जनता पर आर्थिक चाबुक, उद्योगपतियों को 400 करोड़ की 'छूट'—छत्तीसगढ़ में यह कैसा डबल इंजन?
मुख्य बातें:
20 बड़े उद्योगों से जल और बिजली विभाग को वसूलने हैं 400 करोड़ से अधिक की राशि।
तेलंगाना समेत पड़ोसी राज्यों पर 2021 से बकाया है करोड़ों का भुगतान, सरकार सिर्फ कागजी चिट्ठियों में व्यस्त।
आम आदमी का एक-दो महीने का बिल बकाया होने पर काट दी जाती है लाइन; 400 यूनिट हाफ बिजली योजना बंद होने से जनता में आक्रोश।
महतारी वंदन योजना से अब तक करीब 6 लाख महिलाओं के नाम काटे जाने की चर्चा, रीपा योजना ठप होने से महिलाओं की आजीविका पर संकट।
विशेष रिपोर्ट (रायपुर):
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद सुशासन के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। राज्य की वर्तमान सरकार की नीतियां अब सीधे तौर पर आम नागरिकों की जेब पर भारी पड़ रही हैं, जबकि बड़े-बड़े पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के प्रति सरकार का रवैया बेहद 'उदार' बना हुआ है। एक तरफ जल, जंगल और जमीन को कॉर्पोरेट के हाथों में सौंपने के आरोप सरकार पर लग रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विभाग की नाक के नीचे से सैकड़ों करोड़ रुपयों की वसूली दबाकर बैठी सरकार आम आदमी पर बिजली कटौती और योजनाओं की तालाबंदी का चाबुक चला रही है [01:01]।
पूंजीपतियों की गोद में तंत्र: 400 करोड़ की बड़ी देनदारी
हमारी पड़ताल और विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के लगभग 20 बड़े उद्योग ऐसे हैं जिनसे सरकार को 400 करोड़ रुपये से अधिक की राशि वसूल करनी है [03:51]। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी खुद विद्युत मंडल और विभिन्न जलविद्युत व ताप विद्युत संयंत्रों की है, जो सरकार को जल कर (Water Cess) और अन्य मदों का पैसा नहीं चुका रहे हैं।
बकायादारों की सूची पर एक नजर:
विद्युत मंडल (खुद देनदार): ₹226.33 करोड़ (22,633 लाख) [05:25]
जल विद्युत संयंत्र: ₹26.60 करोड़ [05:34]
विद्युत मंडल कोरबा: ₹77.42 करोड़ [05:45]
बालको (BALCO): मूल प्लांट, विस्तारीकरण और 1200 मेगावाट प्लांट मिलाकर कुल बकाया ₹42 करोड़ से अधिक है [05:56]।
एसीबी (ACB): इसके तीन अलग-अलग कार्यों का करोड़ों का बकाया है, जिसमें एक मद में ₹48.50 करोड़, दूसरे में ₹10.71 करोड़ और तीसरे में ₹3.50 करोड़ शामिल हैं [06:23]।
लैंको (Lanco): ₹5.42 करोड़ [06:47]
मारुति (Maruti): ₹1.50 करोड़ [06:47]
एसईसीएल (SECL): ₹76 लाख [06:12]
पड़ोसी राज्यों से वसूली में सिर्फ 'कागजी घोड़े'
छत्तीसगढ़ से बिजली खरीदकर अपने राज्यों को रोशन करने वाले पड़ोसी राज्य भी छत्तीसगढ़ का पैसा दबाकर बैठे हैं। साल 2021 से लेकर 2025 तक पड़ोसी राज्यों (मुख्य रूप से तेलंगाना व अन्य) से करोड़ों रुपये की वसूली अटकी हुई है [04:31]।
साल 2021: ₹34.54 करोड़ बकाया [04:31]
साल 2022: ₹43.80 करोड़ बकाया [04:31]
साल 2023: ₹28.97 करोड़ बकाया [04:31]
साल 2024: ₹23.45 करोड़ बकाया [04:31]
साल 2025: ₹23.71 करोड़ बकाया [04:31]
हैरानी की बात यह है कि सरकार इन पड़ोसी राज्यों और बड़े मगरमच्छों से वसूली करने के बजाय केवल औपचारिक चिट्ठी-पत्री लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रही है [04:52]।
आम आदमी पर आफत: कड़ा कानून और अघोषित कटौती
एक तरफ जहां करोड़ों के बकायादार ऐश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी का बिजली बिल यदि दो महीने भी बकाया रह जाए, तो विभाग तुरंत लाइन काटने पहुंच जाता है [01:19]। पूर्ववर्ती सरकार की लोकप्रिय '400 यूनिट बिजली हाफ योजना' को बंद या कमजोर किए जाने से जनता, खासकर महिलाओं में भारी गुस्सा है [01:28, 01:54]।
ग्रामीण इलाकों और किसानों की स्थिति और बदतर हो चुकी है। जब किसानों को फसलों के लिए पानी की सख्त जरूरत होती है, या गर्मी के दिनों में जब आम जनता बेहाल होती है, तब अघोषित बिजली कटौती का दौर शुरू हो जाता है [07:27, 07:42]। शहरों में स्ट्रीट लाइटें तक ठीक से नहीं जल पा रही हैं [07:49]। अगर सरकार उद्योगपतियों और अन्य राज्यों से यह 400 करोड़ रुपये समय पर वसूल कर ले, तो प्रदेश की बिजली व्यवस्था को पूरी तरह सुधारा जा सकता है [07:58]।
योजनाओं पर कैंची: महिलाओं की छिनती आजीविका
सरकार की अन्य महत्वाकांक्षी योजनाओं का हाल भी बेहाल है। चुनाव के वक्त महिलाओं को साधने के लिए लाई गई 'महतारी वंदन योजना' को लेकर अंदरखाने से यह खबर आ रही है कि शुरुआत से लेकर अब तक लगभग 6 लाख महिलाओं के नाम इस सूची से काटे जा चुके हैं [08:16, 08:26]। वहीं दूसरी तरफ, ग्रामीण औद्योगिक पार्क (RIPA) जैसी योजनाएं पूरी तरह ठप हो चुकी हैं [08:39, 08:48]। जिन ग्रामीण महिलाओं ने कर्ज लेकर या मेहनत से मशीनें लगाई थीं, उनकी मशीनें धूल खा रही हैं और उनकी आजीविका छिन चुकी है [08:55]।
अनुत्तरित सवाल: कब जागेगा तंत्र?
इस पूरे गंभीर आर्थिक घालमेल को लेकर जब जल संसाधन मंत्री केदार कश्यप से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला [07:07]। लेकिन सवाल वही है—व्यापारियों और पूंजीपतियों की हितैषी कही जाने वाली सरकार आखिर कब तक आम जनता का खून चूसकर उद्योगों को रियायतें देती रहेगी? जनता अब इस मनमानी वसूली और अघोषित कटौती के खिलाफ सड़कों पर उतरने को मजबूर हो रही है

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