की बारिश!
एक तरफ छत्तीसगढ़ का युवा रोजगार के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है, प्रतियोगी परीक्षाओं (व्यापम और पीएससी) की तैयारी में अपनी जवानी खपा रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग के भीतर बैकडोर और ठेका सिस्टम के जरिए अपनों को उपकृत करने का एक बड़ा खेल सामने आया है। अस्पतालों में वेंटिलेटर चलाने वाले टेक्नीशियन नहीं हैं, दवा काउंटर खाली हैं, लेकिन एयर कंडीशन कमरों में बैठने वाले चहेते कंसलटेंट्स की जेबें जनता की गाढ़ी कमाई से भरी जा रही हैं।
33 कंसलटेंट्स की रहस्यमयी तैनाती, ₹4 लाख तक मासिक वेतन
स्वास्थ्य विभाग के भीतर 'हाई पैकेज ठेका सिस्टम' के तहत 33 कंसलटेंट्स की रहस्यमयी तैनाती की गई है [00:49]। इन तथाकथित विशेषज्ञों को ₹2.5 लाख से लेकर ₹4 लाख प्रति माह तक का भारी-भरकम वेतन दिया जा रहा है [02:45]।
चौंकाने वाली बात यह है कि दिन-रात ओपीडी संभालने वाले, इमरजेंसी ड्यूटी करने वाले एक नियमित एमबीबीएस (MBBS) डॉक्टर की शुरुआती सैलरी और इन एयर कंडीशन कमरों में बैठने वाले कंसलटेंट्स की सैलरी में जमीन-आसमान का अंतर है [02:55]। इसे लेकर ईमानदारी से तैयारी करने वाले युवाओं और पैरामेडिकल स्टाफ में भारी आक्रोश है।
खेल के तीन तरीके: कैसे चुनी गई चहेतों की फौज?
बिना किसी पारदर्शी परीक्षा और ओपन विज्ञापन के बैकडोर से हुई इन नियुक्तियों के पीछे तीन मुख्य तरीके अपनाए गए हैं [01:20]:
1. मैनपावर सप्लाई और ठेका सिस्टम का मुखौटा: विभाग ने सीधे सरकारी भर्ती करने के बजाय प्राइवेट कंसलटेंसी एजेंसियों या थर्ड पार्टी वेंडर्स को ठेका दे दिया [04:16]। इन एजेंसियों की आड़ में बिना किसी मापदंड के पसंदीदा लोगों की लिस्ट तैयार कर नियुक्तियां की गईं [04:25]।
2. टेलर-मेड क्राइटेरिया (विशेषज्ञता की संदिग्ध परिभाषा): कंसलटेंट पद के लिए नियम और शर्तें इस तरह तय की गईं (टेलर-मेड), जो केवल कुछ खास लोगों की प्रोफाइल से ही मैच खाती थीं [04:54]। इसके चलते आम योग्य युवाओं को विज्ञापन का पता ही नहीं चला या वे फॉर्म ही नहीं भर पाए [05:05]।
3. बंद कमरों में 'वॉक-इन इंटरव्यू': कई जगहों पर लिखित परीक्षा के बजाय केवल बंद कमरों में 'वॉक-इन इंटरव्यू' या 'कमेटी असेसमेंट' के नाम पर खानापूर्ति की गई [05:31]। आरोप है कि रसूखदार नौकरशाहों और मंत्रियों के बंगलों की परिक्रमा करने वाले करीबियों को चुपचाप इन पदों पर बैठा दिया गया [05:41]।
जमीनी हकीकत: एक तरफ आलीशान पैकेज, दूसरी तरफ बदहाल मरीज
इस भारी-भरकम खर्च के बीच सूबे के अस्पतालों की जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक है:
बस्तर से लेकर सरगुजा और राजधानी रायपुर तक के अस्पतालों में वेंटिलेटर चलाने के लिए टेक्नीशियन नहीं हैं [01:39]।
बजट की कमी का हवाला देकर ऑपरेटरों की भर्ती नहीं की जा रही है, जिससे एक्सरे मशीनें धूल फांक रही हैं [01:58]।
गरीब मरीज स्ट्रेचर के अभाव में अपनों को कंधे पर उठाकर ले जाने को मजबूर हैं [02:10]।
सरकारी दवा काउंटरों से मरीजों को "दवा खत्म हो गई है, बाहर से ले लो" कहकर लौटा दिया जाता है [02:17]।
सीधे निशाने पर स्वास्थ्य मंत्री और सचिव
इस पूरे मामले में सीधे तौर पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं [01:20]। सवाल उठ रहे हैं कि विभागीय मुखिया की सहमति के बिना इतना बड़ा खेल कैसे संभव है? पूर्व में भी ब्लैकलिस्टेड कंपनियों को सप्लाई का काम देने और अमानक दवा सप्लाई करने वालों पर सख्त कार्रवाई न करने जैसे गंभीर आरोप विभाग पर लगते रहे हैं [06:27]।
उप-चुनावों में दिखा जनता का मूड?
इस प्रशासनिक असंतोष और कथित घोटालों का असर हाल ही में हुए स्थानीय निकाय व पंचायत उप-चुनावों में भी देखने को मिला है। कांग्रेस प्रवक्ताओं के दावों के मुताबिक, बिलासपुर, जगदलपुर और कांकेर जैसे नगर निगम वार्डों और 543 से अधिक पंचायत सीटों पर कांग्रेस समर्थित प्रत्याशियों की जीत हुई है [08:06], जिसे विपक्ष सरकार की नीतियों के खिलाफ जनता का शुरुआती जनादेश बता रहा है [08:51]।
बड़ा सवाल:
आखिर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में चहेतों को उपकृत करने का यह खेल कब तक चलता रहेगा? क्या मुख्यमंत्री इस मामले में संज्ञान लेकर किसी उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच के आदेश देंगे या युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ जारी रहेगा [06:59]?
