शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

अतिथि शिक्षकों की बेबसी

भविष्य गढ़ने वालों का धुंधला भविष्य: नियमितीकरण के वादे और 'इच्छा मृत्यु' की गुहार


दुर्ग-भिलाई की सड़कों से लेकर राज्यपाल की चौखट तक गूंज रही अतिथि शिक्षकों की बेबसी; बस्तर-सरगुजा के जंगलों में रौशनी फैलाने वाले खुद झेल रहे अनदेखी 


छत्तीसगढ़ में नौनिहालों का भविष्य संवारने वाले 'गुरुजी' आज खुद अपनी जिंदगी और आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राज्य के शिक्षा हब कहे जाने वाले दुर्ग-भिलाई के ट्विन सिटी इलाके में इन दिनों भारी आक्रोश और मायूसी का माहौल है। दुर्ग-भिलाई के कलेक्टोरेट और संभागीय मुख्यालयों के बाहर बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षक और डीएड-बीएड अभ्यर्थी पिछले कई हफ्तों से अपनी जायज मांगों को लेकर धरना दिए बैठे हैं। धूप, बरसात और प्रशासनिक बेरुखी को झेलते हुए इन शिक्षकों का यह आंदोलन अब उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां छत्तीसगढ़ के इतिहास में शायद पहली बार, हजारों की संख्या में पहुंचे अतिथि शिक्षकों ने महामहिम राज्यपाल से मिलकर एक बेहद मार्मिक पत्र सौंपा है और सम्मानजनक रास्ता न निकलने की स्थिति में 'इच्छा मृत्यु' की इजाजत मांगी है। किसी भी संवेदनशील लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि शासन-प्रशासन की प्राथमिकताओं पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।

यह आक्रोश केवल दुर्ग-भिलाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें राज्य के सबसे सुदूर और संवेदनशील अंचलों से जुड़ी हैं। बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, सरगुजा, सूरजपुर और जशपुर जैसे दुर्गम तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में, जहां नियमित शिक्षक जाने से कतराते हैं, वहां ये अतिथि शिक्षक पिछले 10 वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अपने घरों से 500 से 600 किलोमीटर दूर जंगलों और संवेदनशील क्षेत्रों में रहकर इन शिक्षकों ने आदिवासी बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा है। विडंबना देखिए कि जिन क्षेत्रों में इनके अथक प्रयासों की बदौलत स्कूलों का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत आ रहा है, वहां काम करने वाले इन राष्ट्र-निर्माताओं को व्यवस्था केवल 'अतिथि' मानकर उनके मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखे हुए है।

वादाखिलाफी का दंश और बजट सत्र की कड़वी हकीकत

अतिथि शिक्षकों की इस बदहाली और हताशा का सबसे मुख्य कारण हाल ही में संपन्न हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में मिला सरकारी जवाब है। चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र और 'मोदी की गारंटी' में यह स्पष्ट वादा किया था कि सरकार बनते ही अनियमित कर्मचारियों व अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण की दिशा में 100 दिनों के भीतर एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर त्वरित कार्रवाई की जाएगी। तत्कालीन घोषणा पत्र समिति के प्रमुखों द्वारा भी इसे प्रमुखता से शामिल किया गया था। लेकिन बजट सत्र के दौरान जब विपक्ष द्वारा अतिथि शिक्षकों के भविष्य को लेकर सवाल दागा गया, तो शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने साफ तौर पर कह दिया कि फिलहाल अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है और न ही वर्तमान में ऐसा कोई प्रावधान विचाराधीन है।

सरकार के इस रुख ने उन 10,500 से अधिक अतिथि शिक्षकों के सपनों पर पानी फेर दिया है, जो उम्मीद लगाए बैठे थे कि नई सरकार उनके जीवन में स्थिरता लाएगी। विधानसभा में शिक्षा मंत्री के इस बयान का राज्य अतिथि शिक्षक संघ की प्रांताध्यक्ष अन्नपूर्णा पांडे सहित तमाम पदाधिकारियों ने तीखा विरोध किया है। शिक्षकों का कहना है कि मंत्री महोदय का यह बयान कि 'वे केवल अतिथि हैं, इसलिए शासन उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकती' सरासर असंवेदनशील है। शिक्षकों का तर्क है कि उन्हें अतिथि बनाने वाली भी यही शासन व्यवस्था है, वे खुद से अतिथि बनकर नहीं आए हैं। जब वे एक नियमित व्याख्याता के समकक्ष योग्यता रखते हैं और उन्हीं के समान सारे कार्य (जैसे चुनाव ड्यूटी, जनगणना, उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन और ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण) पूर्ण ईमानदारी से करते हैं, तो फिर वेतन और सुविधाओं के मामले में उनके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है?

अन्नपूर्णा पांडे (प्रांताध्यक्ष, राज्य अतिथि शिक्षक संघ) का कहना है कि "हम 10 वर्षों से बस्तर और सरगुजा के उन अंदरूनी इलाकों में पढ़ा रहे हैं जहां कोई नहीं जाना चाहता। आज जब हम अपने हक की बात कर रहे हैं, तो हमें यह कहकर टाल दिया जाता है कि तुम तो सिर्फ 'अतिथि' हो। क्या बच्चों का भविष्य बनाने वालों की अपनी कोई जिंदगी नहीं है?"

मात्र 20,000 रुपये का वेतन और मानवाधिकारों का हनन

यदि इस मामले के वित्तीय और जमीनी पहलुओं पर गौर करें, तो अतिथि शिक्षकों का आर्थिक शोषण चौंकाने वाला है। राज्य में एक पूर्णकालिक नियमित व्याख्याता को जहां 80,000 से 90,000 रुपये मासिक वेतन और तमाम शासकीय भत्ते मिलते हैं, वहीं ठीक उसी पद पर उतनी ही योग्यता के साथ 10 वर्षों से काम कर रहे अतिथि शिक्षक को मात्र 20,000 रुपये मासिक मानदेय पर गुजारा करना पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई के इस दौर में 20,000 रुपये के अल्प वेतन में 500 किलोमीटर दूर रहकर परिवार चलाना और बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पूरी करना असंभव सा हो गया है।

इससे भी अधिक दर्दनाक पहलू यह है कि इन शिक्षकों को कोई भी सवैतनिक अवकाश (Paid Leave) प्राप्त नहीं है। यदि कोई शिक्षक अस्वस्थ होने या किसी पारिवारिक आपातकाल के कारण एक दिन की भी छुट्टी लेता है, तो उसके वेतन से प्रति दिन के हिसाब से पैसे काट लिए जाते हैं। इतना ही नहीं, हर साल गर्मियों की छुट्टियों (समर वेकेशन) के डेढ़ महीने (45 दिन) का इन्हें कोई वेतन नहीं दिया जाता, जबकि इस अवधि में भी शासन द्वारा संचालित विभिन्न शैक्षणिक योजनाओं और बच्चों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इनकी पूरी सहभागिता ली जाती है। बिना वेतन के डेढ़ महीने का यह खालीपन इन परिवारों के लिए आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला साबित होता है। पिछली सरकार के कार्यकाल में दो बार में कुल 5,000 रुपये की वृद्धि की गई थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने आने के बाद से मानदेय में एक रुपये की भी बढ़ोतरी नहीं की है, बल्कि विधानसभा में पूर्व की वृद्धि को ही आधार बनाकर भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

तुलनात्मक विवरण (नियमित बनाम अतिथि शिक्षक):

1. मासिक वेतन / मानदेय:

नियमित व्याख्याता को 80,000 से 90,000 रुपये के साथ सभी सरकारी भत्ते मिलते हैं, जबकि अतिथि शिक्षक को केवल 20,000 रुपये का नियत मानदेय मिलता है, कोई भत्ता नहीं दिया जाता।

2. आकस्मिक / चिकित्सा अवकाश:

नियमित व्याख्याता को नियमानुसार पूर्ण सवैतनिक अवकाश मिलता है, जबकि अतिथि शिक्षक की पात्रता शून्य है। एक दिन की छुट्टी पर भी इनका वेतन काट लिया जाता है।

3. ग्रीष्मकालीन अवकाश (45 दिन):

नियमित व्याख्याता को इस अवधि का पूर्ण वेतन मिलता है, जबकि अतिथि शिक्षकों से काम लेने के बावजूद उन्हें शून्य वेतन दिया जाता है।

4. कार्यभार व जिम्मेदारियां:

नियमित व्याख्याता की तरह ही अतिथि शिक्षक भी अध्यापन, चुनाव, जनगणना और मूल्यांकन का समान कार्यभार संभालते हैं और शत-प्रतिशत परिणाम देते हैं।

नियम बनाना सरकार के हाथ में, फिर बेरुखी क्यों?

अतिथि शिक्षक संघ का कहना है कि सरकार का यह बहाना कि 'अधिकारियों के अनुसार नियमों में पेच है' या 'अन्य अनियमित कर्मचारियों के कारण मामला उलझा है' पूरी तरह से आधारहीन है। छत्तीसगढ़ का इतिहास गवाह है कि वर्ष 2003 और 2005 के पूर्व भी शिक्षा व्यवस्था में ऐसे शिक्षक थे जो मात्र 10.5 महीने का वेतन पाते थे और उन्हें किसी अवकाश की पात्रता नहीं थी। लेकिन तत्कालीन सरकारों ने दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए नियम बदले, उन्हें पहले शिक्षाकर्मी बनाया और बाद में उनका संविलियन कर उन्हें नियमित शिक्षक का दर्जा दिया। जब पूर्व में ऐसा किया जा चुका है, तो आज के नीति-नियंताओं के हाथ क्यों बंधे हुए हैं? नियम बनाना और जनहित में उनमें संशोधन करना पूरी तरह से सरकार और उच्च अधिकारियों के क्षेत्राधिकार में आता है।

अतिथि शिक्षकों की प्रमुख मांगें:

1. पूर्ण संविलियन (Regularization): घोषणा पत्र और 'मोदी की गारंटी' के वादे के अनुरूप 10,500 अतिथि शिक्षकों का शिक्षा विभाग में पूर्ण संविलियन किया जाए।

2. सम्मानजनक वेतनमान: संविलियन की प्रक्रिया पूरी होने तक व्याख्याता पद के समकक्ष एक गरिमापूर्ण और सम्मानजनक अंतरिम वेतनमान लागू हो।

3. सवैतनिक अवकाश व ग्रीष्मकालीन वेतन: अन्य शासकीय कर्मचारियों की भांति आकस्मिक अवकाश की पात्रता हो और समर वेकेशन (45 दिन) के दौरान ली जाने वाली सेवाओं का पूर्ण भुगतान किया जाए।

राजनीतिक गलियारों में हलचल और विपक्ष के तीखे बाण

इस संवेदनशील मुद्दे ने अब छत्तीसगढ़ की सियासत में भी उबाल ला दिया है। दुर्ग-भिलाई में धरने पर बैठे डीएड अभ्यर्थियों और प्रदेश भर के अतिथि शिक्षकों के इस 'इच्छा मृत्यु' वाले कदम को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर हो चुका है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज सहित प्रमुख विपक्षी नेताओं ने साय सरकार को आड़े हाथों लिया है। विपक्ष का आरोप है कि 'मोदी की गारंटी' केवल चुनाव जीतने का एक लोकलुभावन जुमला था, जिसका धरातल पर क्रियान्वयन शून्य है। विपक्ष का कहना है कि केवल अतिथि शिक्षक ही नहीं, बल्कि राज्य के 57,000 से अधिक अनियमित कर्मचारी, पंचायत कर्मी और डीएड अभ्यर्थी पिछले कई महीनों से सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर हैं, लेकिन सरकार कुंभकर्णी नींद सो रही है।

निष्कर्ष:

छत्तीसगढ़ जैसे प्रगतिशील राज्य में यदि शिक्षा की अलख जगाने वाले शिक्षकों को अपनी आजीविका के लिए महामहिम राज्यपाल से 'इच्छा मृत्यु' मांगनी पड़ रही है, तो यह पूरी व्यवस्था के लिए एक अलार्मिंग सिचुएशन है। दुर्ग-भिलाई के आंदोलनकारी युवाओं और राज्य के कोने-कोने में तैनात 10,500 अतिथि शिक्षकों की यह सामूहिक पुकार केवल एक नौकरी की मांग नहीं है, बल्कि यह उनके आत्मसम्मान और जीने के अधिकार की लड़ाई है। सरकार को चाहिए कि वह नौकरशाही के तकनीकी बहानों से ऊपर उठकर, अपने चुनावी वादों का सम्मान करे और इन गुरुजियों को सड़क से उठाकर सम्मानपूर्वक दोबारा कक्षाओं में भेजने का मार्ग प्रशस्त करे, ताकि छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य गढ़ने वाले इन हाथों का अपना भविष्य कभी अंधकारमय न हो।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/bLflgYIHVAI?si=FHIgpxNhEZuALJ-h


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